Posts

Image
  कांग्रेस को संजीवनी कौन देगा पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री तथा वरिष्ठ  भाजपा नेता नितिन गडकरी के एक वक्तव्य ने राजनीतिक हलकों में  तहलका मचा दिया।  गडकरी ने पुणें में एक अखबार के पुरस्कार समारोह में कहा कि भारतीय गणतंत्र को बरकरार रखने के लिए विपक्षी कांग्रेस का अस्तित्व जरूरी है, उसका मजबूत होना जरूरी है।  गडकरी का यह बयान उनकी पार्टी की ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत की भूमिका से बिल्कुल अलहदा है।  बहरहाल, गडकरी ने कांग्रेस को भारतीय गणतंत्र के लिए जरूरी बताकर एक नई बहस छेड़ दी। यह बयान किस परिप्रेक्ष्य में दिया गया इसका खुलासा गडकरी स्वयं ही कर सकते हैं। हो सकता है भाजपा ने ही  किसी खास रणनीति के तहत उनसे यह बुलवाया हो लेकिन मेरा स्पष्ट मत है कि गडकरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिढ़ाने के लिए  यह ‘कंटिला’ बयान दिया। गडकरी और मोदी के दरम्यान अंदरुनी टकराव सर्वविदित है। दोनों में आत्मियता और एक दूसरे के प्रति सम्मान का अभाव है। गडकरी ने परोक्ष रूप से इस बात को लोगों तक पहुंचाया भी है लेकिन जो भी हो इस सीनियर भाजपाई ने जिस मंशा से कांग्रेस की वकालत की औ...
Image
  डांसर रिपोर्टर  भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पत्रकारिता की उड़तीं धज्जियों के बीच एक उछल कूद करने वाली पत्रकार अवतरित हुई हैं. एक समाचार चैनल की यह पत्रकार यूक्रेन से जिस अंदाज में रिपोर्टिंग कर रही  हैं उसे देख दर्शक हंसे या रोए या फिर पत्रकार को साष्टांग प्रणिपात करें यह तय नहीं कर पा रहे हैं. मोहतरमा के कुछ वीडियो ट्विटर पर वायरल हुए हैं. पत्रकारिता की यह शोकांतिका है या नए युग का सूत्रपात?  शाजिया निसार नाम की यह पत्रकार रिपोर्टिंग के दौरान इतनी उछल रही हैं, इतनी कूद रही हैं कि लगता है जैसे बैठे-बैठे या खड़े होकर एंकरिंग करनेवालों की जमात एकदम मूर्ख है. क्या रिपोर्टिंग ऐसे भी हो सकती है?  खबरों के ऐसे वाहियात और हांस्यरस से भरपूर  प्रस्तुतिकरण के कारण शाजिया कि सोशल मीडिया पर खिल्ली उड़ाई जा रही है. कोई उन्हें बंदरिया तो कोई नचनिया कह रहा है।  खबरों के प्रस्तुतीकरण में कुछ नया कर दिखाने की शाजिया की यह कोशिश अत्यधिक फूहड़ और निहायत ही बचकानी है. हो सकता है चैनल के मालिक ने ऐसा करने के लिए उन्हें प्रेरित किया हो और उद्येश्य वहीं...चैनल की टीआरपी बढ़ा...

रिम झिम गिरे सावन....

Image
बरसात का मौसम और सावन की फुहारों के बीच अगर फिल्म ‘मंजिल’ का नग्मा ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’ का स्मरण न हो तो मुझे लगता है यह इस लाजवाब, उम्दा रचना की घोर तौहीन होगी। बॉलीवुड की फिल्मों में बरसात विषय पर कई कर्ण प्रिय, मधुर गीत लिखे गए हैं लेकिन ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’ तो जैसे कालजयी, अजरामर है। निर्देशक बासु चटर्जी की फिल्म ‘मंजिल’ को प्रदर्शित हुए 42 साल बीत चुके हैं लेकिन ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’ की ताजगी यथावत है। फिल्म की रईस प्रेमिका अरुणा (मौसमी चटर्जी) को अपना बनाने के लिए गरीब, बेरोजगार नायक अजय (अमिताभ बच्चन) का जी तोड़ प्रयास फिल्म की केंद्रीय कल्पना है। सन 1965 में प्रदर्शित बंगाली फिल्म ‘आकाश कुसुम’ की रिमेक ‘मंजिल’ की कहानी में अमिताभ के चिर परिचित ‘एंग्री यंग मैन’ के किरदार को स्थान नहीं है। अमिताभ और मौसमी के बीच रास्ते में गलतफहमी के रोचक प्रसंग से फिल्म की शुरुआत होती है और तुरंत बाद ही एक विवाह समारोह में अमिताभ गाते हैं ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’। यहीं पर मौसमी के दिल में अमिताभ के लिए जगह बन जाती है। ...

इश्तहार फंडा

Image
  टीवी पर दिखाए जा रहे इश्तेहारों की गोलमोल भाषा और उनका प्रस्तुतिकरण अक्सर ललचाने वाला होता है। चूहा मारने की दवा भी इश्तेहार में ऐसी दिखाई जाती है जैसे बहुत आला दर्जे का उत्पाद बेच रहे हो।  दवा आपके घर खाकर चूहे बाहर जाकर मरेंगे...क्या चूहों को पता है कि बाहर जाकर मरना है? या दवा उन्हें बाहर जाकर मरने के लिए प्रेरित कर रही है...ऐसे दावों पर भरोसा हम कर भी लेते हैं ...और कालों को गोरा बनानेवाली दर्जनों फेयरनेस क्रीम की तो बात ही मत कीजिये। हर क्रीम को इस तरह से पेश किया जाता है गोया इसे चहरे पर मलने से 'सफेदी की चमकार' निकलेगी। बहुत पुराना मामला है। एक बहुचर्चित और सर्वाधिक बिकने का दावा करनेवाली फेयरनेस क्रीम के खिलाफ मुकदमा हो गया था। क्रीम के इश्तेहार में दिखाया गया था कि एक लड़की को एयर होस्टेस की नौकरी इसलिए नकार दी जाती है क्योंकि वह सांवली है। फिर यह लड़की बहुचर्चित फेयरनेस क्रीम का प्रयोग करके गोरी हो जाती है और उसे एयर होस्टेस का जॉब मिल जाता है। इस इश्तेहार से यह संदेश जा रहा था कि गोरे लोग ही सफलता के सोपान चढ़ने में सक्षम हैं और काले तो एकदम निकम्मे। सत्य इसके विपरीत...

संवेदनहीन वर्दी

Image
  पुलिसिया अत्याचार और बर्बरता पर इंदौर की घटना के कारण फिर बहस छिड़ी है। सरकारी वर्दी पहनकर एक आदमी क्यों इतना क्रूर, वहशी बन जाता है? क्या वर्दी उसे उन्मत्त-अंधा बना देती है जो वह चोर-बदमाशों और सामान्य आदमी के बीच फर्क नहीं कर सकता? इंदौर में 35 वर्षीय ऑटो  रिक्शा चालक कृष्णा केयर को पुलिस वालों ने जिस निर्दयता से पीटा वह देख सीना फट जाता है...और उस समय क्रोध बेकाबू होने लगता है जब पीड़ित के दस-बारह बरस के मासूम असहाय बेटे को  बदहवास होकर ‘मेरे पापा को मत मारो...मेरे पापा को मत मारो’ चीखते हुए इधर-उधर दौड़ते देखा जाता है। तमाशबीन भीड़ इस घटना को सिर्फ देख रही है और कुछ लोग वीडियो बनाने में लगे हैं। हालांकि एक वीडियो की वजह से ही इस पुलिसिया जुल्म का दुनिया को पता चला।  कृष्णा अपने बेटे को लेकर बीमार पिता से मिलने अस्पताल जा रहा था। उसका कसूर केवल इतना था कि कोविड-19 से बचाव के लिए लगाया गया मास्क नाक के नीचे खिसक गया था। पुलिसवालों ने उसे रोका। मास्क को लेकर कृष्णा के साथ पुलिस की बहस हो गई। अचानक वर्दी के अंदर का शैतान जागृत हो गया। दो पुलिस कर्मी इस कदर पील पड़े जैसे...

स्त्री शक्ति की पहचान है ‘तलाक ’

Image
  स्त्री शक्ति की पहचान है ‘तलाक ’ कई लोग मेरी इस राय से शायद ही इत्तेफाक रखें कि तलाक स्त्री शक्ति का दर्पण भी है। बेशक, तलाक मानवीय जीवन की एक त्रासदी है, दाम्पत्य जीवन का दुखद पहलू है और इस पीड़ा से गुजरे व्यक्ति (महिला हो या पुरुष) के लिए नवजीवन की शुरुआत आसान नहीं रह जाती लेकिन फिर भी यह नकारात्मकता भारतीय समाज में नारी के बढ़ते रुतबे, उसका शैक्षणिक स्तर और आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर्ता को दर्शाती है। महिलाएं शिक्षित हुईं , नौकरियां करने लगीं, कई अपने पेशे में ऊंचे ओहदे पर पहुंच गईं, आर्थिक तौर पर वे आत्मनिर्भर हो गईं । ऐसे में जब कोई पति उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता है, पुरुषी अहंकार में स्त्री भावनाओं का दमन करता है, अपनी रूढ़ीवादी सोच की जंजिरों में उसे जकड़ने की कोशिश करता है तो जाहिर है पत्नी का स्वत्व जागृत होकर वह पति को चुनौती देती है। स्वत्व का ताप्तर्य अहंकार से नहीं है। स्वत्व का अर्थ है स्वयं की पहचान। महिलाएं क्यों पति के पांव की जूती बनकर जीएं? पति को ‘ईश्वर’ मान भी ले लेकिन क्या उसका आचरण उस स्तर का है? इन जैसे प्रश्नों के उत्तर महिलाएं शिक्षित होकर पाने लगी हैं और उ...
Image
  एक और जंग की तैयारी, अब अंग्रेजों की बारी जो खैरात में मिलती कामयाबी तो हर शख्स कामयाब होता फिर कदर न होती हुनर की और न कोई शख्स लाजवाब होता इन पंक्तियों के साथ ऑस्ट्रेलिया  में भारतीय क्रिकेट टीम की असाधारण सफलता को सलाम और अब सामना है अंग्रेजों से. जो रूट की कमान में ‘साहब लोग’ भारत पहुंच गए हैं. एक और अत्यधिक रोमांचक शृंखला का इंतजार हम सभी को है. तुलना तुलनात्मत: दोनों टीमें शक्तिशाली हैं. भारत को लाभ घरेलू माहौल में खेलने का मिलेगा. हाल की बात करें तो भारत ने कंगारुओं को उन्हीं की सरजमी पर पटका, वहीं अंग्रेज भी श्रीलंकाई चितों को उन्हीं की मांद में रौंद कर आए हैं. यानी भारत और इंग्लैंड विदेशी सरजमी पर शृंखला जीते हैं. भारत ने ऑस्ट्रेलिया में वहां की तेज गेंदबाजों की मुफीद पिच पर शानदार प्रदर्शन किया तो इंग्लैंड ने भी श्रीलंका में स्पिनरों के लिए माकुल पिचों पर दमदार प्रदर्शन किया. ऑस्ट्रेलिया में भारतीय तेज गेंदबाजों का जलवा रहा तो श्रीलंका में अंग्रेज स्पिनर रंग में थे. कुल मिलाकर दोनों टीमें ताकत में समान हैं. विदेशी सरजमी पर फतह का सेहरा बांधने से दोनों के हौसले सातव...