इश्तहार फंडा


 टीवी पर दिखाए जा रहे इश्तेहारों की गोलमोल भाषा और उनका प्रस्तुतिकरण अक्सर ललचाने वाला होता है। चूहा मारने की दवा भी इश्तेहार में ऐसी दिखाई जाती है जैसे बहुत आला दर्जे का उत्पाद बेच रहे हो।  दवा आपके घर खाकर चूहे बाहर जाकर मरेंगे...क्या चूहों को पता है कि बाहर जाकर मरना है? या दवा उन्हें बाहर जाकर मरने के लिए प्रेरित कर रही है...ऐसे दावों पर भरोसा हम कर भी लेते हैं ...और कालों को गोरा बनानेवाली दर्जनों फेयरनेस क्रीम की तो बात ही मत कीजिये। हर क्रीम को इस तरह से पेश किया जाता है गोया इसे चहरे पर मलने से 'सफेदी की चमकार' निकलेगी। बहुत पुराना मामला है। एक बहुचर्चित और सर्वाधिक बिकने का दावा करनेवाली फेयरनेस क्रीम के खिलाफ मुकदमा हो गया था। क्रीम के इश्तेहार में दिखाया गया था कि एक लड़की को एयर होस्टेस की नौकरी इसलिए नकार दी जाती है क्योंकि वह सांवली है। फिर यह लड़की बहुचर्चित फेयरनेस क्रीम का प्रयोग करके गोरी हो जाती है और उसे एयर होस्टेस का जॉब मिल जाता है। इस इश्तेहार से यह संदेश जा रहा था कि गोरे लोग ही सफलता के सोपान चढ़ने में सक्षम हैं और काले तो एकदम निकम्मे। सत्य इसके विपरीत है बस आंखें खुली रखने के जरूरत है। महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग काले ही थे मगर दुनिया आज उनके आगे नतमस्तक है। खैर...  रंगभेद, नस्लभेद को बढ़ावा देने वाले इस इश्तेहार में मुकदमेबाजी के बाद परिवर्तन किया गया। 

कपड़े, बर्तन, फ़र्श, शीशे, लैपटॉप और मोबाइल स्क्रीन साफ करने के उत्पादों के इश्तेहार देख तो दिमाग चकरा जाता है। प्रसंगवश यंहा एक किस्सा आपके साथ साझा करना चाहूंगा। प्रिया तेंदुलकर एक गुणी महाराष्ट्रीयन अभिनेत्री थीं। अस्सी के दशक में उनका एक टीवी शो 'रजनी' काफी लोकप्रिय हुआ था। प्रिया बरसों पहले संसार से विदा हो गईं। उन्हीं का यह अनुभव है, जिसका जिक्र उन्होंने अपने एक लेख में किया था। प्रिया ने एक डिटर्जेंट का इश्तेहार किया था। जिस डिटर्जेंट का इश्तेहार था उससे झाग ही नहीं आ रहा था। प्रिया तो परेशान थीं ही, कैमरेमन भी परेशान था कि झाग आ ही नहीं रहा तो शूट कैसे करें। काफी प्रयासों के बावजूद और कई तरह की तरकीबें आजमा कर भी झाग नहीं निकला तो किसी अन्य कंपनी का डिटर्जेंट लाकर उससे कपड़े धोकर झाग निकाला गया। फिर शूटिंग हुई। प्रिया ने इश्तेहारों के नेपथ्य का काला सत्य दुनिया को बताया। आजकल के जो इश्तेहार हैं वो ऐशोआराम की चीजें खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं। बाजारवाद, वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में भारत का मध्यमवर्ग देश-दुनिया की कंपनियों के निशाने पर हैं। बल्कि तकरीबन 100 करोड़ या उससे ज्यादा मध्यमवर्गीय भारतीय दुनियाभर के उत्पादकों  के लिए एक विशाल बाजार है और इतने बड़े बाजार को बांधे रखने की कवायद में इश्तेहार ब्रह्मास्त्र है। 

कई तरह के इफ़ेक्ट का प्रयोग करके बड़े ही आकर्षक अंदाज में इश्तेहार शूट किए जाते हैं। उनका प्रस्तुतिकरण मध्यवर्गियों को ललचाता है। घर में 25 हजार का टीवी है, अच्छा चल रहा है लेकिन इश्तेहार के जाल में मध्यमवर्गीय वैसे ही फंसा जैसे मछवारे के जाल में मछली।  15 हज़ार का मोबाइल है, सारे फीचर उसमें मौजूद है लेकिन 22 हजार का मोबाइल इतना सुंदर है और स्लो मोशन शूटिंग भी करता है तो चलो खरीद लेते हैं।

वह भागा भागा गया और 50 हजार का टीवी सेट खरीद ले आया, 22 हजार का हैंडसैट ले आया। मगर पैसे कंहा से आये। तनख्वाह तो 20 हजार ही है। चिंता की बात क्या? लोन देनेवाली कम्पनियां भी तो हैं बाजार में। इनके इश्तेहार भी तो देखते या पढ़ते हैं। होगी थोड़ीसी तंगी।

झेल लेंगे। सो ऐसा है बाजार तंत्र। इससे शायद ही कोई बचें? यह तंत्र इंसानी मस्तिष्क को अपने पाश में जकड़ता है और बाजारवाद का हिस्सा बनने पर विवश कर देता है।  कोरोना काल में हाथ धोने वाले दर्जनों उत्पाद बाजार में आये। सभी डंके की चोट पर वायरस से महफूज़ रखने का दावा कर रहे हैं। भाइयों सारी कायनात कोरोना वायरस से जूझ रही है, संक्रमित को ठीक करने की दवा इजात करने के लिए बड़े- बड़े वैज्ञानिक दिन -रात पसीना बहा रहे  वहीं इनके हाथ धोने वाले साबुन या लिक्विड क्या वाकई कोरोना से बचाएंगे। अगर बचा रहे तो रोज की हजारों मौते कैसी ?



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