कांग्रेस को संजीवनी कौन देगा

पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री तथा वरिष्ठ  भाजपा नेता नितिन गडकरी के एक वक्तव्य ने राजनीतिक हलकों में  तहलका मचा दिया।  गडकरी ने पुणें में एक अखबार के पुरस्कार समारोह में कहा कि भारतीय गणतंत्र को बरकरार रखने के लिए विपक्षी कांग्रेस का अस्तित्व जरूरी है, उसका मजबूत होना जरूरी है।  गडकरी का यह बयान उनकी पार्टी की ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत की भूमिका से बिल्कुल अलहदा है।  बहरहाल, गडकरी ने कांग्रेस को भारतीय गणतंत्र के लिए जरूरी बताकर एक नई बहस छेड़ दी। यह बयान किस परिप्रेक्ष्य में दिया गया इसका खुलासा गडकरी स्वयं ही कर सकते हैं। हो सकता है भाजपा ने ही  किसी खास रणनीति के तहत उनसे यह बुलवाया हो लेकिन मेरा स्पष्ट मत है कि गडकरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिढ़ाने के लिए  यह ‘कंटिला’ बयान दिया। गडकरी और मोदी के दरम्यान अंदरुनी टकराव सर्वविदित है। दोनों में आत्मियता और एक दूसरे के प्रति सम्मान का अभाव है। गडकरी ने परोक्ष रूप से इस बात को लोगों तक पहुंचाया भी है लेकिन जो भी हो इस सीनियर भाजपाई ने जिस मंशा से कांग्रेस की वकालत की और उसके अस्तित्व को लोकतंत्र के लिए आवश्यक बताया वह शत प्रतिशत सच है।

भारतीय गणतंत्र के लिए कांग्रेस का अस्तित्व अनिवार्य है। कांग्रेस ऐसा एकमात्र दल रहा है जो आजादी से पहले और बाद में भी धर्मनिरपेक्षता की पैरवी करता रहा है।  हालांकि देश के इस सबसे प्राचीन सियासी दल के लिए समय बड़ा बांका है। कांग्रेस खुद को बचाए रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। किसी जमाने में कांग्रेस का लोकसभा में ‘साम्राज्य’ था। आज वह केवल वह 53 सदस्यों तक सिमट चुकी है। बड़ी चुनौतीपूर्ण स्थिति है पार्टी के लिए। 


कांग्रेस धर्मांधता की आंधी में बिखरी

धर्मनिरपेक्ष भारत की सतत वकालत करनेवाली कांग्रेस धर्मांधता की आंधी में बिखर गई। भाजपाई हिंदू धर्मांधों ने बेतरतीब तरीकों से मिथ्या प्रचार करके, नेहरूजी और इंदिरा गांधी को विलेन बताकर कांग्रेस को बदनाम कर डाला। उनके निशाने पर महात्मा गांधी भी थे और हैं लेकिन बापू को खारिज करना इतना सरल नहीं । बापू का व्यक्तित्व अति विशाल और विश्व व्यापी है। बापू एक ऐसी अवधारणा है,  एक ऐसा आंदोलन है जिसे दुनिया स्वीकार कर चुकी है। इस वजह से महात्मा गांधी को हिंदू चरमपंथी हाथ नहीं लगा पा रहे हैं। तिसपर बापू की कायराना हत्या करने का इल्जाम भी  संघियों पर है। सो वे गांधी से बचकर ही हैं, बल्कि गांधी को उन्होंने ‘हाईजैक’ करके स्वच्छता मिशन में उनका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। 

 भाजपाई और संघी अपनी बरसों पुरानी इस विचारधारा से जनता का मस्तिष्क काबिज करने में सफल रहे कि कांग्रेस के कारण हिंदू खतरे में हैं, कांग्रेस के कारण मुसलमान उग्र हो चुके हैं और हिंदुओं के जीने का अधिकार वह छीन लेंगे, कांग्रेस के कारण पाकिस्तान नंगा नाच रहा है और भारत से कश्मीर वह हथिया लेगा, कांग्रेस की वजह से देश विभाजीत हुआ,  गांधीजी ने अति अहिंसा दिखाई आदि। अब यहां प्रश्न लाजमी हो जाता है कि क्या कांग्रेस के पास संघी-भाजपाइयों के उग्र-धर्मांध विचारों का कोई पलटवार नहीं था। 


कांग्रेस की बड़ी गलती

असल में कांग्रेस ने सत्तर वर्षों के शासनकाल में एक बहुत बड़ी गलती की जो अब उसे रुला रही है। कांग्रेस  निरंतर रूप से धर्मनिरपेक्षता का पूरजोर समर्थन तो करती रही लेकिन इसे एक विचारधारा का रूप देकर प्रचारित-प्रसारित करने में वह विफल रही। ‘धर्मनिरपेक्षता’ को एक आंदोलन बनाकर पेश करने की जहमत कांग्रेस के नीति निर्धारकों ने नहीं उठाई।  सत्तर वर्षों में कांग्रेस ने उस संविधान की जड़ें मजबूत बनाने के लिए कष्ट नहीं उठाए जिसका मूलाधार, जिसकी रूह धर्मनिरपेक्षता है। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जानते थे कि देश में धर्मांधता का शैतान अगर जाग गया तो सत्ता की चाबी एक वर्ग विशेष अपनी जेब में डालकर बैठ जाएगा। इसी वजह से उन्होंने संविधान को धर्मनिरपेक्षता के निहित बनाया। कांग्रेस और कांग्रेसी हिंदू-मुस्लिम एकता, सर्वधर्म समभाव के नगमे जरूर गाते रहे लेकिन यह विचार जिस धर्मनिरपेक्षता में निहित है उसे कभी  प्रसारित और प्रचारित नहीं किया गया। कांग्रेस और उसके नेताओं ने ‘सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता’ की डफली बजाई लेकिन ‘सांप्रदायिकता’ किस हद तक जा सकती है और देश का कितना सत्यानाश कर सकती है यह जनता को नहीं बताया। दूसरी ओर भाजपा और संघ अपप्रचारित करते रहे कि जो कांग्रेस कर रही है वह अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण  है। बरसों से यह बताया जाता रहा कि मुसलमान कांग्रेस का वोट बैंक है और ‘हरी टोपियों’ को संतुष्ट करने के लिए यह राजनीतिक दल किसी भी हद तक जा नहीं सकता बल्कि गिर सकता है। हिंदुओं को नष्ट करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। इसके लिए नेहरूजी और गांधी खानदान का मूल मुस्लिम धर्म बताकर अवास्तव चिल्ला चोंट मचाई जाती रही।  थुसू रहमान बाई कौन तो पंडित जवाहरलाल नेहरू की माता, जनाब मुबारक अली कौन तो नेहरू के पिता, तो फिर मोतीलाल नेहरू कौन तो थुसू रहमान बाई के दूसरे पति। मोतीलाल नेहरू पांच पत्नियों के पति थे, नेहरू खानदान मुसलमान है इस तरह के तथ्यहीन दस्तावेज सोशल मीडिया पर सर्कुलेट किए जाते रहे। नेहरू-गांधी खानदान के गड़े मुर्दों को जगाकर उन्हें और कांग्रेस को बदनाम करने का काम चलता रहा। 

नहीं जागी कांग्रेस

कांग्रेस ने अपने तकरीबन सात दशकों के कार्यकाल में इस विषय पर कभी  गंभीरता से सोचा ही नहीं, तब भी नहीं जब सन 1992 में बाबरी मस्जिद का कट्टर हिंदुओं ने विध्वंस कर दिया था। कांग्रेसियों ने कभी गौर तक नहीं किया कि आनेवाले समय में हिंदू समर्थित विचारधारा को और अधिक उग्र बनाने के प्रयास संघ और भाजपा की ओर से पुरजोर ढंग से शुरू हो चुके हैं तो संभल जाओ और भारतीय संविधान के ‘प्राण’ (धर्मनिरपेक्षता ) की महफुजियत के लिए जुट जाओ।  कांग्रेसियों पर सत्ता का खुमार हावी रहा। इसी मुगालते में कांग्रेसी फंसे रह गए कि आगे भी दशकों तक कांग्रेस ही दिल्ली की हुकूमत चलाएगी। हुआ यह कि संघ और भाजपा इसका फायदा उठाते रहे। किसी न किसी तरीके से यह बात भाजपा और संघ हिंदुओं के दिमाग में ठूंसने में सफल हो गए कि कांग्रेस की वजह से वह (हिंदू) खतरे में हैं। यहां मिसाल के तौर पर जिक्र करना चाहूंगा 2008 में मुंबई पर हुए आतंकी हमले का जिसमें पकड़ा गया था अजमल कसाब। इस दहशतगर्द को फांसी पर लटकाने में कई तरह की कानूनी पेचिदगियों से विलंब हुआ। भाजपा उस समय विपक्ष में था। उसने और संघ ने कसाब की फांसी में विलंब को इतनी धुर्तता से पेश किया कि हिंदुओं के दिमाग में यह बात घुस गई कि कांग्रेस मुसलमानों के रोष से बचने के लिए, अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए हमलावर दहशतर्ग को फांसी पर लटकने ही नहीं देना चाहती। फिर कसाब की जेल में सुरक्षा पर करोड़ों रुपए खर्च और उसे बिर्यानी खिलाने जैसी कहानियां गढ़ी जाती रहीं। बिकाऊ खबरिया चैनल भी इस तरह के कांग्रेस विरोधी अपप्रचार में संघ और भाजपा की कुटीलता और उन्माद का साथ देते रहे। कुछ दिनों पहले मैंने पढ़ा था कि भाजपा ने मीडिया विशेषकर खबरिया चैनलों को खरीदने के लिए कई हजार करोड़ का बजट बनाकर रखा था। चैनलों को हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार  करने समेत अल्पसंख्यकों को बदनाम करने, पाकिस्तान को भारत का सबसे बड़ा दुश्मन बताने, विपक्षी नेताओं को मूर्ख साबित करने जैसे काम दिए गए थे। यह सब सोची समझी साजिश के तहत हो रहा था। कांग्रेस के खिलाफ भयंकर षड्यंत्र था। धीरे-धीरे धर्मांधता का हलाहल हिंदुओं खासकर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के मस्तिष्क को हलाल करता रहा। संघ और भाजपा के निशाने पर शुरू से ही ओबीसी रहा है। ओबीसी को आप सत्ता निर्धारकों का समूह भी  कह सकते हैं। भाजपा ने पहले तो ओबीसी के मन और मस्तिष्क में हिंदूत्व- हिंदूवाद की विषैली जड़ें गहरी कीं और फिर उनका  ‘माइंड कैप्चर’ कर लिया। आज नब्बे फीसदी ओबीसी ‘अंधभक्त’ हो गए हैं और उनका यह ‘माइंड स्टेट’ बरकरार रखने के लिए हिजाब-बुर्का, कश्मीर फाइल्स, अजान, हनुमान चालीसा  जैसा असला पहले से ही तैयार है। 


‘जी-23’ और समूहों में बंटी पार्टी

चुनौतियां अपार हैं। चहुओर अंधेरा है। कांग्रेस इस बियांवा से कैसी बाहर आएगी? राहुल गांधी, प्रियंका या सोनिया के पास कोई जादू की छड़ी तो नहीं है। तिस पर कांग्रेस को अंदरूनी क्लेष से भी जूझना पड़ रहा है। पार्टी में 23 बागियों का एक गुट उभरा है जो  ‘सामूहिक और समावेशी नेतृत्व’ की जरूरत बता रहा है।  इसे ‘जी-23’ कहा जाने लगा है। इस समूह ने अगस्त 2020 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी थी और संगठन के हर पद पर चुनाव कराने की मांग की थी। हालांकि समूह में अब 18 ही लोग रह गए हैं क्योंकि पांच भाजपा में शामिल हो चुके हैं। अगर  इन 18 नेताओं की प्रोफाइल देखें तो समझ में आता है कि इनमें से कुछ तो ऐसे हैं, जो सचमुच नाराज हैं क्योंकि उनको अपने प्रदेश की राजनीति में तरजीह नहीं मिली। ऐसे नेताओं में मनीष तिवारी का नाम अव्वल है।  

एक समूह ऐसे नेताओं का भी है, जिनकी राज्यसभा खत्म हो गई या खत्म होने वाली है लेकिन कांग्रेस आलाकमान उनको फिर से राज्यसभा में भेजने में सक्षम नहीं है या 

भेजना नहीं चाहता है। ऐसे नेताओं में गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल आदि शामिल हैं। इनकी बगावत पूरी तरह से निजी हित से निर्देशित हो रही है। ये सब बिना जमीनी आधार वाले नेता हैं। जमीनी राजनीति के अलावा विशुद्ध रूप से अपनी किसी अन्य ‘योग्यता’ के दम पर इन नेताओं ने राजनीतिक जीवन बिताया है लेकिन अब लग रहा है कि कांग्रेस में उनकी उस ‘योग्यता’ की कद्र नहीं है और दूसरी जगह उस ‘योग्यता’ की अच्छी कीमत मिल सकती है तो वे ‘बागी’ हो गए हैं।

ऐसे ही ‘बागी’ नेताओं की श्रेणी के एक नेता भूपेंदर सिंह हुड्डा हैं। अपने पिता की विरासत के साथ कांग्रेसी बने हुड्डा को कांग्रेस ने 10 साल हरियाणा का मुख्यमंत्री बना कर रखा था। 2004 में जब वे मुख्यमंत्री बने थे तब भजनलाल प्रदेश अध्यक्ष थे और पार्टी उनके चेहरे पर चुनाव लड़ी थी लेकिन कांग्रेस की पुरानी फितरत के मुताबिक सोनिया गांधी ने भूपेंदर सिंह हुड्डा को अपने परिवार के प्रति ज्यादा वफादार मानते हुए मुख्यमंत्री बना दिया और 10 साल बनाए रखा। पिछले आठ साल से कांग्रेस विपक्ष में है, जिसकी मुख्य वजह भी हुड्डा ही हैं इसके बावजूद सोनिया ने विपक्ष वाली कांग्रेस की कमान भी  उन्हीं को दे रखी है लेकिन अब वे चाहते हैं कि जैसे उन्होंने अपने पिता की विरासत संभाली वैसे ही उनका बेटा उनकी विरासत संभाले। ऐसा होने की संभावना कम दिख रही है इसलिए वे भी ‘बागी’ हो गए हैं।

एक समूह ऐसे नेताओं का है, जो अपने मां-बाप या दादा-दादी के नाम पर राजनीति में हैं और चाहते हैं कि कांग्रेस आलाकमान उनको आगे भी  उसी नाम पर महत्व देता रहे, चाहे वे राजनीति में सक्रिय रहें या नहीं। ऐसे नेताओं में संदीप दीक्षित, पृथ्वीराज चव्हाण आदि के नाम हैं। संदीप दीक्षित की मां दिल्ली में राजनीति करती थीं और दादा उत्तर प्रदेश के नेता थे लेकिन वे सब छोड़ कर नेपाल चले गए और वहां एनजीओ चला रहे हैं। उनकी मां को कांग्रेस ने 15 साल मुख्यमंत्री बना कर रखी। वे खुद भी  सांसद रहे और बाद में सांसद का चुनाव हारने के बाद दिल्ली छोड़ कर गए । फिर भी उनको शिकायत है कि कांग्रेस उनका ध्यान नहीं रख रही है। पृथ्वीराज चव्हाण भी आलाकमान की कृपा से केंद्र में मंत्री और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे। अभी  की मौजूदा सरकार में उनको कोई भूमिका नहीं मिली है इसलिए वे भी ‘बागी’ हो गए हैं। 

एक समूह दल बदलुओं वालों का है, जिसमें शंकर सिंह वाघेला और राज बब्बर के नाम लिए जा सकते हैं। वाघेला इस समय देश के मान्यता प्राप्त दलों में से ज्यादातर दलों में रह चुके हैं। राज बब्बर भी समाजवादी पार्टी छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हुए थे और लोकसभा व राज्यसभा दोनों के सदस्य रहे। उत्तर प्रदेश का होने के बावजूद कांग्रेस आलाकमान ने उनको मौका मिलने पर उत्तराखंड से राज्यसभा में भेजा था लेकिन अब कांग्रेस उनको भी कुछ देने की स्थिति में नहीं है तो वे भी ‘बागी’ हो गए हैं। 

एक समूह ऐसा है, जो गांधी परिवार के प्रति निष्ठावान है या कम से कम विरोध में नहीं है।   इनमें शशि थरूर, मणिशंकर अय्यर, अखिलेश प्रसाद सिंह, विवेक तन्खा आदि के नाम लिए जा सकते हैं। ये सब लोग ‘बागी’ नहीं हैं और इनमें से तीन लोग तो सांसद भी  हैं। कुल मिला कर मीडिया में बागी के नाम से पेश किए जा रहे ये सारे नेता अपने निजी हितों को प्राथमिकता देने वाले हैं।  

अहम सवाल यही है कि कांग्रेस को संजीवनी कौन देगा? राहुल गांधी के नेतृत्व पर शंका नहीं है।  जिस अंदाज में ‘गोदी मीडिया’ ने उनकी तस्वीर पेश करता रहा है राहुल वैसे हरगीज नहीं है। वे कपटी नहीं और अमित शाह की शातिर नहीं। इस देश में मौजूदा दौर में वह एक मात्र नेता हैं जो संघ समेत मोदी, अंबानी-अदानी को खुलेआम चुनौती देने का माद्दा रखते हैं। जरूरत है कांग्रेसी नेताओं के व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठने की। पहले अपने घर की नींव मजबूत-ठोस बनाओं फिर शत्रु को चुनौत दो।  

000



 


Comments

Popular posts from this blog

एड गेनः इंसान की खाल में छिपा विकृत शैतान

अमेरिका और युद्ध का कारोबार