संवेदनहीन वर्दी

 



पुलिसिया अत्याचार और बर्बरता पर इंदौर की घटना के कारण फिर बहस छिड़ी है। सरकारी वर्दी पहनकर एक आदमी क्यों इतना क्रूर, वहशी बन जाता है? क्या वर्दी उसे उन्मत्त-अंधा बना देती है जो वह चोर-बदमाशों और सामान्य आदमी के बीच फर्क नहीं कर सकता? इंदौर में 35 वर्षीय ऑटो  रिक्शा चालक कृष्णा केयर को पुलिस वालों ने जिस निर्दयता से पीटा वह देख सीना फट जाता है...और उस समय क्रोध बेकाबू होने लगता है जब पीड़ित के दस-बारह बरस के मासूम असहाय बेटे को  बदहवास होकर ‘मेरे पापा को मत मारो...मेरे पापा को मत मारो’ चीखते हुए इधर-उधर दौड़ते देखा जाता है। तमाशबीन भीड़ इस घटना को सिर्फ देख रही है और कुछ लोग वीडियो बनाने में लगे हैं। हालांकि एक वीडियो की वजह से ही इस पुलिसिया जुल्म का दुनिया को पता चला। 

कृष्णा अपने बेटे को लेकर बीमार पिता से मिलने अस्पताल जा रहा था। उसका कसूर केवल इतना था कि कोविड-19 से बचाव के लिए लगाया गया मास्क नाक के नीचे खिसक गया था। पुलिसवालों ने उसे रोका। मास्क को लेकर कृष्णा के साथ पुलिस की बहस हो गई। अचानक वर्दी के अंदर का शैतान जागृत हो गया। दो पुलिस कर्मी इस कदर पील पड़े जैसे दुनिया भर में कोरोना वायरस चीन के वुहान से नहीं कृष्णा ने फैलाया था। अत्याचारी पुलिसकर्मियों की पहचान कमल प्रजापत और धर्मेंद्र जाट के तौर पर की गई है। कृष्णा की गर्दन पकड़कर मारा गया। फिर छाती पर बैठ पुलिसवाले अपनी मर्दानदी दिखाते रहे। इस बीच कृष्णा का लाचार-बेबस बेटा पिता को बचाने की याचना करता रहा। 


दुनिया में पुलिस की अमानवीयता की यह पहली और आखिरी घटना नहीं है। पिछले साल अमेरिका में जॉर्ज फ्लायड नामक एक अश्वेत को गोरे पुलिस अधिकारी डेरेक चाउविन ने निर्दयता की पराकाष्ठा कर मार डाला था। डेरेक ने फ्लायड की गर्दन अपने घुटने के नीचे दबा दी थी। इस घटना के बाद विश्व में ‘ब्लैक लाइव्ज मैटर’ (अश्वेतों की जिंदगी भी मायने रखती है) अभियान और तेज हो गया। 


बात घूम फिरकर वहीं आ जाती है कि पुलिस इतनी क्रूर क्यों? आम आदमी पुलिस के पास खड़ा रहने से तक डरता है और मजे की बात यह है कि ऐसे आम आदमी पर ही पुलिस का कहर बरपता है। मगर क्यों? आम आदमी आवाज मुखर नहीं कर पाता इसलिए, उसकी बात शासन के दरबार में सुनी नहीं जाती इसलिए, सबसे ज्यादा करों का भुगतान वह करता है इसलिए, पुलिस को वह ‘हफ्ता’ नहीं देता इसलिए या फिर विश्व के महानतम लोकतंत्र की रीढ़ है इसलिए? आम आदमी सिग्नल जम्प करे तो गुनहगार, हैल्मेट नहीं पहने तो गुनहगार, वाहन के दस्तावेज न हो तो गुनहगार...माना की इस तरह ही हरकतें अपराध की श्रेणी में हैं लेकिन ये उतना बड़ा भी अपराध नहीं जितना विजय माल्या या निरव मोदी ने किया। दोनों अरबों रुपए के घपलों में अपराधी हैं। पुलिस तो क्या उससे बड़ी जांच एजेंसी माल्या और मोदी के की खाल उधेड़ना तो दूर उनके बाल को तक छू नहीं सकी मगर एक मामूली ऑटोरिक्शा चालक मास्क ठीक से नहीं पहन पाया इसलिए पुलिसिया संवेदहीनता का शिकार हो गया। दिन दहाड़े सड़क पर पुलिस उसका वह हाल करती है जो शायद फिरंगियों के लिए भी मुमकिन नहीं था। 

आम आदमी चाहे तो बड़ी-बड़ी सल्तनतों की उखाड़ फेंक सकता है, भ्रष्ट अफसरों को नंगा कर सकता है लेकिन परिस्थितियां विपरीत हैं। दो जून की रोटी जुटाने में आम आदमी की जिंदगी बीत रही है। शासकों ने उसे इस कदर उलझा डाला है कि सड़ी-गली, लिजलिजी व्यवस्था के प्रति उसके जज्बात मर चुके हैं, परिवार तक वह केंद्रित है, उसके सिने में बगावत की आग अब सुलगती नहीं, उसमें सिस्टम को ललकारने की ताकत नहीं बची है । 

पुलिस का मनोविज्ञान यही है कि हमने वर्दी पहन ली है तो सात खून माफ है... हम सभी के बाप हैं...कोई हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यही सोच पुलिस को मगरुर, उन्मत्त, खूंखार बनाती है। फिर वह चोर और संन्यासी के बीच फर्क नहीं कर पाते। एक अतिसामान्य व्यक्ति से पेश आने का उनका तरीका वैसा ही बेअदबी से भरा होता है जैसे वे अपराधियों के साथ पेश आते हैं।

पुलिस विभाग आदमी की सुरक्षा के लिए बना है और यह सुरक्षा किसे दे रहा है? जिनसे उसे हफ्ता मिलता है उसे। 


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