अधूरा सुसाइड नोट
‘‘देख कलुआ, दुबारा ऐसी हिमाकत मत करना, वरना कुत्ते इतना मारूंगी न तुझे कि...’’ ‘‘ हरामजादी, पता है तू कैसी है। मुझे डांटती है और सबको...’’ ‘‘ये...क्या कहा रे तूने हरामी के पिल्ले...तेरी मां-बहन को जाकर बोल ये सब...हरामखोर ...लफंगे...अपनी सूरत तो देख ले...कमीने जी चाहता है कि तेरी चमड़ी उधेड़ दूं ...खून पी जाऊंगी तेरा... ’’ अब मीना आपे से बाहर हो चुकी थी। क्रोध से उसकी सांसें फूल रही थीं और छतिया बहुत तेज ऊपर-नीचे हो रही थी। मीना ने कपड़ों से भरी बाल्टी वहीं पटक दी और बड़ा सा पत्थर उठा लिया और कलुआ की ओर उछाल दिया। तीव्र गति से आ रहे पाषाण की मार से बचने के लिए कलुआ बाएं तरफ झुका। पत्थर नहीं उसके करीब से मौत गुजर चुकी थी। मीना की आंखें अंगारें बरसा रही थीं। कलुआ ने खिसकने में ही भला समझा। 000000000 मीना को नींद नहीं आ रही थी। रात गुजरे लंबा समय हो चुका था। अब तो भोर होने चली थी। मीना करवटें बदल-बदलकर सूरज के ऊगने का इंतजार कर रही थी मगर उसका मन अतीत की गहराई में प्रवेश कर रहा था। आंखें नम थीं। मीना सातवीं में पढ़ रही थी कि एक दिन बापू ने...