डांसर रिपोर्टर 


भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पत्रकारिता की उड़तीं धज्जियों के बीच एक उछल कूद करने वाली पत्रकार अवतरित हुई हैं. एक समाचार चैनल की यह पत्रकार यूक्रेन से जिस अंदाज में रिपोर्टिंग कर रही  हैं उसे देख दर्शक हंसे या रोए या फिर पत्रकार को साष्टांग प्रणिपात करें यह तय नहीं कर पा रहे हैं. मोहतरमा के कुछ वीडियो ट्विटर पर वायरल हुए हैं. पत्रकारिता की यह शोकांतिका है या नए युग का सूत्रपात?  शाजिया निसार नाम की यह पत्रकार रिपोर्टिंग के दौरान इतनी उछल रही हैं, इतनी कूद रही हैं कि लगता है जैसे बैठे-बैठे या खड़े होकर एंकरिंग करनेवालों की जमात एकदम मूर्ख है. क्या रिपोर्टिंग ऐसे भी हो सकती है?  खबरों के ऐसे वाहियात और हांस्यरस से भरपूर  प्रस्तुतिकरण के कारण शाजिया कि सोशल मीडिया पर खिल्ली उड़ाई जा रही है. कोई उन्हें बंदरिया तो कोई नचनिया कह रहा है। 

खबरों के प्रस्तुतीकरण में कुछ नया कर दिखाने की शाजिया की यह कोशिश अत्यधिक फूहड़ और निहायत ही बचकानी है. हो सकता है चैनल के मालिक ने ऐसा करने के लिए उन्हें प्रेरित किया हो और उद्येश्य वहीं...चैनल की टीआरपी बढ़ाना.  बहरहाल, इस खबरनवीस का बेहयाई से भरपूर  ‘नृत्याविष्कार’ देख  यह सवाल उठना लाजमी है कि  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पत्रकारिता किस दिशा में जा रही है ? यह कौन से मानदंड स्थापित कर रही है? इस तरह की पत्रकारिता क्या युवाओं को इस क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित कर सकती है?  वैसे भी  खबरिया चैनल समाचारों में विश्वसनीयता की कमी के लिए कुख्यात हो चुके हैं. मिर्च मसाले लगाकर अवास्तव, अतार्किक खबरें प्रस्तुत करने से चैनल बदनाम हो चुके हैं. तीन साल पहले पुलवामा हमले के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव जब चरम पर था. उस समय एक चैनल पर एंकर परमाणु बम से बचने का ज्ञान दर्शकों के लिए बघार रहा था. अरे भाई अभी तो युद्ध की आशंका भर थी और तुम परमाणु हमला और उससे बचने के अवैज्ञानिक तरीके सिखाने चले. एंकर बता रहा  था कि परमाणु हमला होते ही पहले स्नान करने के लिए बाथरूम में चले जाओ. हे महाज्ञानी, परमज्ञानी एंकर परमाणु हमले में जिंदा बचेंगे तो नहांगे न? पिछले साल टोक्यो ओलंपिक में भारतीय महिला मुक्केबाज लवलीना बोरेन पदक के लिए रिंग में थीं और इधर भारत में एक रिपोर्टर लवलीना के घर पर माइक थामे पहुंच चुका था. पहुंचा सो ठीक है लेकिन हाथ में उसके मुक्केबाजी के ग्लव्ज थे और सिर पर हैल्मेट. क्या है यह? 

जिन लोगों ने अस्सी और नब्बे के दशक की दूरदर्शन की पत्रकारिता देखी है वह उछल कूद करनेवाली पत्रकार, नाभी से ताकत लगाकर चीखनेवाले एंकरों को कभी नहीं सराहेंगे. दूरदर्शन की खबरों में निजी चैनलों की खबरों की तरह ताम-झाम नहीं होता था और न ही एंकर (जो उस जमाने में न्यूज रीडर कहलाए जाते थे) मटकते थे लेकिन उनके प्रस्तुतिकरण में शालीनता थी. 




Comments

Popular posts from this blog

एड गेनः इंसान की खाल में छिपा विकृत शैतान

अमेरिका और युद्ध का कारोबार