फैशन का दीवाना, 40 में भी मस्ताना 22 मई 2003. छह फुट दो इंच कद का बीस साल का एक छरहरा युवक 613 नंबर की कैप के साथ इंग्लैंड के लिए जिम्बाब्वे के खिलाफ ऐतिहासिक लॉर्ड्स पर टेस्ट पदार्पण कर रहा है. नाम है जेम्स मिशेल एंडरसन. प्यार से उसे जिमी भी बुलाया जाता है. पदार्पण टेस्ट की पहली ही पारी में एंडरसन ने पांच विकेट चटकाकर अपना डंका बजा दिया है. उसने साबित कर दिया है कि स्विंग कराने की उसमें अपार क्षमता है. न्यूजीलैंड के खिलाफ हालिया नॉटिंघम टेस्ट की दूसरी पारी में टॉम लैथम को बोल्ड कर एंडरसन ने टेस्ट क्रिकेट में अपने 650 विकेट पूरे कर लिए. टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में एंडरसन पहले ऐसे तेज गेंदबाज हैं जो इस मुकाम पर पहुंचे. बहरहाल इस हुनरमंद तेज गेंदबाज में एक आला दर्जे का फैशन डिजाइनर छुपा हुआ है, जो शायद बहुत कम लोगों को पता है. टेस्ट में पदार्पण के एक महीने के भीतर ही वह अपनी हेयर स्टाइल के कारण इंग्लैंड के क्रिकेट प्रेमियों में स्टार बन गए थे. उनकी स्टाइलिश रहन-सहन भी चर्चा का विषय थी. फैशन में अत्यधिक रुचि की वजह से एंडरसन की तुलना उनके हमवतन जानेमाने फुटबॉलर डेविड बेकह...
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इस ‘विकृति’ को क्रिकेट से हटाओ रवि शास्त्री ने तो केवल इतना ही कहा है कि टी-20 द्विपक्षीय श्रुंखलाएं बंद कर इस प्रारूप को क्रिकेट के विश्वकप के आयोजन तक सीमित कर दिया जाए लेकिन मैं और शायद मेरे जैसे कई खांटी क्रिकेट प्रेमी यह कहने का साहस करेंगे कि क्यों नहीं इस ‘विकृति’ को ही खेल से हटा दिया जाए? टी-20 सचमूच दुनिया के सबसे हसीन खेल में घुसी एक भयंकर विकृति है। एक कीड़ है जिसने रफ्ता-रफ्ता क्रिकेट की खूबसूरती, नजाकत और कुशलता को कुरेदकर रख दिया है। आईसीसी के अलावा बीसीसीआई जैसे संगठनों के लिए टी-20 निर्विवाद रूप से धन का दरिया है। आईपीएल के प्रसारण अधिकार ही बीसीसीआई तकरीबन 56 हजार करोड़ में बेचने जा रही है। ऐसे में टी-20 से उन्हें परहेज होना असंभव है, क्योंकि कोई कैसे उस कुएं को बंद कर देने की सोचेगा जहां से मीठा पानी मिल रहा है लेकिन इसका दूसरा पक्ष उतना ही काला और कड़वा है। ठीक वैसे ही जैसे फिल्म और फैशन के करियर का नेपथ्य भयंकर, घृणित और वीभत्स है। टी-20 क्रिकेट क्यों विकृति है और इसे खत्म कर देना ही क्यों योग्य है जैसे पहलुओं पर राय जताने से पहले जान लेत...
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कांग्रेस को संजीवनी कौन देगा पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री तथा वरिष्ठ भाजपा नेता नितिन गडकरी के एक वक्तव्य ने राजनीतिक हलकों में तहलका मचा दिया। गडकरी ने पुणें में एक अखबार के पुरस्कार समारोह में कहा कि भारतीय गणतंत्र को बरकरार रखने के लिए विपक्षी कांग्रेस का अस्तित्व जरूरी है, उसका मजबूत होना जरूरी है। गडकरी का यह बयान उनकी पार्टी की ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत की भूमिका से बिल्कुल अलहदा है। बहरहाल, गडकरी ने कांग्रेस को भारतीय गणतंत्र के लिए जरूरी बताकर एक नई बहस छेड़ दी। यह बयान किस परिप्रेक्ष्य में दिया गया इसका खुलासा गडकरी स्वयं ही कर सकते हैं। हो सकता है भाजपा ने ही किसी खास रणनीति के तहत उनसे यह बुलवाया हो लेकिन मेरा स्पष्ट मत है कि गडकरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिढ़ाने के लिए यह ‘कंटिला’ बयान दिया। गडकरी और मोदी के दरम्यान अंदरुनी टकराव सर्वविदित है। दोनों में आत्मियता और एक दूसरे के प्रति सम्मान का अभाव है। गडकरी ने परोक्ष रूप से इस बात को लोगों तक पहुंचाया भी है लेकिन जो भी हो इस सीनियर भाजपाई ने जिस मंशा से कांग्रेस की वकालत की औ...
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डांसर रिपोर्टर भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पत्रकारिता की उड़तीं धज्जियों के बीच एक उछल कूद करने वाली पत्रकार अवतरित हुई हैं. एक समाचार चैनल की यह पत्रकार यूक्रेन से जिस अंदाज में रिपोर्टिंग कर रही हैं उसे देख दर्शक हंसे या रोए या फिर पत्रकार को साष्टांग प्रणिपात करें यह तय नहीं कर पा रहे हैं. मोहतरमा के कुछ वीडियो ट्विटर पर वायरल हुए हैं. पत्रकारिता की यह शोकांतिका है या नए युग का सूत्रपात? शाजिया निसार नाम की यह पत्रकार रिपोर्टिंग के दौरान इतनी उछल रही हैं, इतनी कूद रही हैं कि लगता है जैसे बैठे-बैठे या खड़े होकर एंकरिंग करनेवालों की जमात एकदम मूर्ख है. क्या रिपोर्टिंग ऐसे भी हो सकती है? खबरों के ऐसे वाहियात और हांस्यरस से भरपूर प्रस्तुतिकरण के कारण शाजिया कि सोशल मीडिया पर खिल्ली उड़ाई जा रही है. कोई उन्हें बंदरिया तो कोई नचनिया कह रहा है। खबरों के प्रस्तुतीकरण में कुछ नया कर दिखाने की शाजिया की यह कोशिश अत्यधिक फूहड़ और निहायत ही बचकानी है. हो सकता है चैनल के मालिक ने ऐसा करने के लिए उन्हें प्रेरित किया हो और उद्येश्य वहीं...चैनल की टीआरपी बढ़ा...
रिम झिम गिरे सावन....
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बरसात का मौसम और सावन की फुहारों के बीच अगर फिल्म ‘मंजिल’ का नग्मा ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’ का स्मरण न हो तो मुझे लगता है यह इस लाजवाब, उम्दा रचना की घोर तौहीन होगी। बॉलीवुड की फिल्मों में बरसात विषय पर कई कर्ण प्रिय, मधुर गीत लिखे गए हैं लेकिन ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’ तो जैसे कालजयी, अजरामर है। निर्देशक बासु चटर्जी की फिल्म ‘मंजिल’ को प्रदर्शित हुए 42 साल बीत चुके हैं लेकिन ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’ की ताजगी यथावत है। फिल्म की रईस प्रेमिका अरुणा (मौसमी चटर्जी) को अपना बनाने के लिए गरीब, बेरोजगार नायक अजय (अमिताभ बच्चन) का जी तोड़ प्रयास फिल्म की केंद्रीय कल्पना है। सन 1965 में प्रदर्शित बंगाली फिल्म ‘आकाश कुसुम’ की रिमेक ‘मंजिल’ की कहानी में अमिताभ के चिर परिचित ‘एंग्री यंग मैन’ के किरदार को स्थान नहीं है। अमिताभ और मौसमी के बीच रास्ते में गलतफहमी के रोचक प्रसंग से फिल्म की शुरुआत होती है और तुरंत बाद ही एक विवाह समारोह में अमिताभ गाते हैं ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’। यहीं पर मौसमी के दिल में अमिताभ के लिए जगह बन जाती है। ...
इश्तहार फंडा
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टीवी पर दिखाए जा रहे इश्तेहारों की गोलमोल भाषा और उनका प्रस्तुतिकरण अक्सर ललचाने वाला होता है। चूहा मारने की दवा भी इश्तेहार में ऐसी दिखाई जाती है जैसे बहुत आला दर्जे का उत्पाद बेच रहे हो। दवा आपके घर खाकर चूहे बाहर जाकर मरेंगे...क्या चूहों को पता है कि बाहर जाकर मरना है? या दवा उन्हें बाहर जाकर मरने के लिए प्रेरित कर रही है...ऐसे दावों पर भरोसा हम कर भी लेते हैं ...और कालों को गोरा बनानेवाली दर्जनों फेयरनेस क्रीम की तो बात ही मत कीजिये। हर क्रीम को इस तरह से पेश किया जाता है गोया इसे चहरे पर मलने से 'सफेदी की चमकार' निकलेगी। बहुत पुराना मामला है। एक बहुचर्चित और सर्वाधिक बिकने का दावा करनेवाली फेयरनेस क्रीम के खिलाफ मुकदमा हो गया था। क्रीम के इश्तेहार में दिखाया गया था कि एक लड़की को एयर होस्टेस की नौकरी इसलिए नकार दी जाती है क्योंकि वह सांवली है। फिर यह लड़की बहुचर्चित फेयरनेस क्रीम का प्रयोग करके गोरी हो जाती है और उसे एयर होस्टेस का जॉब मिल जाता है। इस इश्तेहार से यह संदेश जा रहा था कि गोरे लोग ही सफलता के सोपान चढ़ने में सक्षम हैं और काले तो एकदम निकम्मे। सत्य इसके विपरीत...
संवेदनहीन वर्दी
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पुलिसिया अत्याचार और बर्बरता पर इंदौर की घटना के कारण फिर बहस छिड़ी है। सरकारी वर्दी पहनकर एक आदमी क्यों इतना क्रूर, वहशी बन जाता है? क्या वर्दी उसे उन्मत्त-अंधा बना देती है जो वह चोर-बदमाशों और सामान्य आदमी के बीच फर्क नहीं कर सकता? इंदौर में 35 वर्षीय ऑटो रिक्शा चालक कृष्णा केयर को पुलिस वालों ने जिस निर्दयता से पीटा वह देख सीना फट जाता है...और उस समय क्रोध बेकाबू होने लगता है जब पीड़ित के दस-बारह बरस के मासूम असहाय बेटे को बदहवास होकर ‘मेरे पापा को मत मारो...मेरे पापा को मत मारो’ चीखते हुए इधर-उधर दौड़ते देखा जाता है। तमाशबीन भीड़ इस घटना को सिर्फ देख रही है और कुछ लोग वीडियो बनाने में लगे हैं। हालांकि एक वीडियो की वजह से ही इस पुलिसिया जुल्म का दुनिया को पता चला। कृष्णा अपने बेटे को लेकर बीमार पिता से मिलने अस्पताल जा रहा था। उसका कसूर केवल इतना था कि कोविड-19 से बचाव के लिए लगाया गया मास्क नाक के नीचे खिसक गया था। पुलिसवालों ने उसे रोका। मास्क को लेकर कृष्णा के साथ पुलिस की बहस हो गई। अचानक वर्दी के अंदर का शैतान जागृत हो गया। दो पुलिस कर्मी इस कदर पील पड़े जैसे...