जिंदगी की आशा-निराशा का खेल ‘पार’
फिल्म की पटकथा नौरंगिया और रमा के इर्दगिर्द है. बिहार में शोषित और दमित वर्ग का प्रतिनिधि मुसाहरा समाज का नौरंगिया स्वयं प्रगतिशील विचारों का है. वैचारिक संघर्ष में एक दिन उसके हाथों गांव के जमीदार के भाई हरि (मोहन आगाशे) की हत्या हो जाती है. अनपढ़ नौरंगिया अपनी लुगाई रमा के साथ गांव से भाग जाता है. पेट भरने के लिए नौरंगिया के अद्भुत संघर्ष को पेश करने में फिल्म के निर्देशक गौतम घोष ने काफी मेहनत ही नहीं कि बल्कि संवेदनशीलता का परिचय भी दिया है. बहरहाल, भटकन के दौरान नौरंगिया को रमा के गर्भवती होने का पता चल जाता है और दोनों अपने गांव लौटने का फैसला करते हैं. असल, में ‘पार’ की कहानी में रोचकता यहीं से आती है. नौरंगिया के पास पैसा नहीं और उसके पत्नी की प्रसूति भी करानी है. ऐसे में नौरंगिया की मुलाकात एक बंदे से होती है जो उससे 36 सुअरों को नदी से पार कराने का सौदा करता है. एक सुअर का बारह आना. ऊपर से एक भी सुअर के गायब होने पर हवालात की हवा खिलाने की धमकी.
दो घंटे और छह मिनट की इस फिल्म की मूलकथा समरेश बासु के उपन्यास ‘पाथी’ से ली गई है. सन 1984 में प्रदर्शित यह फिल्म भारतीय समाज के स्याह पक्ष को रेखांकित करने में सक्षम है.
सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय पुरस्कार से ‘पार’ को नवाजा गया था. फिल्म के लिए नसीरुद्दीन शाह को दिया गया सर्वश्रेष्ठ अभिनेता वहीं शबाना आजमी को दिया गया सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार उनके निर्विवाद अभिनय क्षमता की तस्दिक करता है.



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