स्त्री शक्ति की पहचान है ‘तलाक ’
स्त्री शक्ति की पहचान है ‘तलाक ’
कई लोग मेरी इस राय से शायद ही इत्तेफाक रखें कि तलाक स्त्री शक्ति का दर्पण भी है। बेशक, तलाक मानवीय जीवन की एक त्रासदी है, दाम्पत्य जीवन का दुखद पहलू है और इस पीड़ा से गुजरे व्यक्ति (महिला हो या पुरुष) के लिए नवजीवन की शुरुआत आसान नहीं रह जाती लेकिन फिर भी यह नकारात्मकता भारतीय समाज में नारी के बढ़ते रुतबे, उसका शैक्षणिक स्तर और आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर्ता को दर्शाती है। महिलाएं शिक्षित हुईं , नौकरियां करने लगीं, कई अपने पेशे में ऊंचे ओहदे पर पहुंच गईं, आर्थिक तौर पर वे आत्मनिर्भर हो गईं । ऐसे में जब कोई पति उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता है, पुरुषी अहंकार में स्त्री भावनाओं का दमन करता है, अपनी रूढ़ीवादी सोच की जंजिरों में उसे जकड़ने की कोशिश करता है तो जाहिर है पत्नी का स्वत्व जागृत होकर वह पति को चुनौती देती है। स्वत्व का ताप्तर्य अहंकार से नहीं है। स्वत्व का अर्थ है स्वयं की पहचान। महिलाएं क्यों पति के पांव की जूती बनकर जीएं? पति को ‘ईश्वर’ मान भी ले लेकिन क्या उसका आचरण उस स्तर का है? इन जैसे प्रश्नों के उत्तर महिलाएं शिक्षित होकर पाने लगी हैं और उनकी इसी बदलती सोच की परिणीति तलाक है । तलाक को लेकर पारंपारिक सोच यही है कि पढ़ी लिखी पत्नी है, नौकरी पेशा है तो वह पति पर हावी होने की कोशिश कर रही होगी, नौकरी करने से उसे पैसोें का घमंड होगा, वह पति को अपना नौकर समझ रही होगी। ऐसा हो भी सकता है। चंद अविवेकी महिलाएं इस तरह के कुविचारों से ग्रसित होकर या स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके पति के साथ मतभेदों के बाद तलाक के स्तर तक पहुंच सकती हैं लेकिन हर मामले में ऐसा नहीं हो सकता। महिलाएं यह जान गई हैं कि बिना सुहाग भी जिंदगी बसर हो सकती है। अत: तलाक मानवीय जीवन की त्रासदी अवश्य है पर यह स्त्री को उसके स्वत्व के पहचान का अक्स है।
बहरहाल पिछले साल फरवरी में ‘ऑर्गनाइज़र’ में प्रकाशित डॉ. स्मिता शिने की एक रिपोर्ट में भारत में तलाक की दर मात्र एक फीसद के करीब होने का दावा किया गया था। रिपोर्ट कहती है -एक हजार दंपतियों में तेरह दंपति तलाक ले रही हैं। करियर के चक्कर में या फिर पारिवारिक परेशानियों से विवाह में विलंब, काम का अत्यधिक तनाव, पति-पत्नी के दांपत्य जीवन में उनके अभिभावकों की दखलंदाजी जैसे कारण भी डॉ. शिने ने अपनी रिपोर्ट में तलाक के गिनाए थे। पर अब सवाल यह है कि 130 करोड़ की आबादी वाले भारतवर्ष में तलाक कम क्यों हैं, जबकि महिलाओं में शिक्षा और आर्थिक अत्मनिर्भरता बढ़ रही है। इस सवाल का जवाब
भारत में पारिवारिक या सामाजिक रचना में है। डॉ. शिने के मुताबिक पति-पत्नी के रिश्ते जब तलाक तक पहुंच जाते हैं तो दोनों पक्षों के अभिभावक या फिर समाज के लोग मोर्चा संभाल लेते हैं और दोनों के दरमियान सुलह की कोशिश करते हैं। एक और अहम मसला है तलाक का कानून। हिंदुओं के लिए तलाक का कानून इतना जटिल है कि पति और पत्नी दोनों चाहकर भी जल्दी तलाक नहीं ले सकते। हालात उस समय और विकराल हो जाते हैं जब दोनों जीवनसाथियों में से एक तलाक देने से मना कर देता है। जवानी में तलाक के लिए अर्जी लगाए तो दोनों के बुढ़ापे तक मुकदमा चलता रहता है। फिल्म ‘दामिनी’ में तारीख पर तारीख...का संवाद शायद हिंदुओं की तलाक व्यवस्था को देखकर ही लिखा गया होगा। नरेंद्र मोदी की सरकार ने मुस्लिमों में तीन तलाक की रवायती व्यवस्था में परिवर्तन किया लेकिन हिंदुओं की पैरोकार यह सरकार हिंदुओं की तलाक व्यवस्था को कब सरल बनाएगी? सो, तलाक के कानून की जटिलता देखते हुए कई दम्पति आपस में सुलह करके जीना सीख लेते हैं। महाराष्ट्र की अगर बात करें तो वर्ष 2012 में प्रकाशित एक वेबसाइट की रिपोर्ट में यह राज्य तलाक के मामलों में देश में अव्वल था लेकिन हालिया एक रिपोर्ट में महाराष्ट्र को तलाक के मामलों में देश में आठवें नंबर पर बताया जा रहा है। अब शीर्ष स्थान पर गुजरात है।
तलाक की समस्या पर वैश्विक स्तर पर गौर करें तो लक्जमबर्ग में तलाक की दर सर्वाधिक है। इस पश्चिम यूरोपीय देश में 85 फीसदी के करीब दम्पति तलाक लेती हैं, वहीं फिलीपिंस ऐसा मुल्क है जहां तलाक ही नहीं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पति-पत्नी दोनों समझदार हो गए हैं। असल में फिलीपिंस में तलाक को गैरकानूनी घोषित कर दिया है लेकिन क्या यह कानूनी रूप से दोनों पर लादी गई बंदिश नहीं? पति और पत्नी को अपनी कामनाओं का दमन करके, अपनी इच्छाओं के विपरीत साथ-साथ रहने की यह कानूनी बाध्यता है। इस तरह के बेतुके कानून की वजह से आत्महत्याएं बढ़ने लगी हैं, हालांकि कुछ नारी संगठन अब तलाक का कानून बनाने के लिए सक्रिय हो चुके हैं। दुनिया के चौधरी अमेरिका में तलाक धन उगाही का जरिया है। कई महिलाएं धनाढ्यों से उम्र की फिक्र किए बगैर विवाह करती हैं। पति के धन पर गुलछर्रे उड़ाती हैं और फिर मोटी रकम लेकर तलाक ले लेती हैं।

Comments
Post a Comment