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‘अलोकतांत्रिक’  तहजीब में सांस घुटती र ह ी   गडकरी  क ी   नितिन गडकरी का शुमार उन चुनिंदा सियासतदांओं में है जिन्होंने मुखौटा चढ़ाकर कभी राजनीति नहीं की. ‌दोहरे चरित्रों से पटी भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में गडकरी तटस्थ रहे. साफगोई उनका स्थाई स्वभाव रहा है. कट्टर विरोधियों पर भी तारीफों के फूल बरसाने में उन्होेंने कभी कंजूसी नहीं की और अपनों को आलोचनाओं के शूल चुभाने में संकोच भी नहीं किया लेकिन बीजेपी के अंदरूनी माहौल में वे शायद दमित थे और कुपित भी. गडकरी के पिछले कुछ वक्तव्य काबिल-ए-गौर हैं. 1)अच्छे दिन आते नहीं हैं, उन्हें केवल महसूस किया जा सकता है, 2)देश में लोकतंत्र के हित में कांग्रेस का वजूद अहम है, 3)अब गांधी के समय की राजनीति नहीं रही, 4)जी चाहता है कि सियासत का परित्याग कर दूं आदि. गडकरी की यह भड़ास थी, जिससे जाहिर होता है कि उन्हें केंद्र की बीजेपी सरकार में चली आ रही ‘एकाधिकारशाही’ गुलाम होने का अहसास करा रही थी. बीजेपी में इस समय जो परिपाटी बनी है उसमें अपनी बात रखने का अधिकार शायद ही किसी के पास हो. ऐसी ‘अलोकतांत्रिक’ तहजीब में गडकरी समान खुले द...