इस ‘विकृति’ को क्रिकेट से हटाओ
रवि शास्त्री ने तो केवल इतना ही कहा है कि टी-20 द्विपक्षीय श्रुंखलाएं बंद कर इस प्रारूप को क्रिकेट के विश्वकप के आयोजन तक सीमित कर दिया जाए लेकिन मैं और शायद मेरे जैसे कई खांटी क्रिकेट प्रेमी यह कहने का साहस करेंगे कि क्यों नहीं इस ‘विकृति’ को ही खेल से हटा दिया जाए? टी-20 सचमूच दुनिया के सबसे हसीन खेल में घुसी एक भयंकर विकृति है। एक कीड़ है जिसने रफ्ता-रफ्ता क्रिकेट की खूबसूरती, नजाकत और कुशलता को कुरेदकर रख दिया है। आईसीसी के अलावा बीसीसीआई जैसे संगठनों के लिए टी-20 निर्विवाद रूप से धन का दरिया है। आईपीएल के प्रसारण अधिकार ही बीसीसीआई तकरीबन 56 हजार करोड़ में बेचने जा रही है। ऐसे में टी-20 से उन्हें परहेज होना असंभव है, क्योंकि कोई कैसे उस कुएं को बंद कर देने की सोचेगा जहां से मीठा पानी मिल रहा है लेकिन इसका दूसरा पक्ष उतना ही काला और कड़वा है। ठीक वैसे ही जैसे फिल्म और फैशन के करियर का नेपथ्य भयंकर, घृणित और वीभत्स है।
टी-20 क्रिकेट क्यों विकृति है और इसे खत्म कर देना ही क्यों योग्य है जैसे पहलुओं पर राय जताने से पहले जान लेते हैं कि इस ‘संक्रमण’ का इजात कैसे हुआ? दरअसल आईसीसी की ख्वाहिश दुनिया के उन मुल्कों में क्रिकेट का विस्तार करने की थी जो रईस हैं। विशेषकर अमेरिका और यूरोपियन देश। यहां पर दीगर खेलों के बनिस्बत फुटबॉल लोकप्रियता के शीर्ष पर है। ऐसा नहीं कि इन मुल्कों में क्रिकेट नहीं खेला जाता लेकिन खेल का पांच दिनी प्रारूप (टेस्ट) दो दूर एक दिनी प्रारूप (वनडे) यहां इसलिए लोगों का पसंदीदा नहीं बन सका क्योंकि उनके पास समय कहां है? अमेरिकी और यूरोपियो लोगों को क्रिकेट की ओर खींचे लाने के लिए टी-20 प्रारूप का आविष्कार हुआ लेकिन किसी दानव की तरह यह प्रारूप ही खेल की छाती पर चढ़ बैठा है।
अमेरिका और यूरोप तो दूर रह गए लेकिन क्रिकेट के दीवानों के देश में टी-20 की (अप) संस्कृति विषबेला की तरह तेजी से फैली है। क्रिकेट के साथ क्रिकेटरों को खराब करनेवाले संक्रमण का नाम अगर है तो टी-20। आईसीसी एक तरफ खेल के पारंपारिक प्रारूप टेस्ट को बचाने बातें करती है लेकिन क्या उन्हें वल्गनाएं समझी जाएं? टेस्ट को पहले तो वनडे ने बर्बाद और जो बचा-खुचा है उसे टी-20 बर्बाद कर रहा है। आईसीसी तमाशबीन है। क्रिकेट की इस वैश्विक परिचालन संस्था का दोगलापन समझ में नहीं आता। एक तरफ टेस्ट बचाने के लिए उसका आर्तनाद चलता है तो दूसरी तरफ टी-20 की विकृति को वह पुचकारती भी है।
नई पीढ़ी के खिलाड़ियों की प्राथमिकता टी-20 हो चुकी है। इसमें पैसा है। पिता भी चाहता है कि उसका बेटा कमसे कम टी-20 खेलने के लायक बन जाए। वह तो विराट कोहली, सुनील गावस्कर, वीवी रिचर्डस जैसे महान खिलाड़ी हैं जो पांच दिनी को बरकार रखने की वकालत करते रहते हैं।
टी-20 ने क्रिकेटरों के शॉट बिगाड़े हैं और उनसे संयम छीना है। टी-20 में पॉवर गेम की वजह से बल्लेबाज स्ट्रोक्स में नजाकत भूल चुके हैं, कुशलता की कमी आ चुकी है, तकनीक में भरपूर खामियां हैं। कुल मिलाकर क्रिकेट को विकृत करनेवाले संक्रमण का नाम टी-20 है। और इसमें गेंदबाजों के लिए तो कुछ होता ही नहीं। बल्लेबाजों के इस खेल में गेंदबाज भुर्ता बन जाते हैं। दयनीय हालत होती है उनकी। कहां है टी-20 में क्रिकेट। इस खेल को जो आंखों से नहीं दिल से देखते हैं वे शायद मेरे मत से जरुर इत्तेफाक रखेंगे।



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