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‘अलोकतांत्रिक’  तहजीब में सांस घुटती र ह ी   गडकरी  क ी   नितिन गडकरी का शुमार उन चुनिंदा सियासतदांओं में है जिन्होंने मुखौटा चढ़ाकर कभी राजनीति नहीं की. ‌दोहरे चरित्रों से पटी भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में गडकरी तटस्थ रहे. साफगोई उनका स्थाई स्वभाव रहा है. कट्टर विरोधियों पर भी तारीफों के फूल बरसाने में उन्होेंने कभी कंजूसी नहीं की और अपनों को आलोचनाओं के शूल चुभाने में संकोच भी नहीं किया लेकिन बीजेपी के अंदरूनी माहौल में वे शायद दमित थे और कुपित भी. गडकरी के पिछले कुछ वक्तव्य काबिल-ए-गौर हैं. 1)अच्छे दिन आते नहीं हैं, उन्हें केवल महसूस किया जा सकता है, 2)देश में लोकतंत्र के हित में कांग्रेस का वजूद अहम है, 3)अब गांधी के समय की राजनीति नहीं रही, 4)जी चाहता है कि सियासत का परित्याग कर दूं आदि. गडकरी की यह भड़ास थी, जिससे जाहिर होता है कि उन्हें केंद्र की बीजेपी सरकार में चली आ रही ‘एकाधिकारशाही’ गुलाम होने का अहसास करा रही थी. बीजेपी में इस समय जो परिपाटी बनी है उसमें अपनी बात रखने का अधिकार शायद ही किसी के पास हो. ऐसी ‘अलोकतांत्रिक’ तहजीब में गडकरी समान खुले द...
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  जिंदगी की आशा-निराशा का  खेल ‘पार’ अस्सी के दशक में भारतीय निर्देशकों की कुशलता और अदाकारों के जीवंत अभिनय से परिपूर्ण एक से बढ़कर एक कला फिल्मों का प्रसारण दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर होता था. मुख्यधारा की फिल्मों से विलग कला फिल्मों के संसार से भारतीय दर्शकों को रू-ब-रू कराने का शानदार काम उस जमाने में दूरदर्शन ने किया. जनम, आधारशीला, पार, करंट, पार्टी, एक  रुका हुआ फैसला जैसी उच्चकोटि की कला फिल्में दूरदर्शन ने प्रसारित कर भारतीय मनोरंजन क्षेत्र के समृद्ध पक्ष को उजागर किया. इन सभी कला फिल्मों में मेरी पसंदीदी फिल्म थी ‘पार’. एक मजदूर की संघर्षपूर्ण जीवन गाथा का विवरण यानी ‘पार’ है. फिल्म के मुख्य किरदार नौरंगिया एवं उसकी पत्नी रमा के चरित्र को परदे पर साकार करने में क्रमश: नसरुद्दीन शाह तथा शबाना आजमी ने जान झोंक दी है. वहीं ओम पुरी ने गांव के प्रधान राम नरेश और उत्पल दत्त ने जमीदार के किरदार से संपूर्ण न्याय किया है.  फिल्म की पटकथा नौरंगिया और रमा के इर्दगिर्द है. बिहार में शोषित और दमित वर्ग का प्रतिनिधि मुसाहरा समाज का नौरंगिया स्वयं प्रगतिशील विचारों का ...
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 फैशन का दीवाना, 40 में भी मस्ताना 22 मई 2003. छह फुट दो इंच कद का बीस साल का एक छरहरा युवक 613 नंबर की कैप के साथ इंग्लैंड के लिए जिम्बाब्वे के खिलाफ ऐतिहासिक लॉर्ड्स पर टेस्ट पदार्पण कर रहा है. नाम है जेम्स मिशेल एंडरसन. प्यार से उसे जिमी भी बुलाया जाता है. पदार्पण टेस्ट की पहली ही पारी में एंडरसन ने पांच विकेट चटकाकर अपना डंका बजा दिया है. उसने साबित कर दिया है कि स्विंग कराने की उसमें अपार क्षमता है.  न्यूजीलैंड के खिलाफ हालिया नॉटिंघम टेस्ट की दूसरी पारी में टॉम लैथम को बोल्ड कर एंडरसन ने टेस्ट क्रिकेट में अपने 650 विकेट पूरे कर लिए. टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में एंडरसन पहले ऐसे तेज गेंदबाज हैं जो इस मुकाम पर पहुंचे.  बहरहाल इस हुनरमंद तेज गेंदबाज में एक आला दर्जे का फैशन डिजाइनर छुपा हुआ है, जो शायद बहुत कम लोगों को पता है. टेस्ट में पदार्पण के एक महीने के भीतर ही वह अपनी हेयर स्टाइल के कारण इंग्लैंड के क्रिकेट प्रेमियों में स्टार बन गए थे. उनकी स्टाइलिश रहन-सहन भी चर्चा का विषय थी. फैशन में अत्यधिक रुचि की वजह से एंडरसन की तुलना उनके हमवतन जानेमाने फुटबॉलर डेविड बेकह...
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   इस ‘विकृति’ को क्रिकेट से हटाओ  रवि शास्त्री ने तो केवल इतना ही कहा है कि टी-20 द्विपक्षीय श्रुंखलाएं बंद कर इस प्रारूप को क्रिकेट के विश्वकप के आयोजन तक सीमित कर दिया जाए लेकिन मैं और शायद मेरे जैसे कई खांटी क्रिकेट प्रेमी यह कहने का साहस करेंगे कि क्यों नहीं इस ‘विकृति’ को ही खेल से हटा दिया जाए? टी-20 सचमूच दुनिया के सबसे हसीन खेल में घुसी एक भयंकर विकृति है। एक कीड़ है जिसने रफ्ता-रफ्ता क्रिकेट की खूबसूरती, नजाकत और कुशलता को कुरेदकर रख दिया है। आईसीसी के अलावा बीसीसीआई जैसे संगठनों के लिए टी-20 निर्विवाद रूप से धन का दरिया है। आईपीएल के प्रसारण अधिकार ही बीसीसीआई तकरीबन 56 हजार करोड़ में बेचने जा रही है। ऐसे में टी-20 से उन्हें परहेज होना असंभव है, क्योंकि कोई कैसे उस कुएं को बंद कर देने की सोचेगा जहां से मीठा पानी मिल रहा है लेकिन इसका दूसरा पक्ष उतना ही काला और कड़वा है। ठीक वैसे ही जैसे फिल्म और फैशन के करियर  का नेपथ्य भयंकर, घृणित और वीभत्स है।  टी-20 क्रिकेट क्यों विकृति है और इसे खत्म कर देना ही क्यों योग्य है जैसे पहलुओं पर राय जताने से पहले जान लेत...
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  कांग्रेस को संजीवनी कौन देगा पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री तथा वरिष्ठ  भाजपा नेता नितिन गडकरी के एक वक्तव्य ने राजनीतिक हलकों में  तहलका मचा दिया।  गडकरी ने पुणें में एक अखबार के पुरस्कार समारोह में कहा कि भारतीय गणतंत्र को बरकरार रखने के लिए विपक्षी कांग्रेस का अस्तित्व जरूरी है, उसका मजबूत होना जरूरी है।  गडकरी का यह बयान उनकी पार्टी की ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत की भूमिका से बिल्कुल अलहदा है।  बहरहाल, गडकरी ने कांग्रेस को भारतीय गणतंत्र के लिए जरूरी बताकर एक नई बहस छेड़ दी। यह बयान किस परिप्रेक्ष्य में दिया गया इसका खुलासा गडकरी स्वयं ही कर सकते हैं। हो सकता है भाजपा ने ही  किसी खास रणनीति के तहत उनसे यह बुलवाया हो लेकिन मेरा स्पष्ट मत है कि गडकरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिढ़ाने के लिए  यह ‘कंटिला’ बयान दिया। गडकरी और मोदी के दरम्यान अंदरुनी टकराव सर्वविदित है। दोनों में आत्मियता और एक दूसरे के प्रति सम्मान का अभाव है। गडकरी ने परोक्ष रूप से इस बात को लोगों तक पहुंचाया भी है लेकिन जो भी हो इस सीनियर भाजपाई ने जिस मंशा से कांग्रेस की वकालत की औ...
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  डांसर रिपोर्टर  भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पत्रकारिता की उड़तीं धज्जियों के बीच एक उछल कूद करने वाली पत्रकार अवतरित हुई हैं. एक समाचार चैनल की यह पत्रकार यूक्रेन से जिस अंदाज में रिपोर्टिंग कर रही  हैं उसे देख दर्शक हंसे या रोए या फिर पत्रकार को साष्टांग प्रणिपात करें यह तय नहीं कर पा रहे हैं. मोहतरमा के कुछ वीडियो ट्विटर पर वायरल हुए हैं. पत्रकारिता की यह शोकांतिका है या नए युग का सूत्रपात?  शाजिया निसार नाम की यह पत्रकार रिपोर्टिंग के दौरान इतनी उछल रही हैं, इतनी कूद रही हैं कि लगता है जैसे बैठे-बैठे या खड़े होकर एंकरिंग करनेवालों की जमात एकदम मूर्ख है. क्या रिपोर्टिंग ऐसे भी हो सकती है?  खबरों के ऐसे वाहियात और हांस्यरस से भरपूर  प्रस्तुतिकरण के कारण शाजिया कि सोशल मीडिया पर खिल्ली उड़ाई जा रही है. कोई उन्हें बंदरिया तो कोई नचनिया कह रहा है।  खबरों के प्रस्तुतीकरण में कुछ नया कर दिखाने की शाजिया की यह कोशिश अत्यधिक फूहड़ और निहायत ही बचकानी है. हो सकता है चैनल के मालिक ने ऐसा करने के लिए उन्हें प्रेरित किया हो और उद्येश्य वहीं...चैनल की टीआरपी बढ़ा...

रिम झिम गिरे सावन....

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बरसात का मौसम और सावन की फुहारों के बीच अगर फिल्म ‘मंजिल’ का नग्मा ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’ का स्मरण न हो तो मुझे लगता है यह इस लाजवाब, उम्दा रचना की घोर तौहीन होगी। बॉलीवुड की फिल्मों में बरसात विषय पर कई कर्ण प्रिय, मधुर गीत लिखे गए हैं लेकिन ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’ तो जैसे कालजयी, अजरामर है। निर्देशक बासु चटर्जी की फिल्म ‘मंजिल’ को प्रदर्शित हुए 42 साल बीत चुके हैं लेकिन ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’ की ताजगी यथावत है। फिल्म की रईस प्रेमिका अरुणा (मौसमी चटर्जी) को अपना बनाने के लिए गरीब, बेरोजगार नायक अजय (अमिताभ बच्चन) का जी तोड़ प्रयास फिल्म की केंद्रीय कल्पना है। सन 1965 में प्रदर्शित बंगाली फिल्म ‘आकाश कुसुम’ की रिमेक ‘मंजिल’ की कहानी में अमिताभ के चिर परिचित ‘एंग्री यंग मैन’ के किरदार को स्थान नहीं है। अमिताभ और मौसमी के बीच रास्ते में गलतफहमी के रोचक प्रसंग से फिल्म की शुरुआत होती है और तुरंत बाद ही एक विवाह समारोह में अमिताभ गाते हैं ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’। यहीं पर मौसमी के दिल में अमिताभ के लिए जगह बन जाती है। ...