कांग्रेस में ‘तीसरा खानदान’ प्रियंका गांधी वाड्रा का भारतीय सियासत में प्रवेश बिना किसी तामझाम के रहा. उनका आना हालांकि निश्चित था लेकिन जैसा की लोग सोचकर चल रहे थे कि राजीव-सोनिया की पुत्नी बड़े आकर्षक अंदाज में अपनी राजनीतिक पारी शुरू करेंगी वैसा नहीं हुआ. प्रियंका सारे अनुमानों को खारिज करते हुए ‘औपचारिक तौर पर सियासतदां’ बन गईं. अब यहां से एक नई कहानी शुरू होने जा रही है. कहानी की मध्यवर्ती कल्पना ये है कि क्या कांग्रेस की विरासत तीसरे खानदान को हस्तांतरित हो रही है. देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल पर आजादी से पहले और बाद में करीब दो दशक तक नेहरू जी का वर्चस्व था. कांग्रेस में नेहरू जी के समकक्ष बनने की कोशिश भी शायद किसी ने नहीं की. नेहरू जी अपनी विरासत इंदिरा गांधी को सौंप गए अर्थात कांग्रेस को संभालने वाले हाथ खानदान के साथ बदल गए. जिस कांग्रेस पर पहले नेहरू जी का वर्चस्व था, वह अब इंदिरा जी के नेतृत्व में चलने लगी. इंदिरा जी की बहू सोनिया गांधी ने भी कांग्रेस का नेतृत्व किया. अब कांग्रेस को संभालने की जिम्मेदारी सोनिया-राजीव गांधी के बेटे राहुल पर आई और अपनी जिम्मेदारी ...
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मुंह में आया बक दिया.. उच्च वर्णीयों को दस फीसदी आरक्षण, तीन तलाक विधेयक जैसे अहम सियासी घटनाक्रमों के बीच ‘कॉफी विद करण’ में क्रिकेटर हार्दिक पंड्या और केएल राहुल की महिलाओं संबंधी अशोभनीय टिप्पणियों ने अखबारों के पन्ने तथा खबरिया चैनलों को गर्म रखा. पंड्या ने यह कबुलीनामा देकर हद ही कर दी कि जब भी बाहर ‘मर्दानगी’ दिखाकर लौटा अपने माता-पिता से उसने खुलकर इस विषय में चर्चा की. इसे परिवार में विचारों का खुलापन कहें या फिर उच्छृंखलता? शो में और भी कई तरह की बातें हुईं जिनका जिक्र यहां मुमकिन नहीं है. मुङो तो लगता है कि विशुद्ध पश्चिमी परिवेश में बढ़े-पले भी अपनी ‘मर्दानगी’ का महिमामंडन जन्मदाताओं के समक्ष करने का साहस नहीं दिखाते होंगे. भारत में सेक्स विषय ही ऐसा है जिसपर चार लोगों के बीच खुलकर चर्चा करना अभी भी अस्वीकार्य है. यौन संबंधों को भारतीय परिवेश में स्त्री और पुरुष का नितांत निजी मामला माना जाता है. लिहाजा ऐसे अत्यंत ‘गोपनीय मसले’ पर जब कोई खुलकर बोलने की चेष्टा करता है तो बवाल उठना लाजमी है. पंड्या ने ‘कॉफी विद करण’ में जो कहा उसे संयत शब्दों में भी कहा जा सकता ...
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शादियों में खाना, लुटता खजाना दिवाली के बाद करीब सात-आठ विवाह समारोहों में मैं अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका हूं. कुछ विवाह समारोह नागपुर में थे और कुछ बाहर. इन सभी विवाह समारोहों का ताल्लुक मध्यमवर्गीय परिवार से ही था. कोई भी इसमें धनाढय़ नहीं था. कुछ उच्च मध्यमवर्गीय और कुछ निम्न मध्यमवर्गीय परिवार थे. एक बात पर मैंने गौर किया कि हर शादी का बजट 10 से 15 लाख रुपए के बीच था. जितनी राशि में एक सामान्य मकान खड़ा हो सकता है उतना खर्च विवाह समारोहों में हो रहा था और वह भी ऐसे समय जब महंगाई की डायन मध्यमवर्गीयों का जीना दुष्वार कर चुकी है. अबसे कोई तीस साल पहले घर के बुजुर्ग कहते थे, ‘देखते रहना, सुरसा की तरह मुंह फाड़ती महंगाई से लोग खुद ही आजीज आ जाएंगे और 15-20 साल बाद शादियों में खर्च एकदम घट जाएगा. ’ ठीक इसके विपरीत हुआ है. महंगाई बढ़ी लेकिन लोगों की आय भी बढ़ी तो शादियों में दिलखोलकर खर्च करने की प्रवृत्ति भी बढ़ी. बहरहाल, मेरी तो स्पष्ट राय है कि शादियों में बेशुमार खर्च धन की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं है. मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि ‘शादी जिंदगी में एक ही बार तो होत...