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रिम झिम गिरे सावन....

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बरसात का मौसम और सावन की फुहारों के बीच अगर फिल्म ‘मंजिल’ का नग्मा ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’ का स्मरण न हो तो मुझे लगता है यह इस लाजवाब, उम्दा रचना की घोर तौहीन होगी। बॉलीवुड की फिल्मों में बरसात विषय पर कई कर्ण प्रिय, मधुर गीत लिखे गए हैं लेकिन ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’ तो जैसे कालजयी, अजरामर है। निर्देशक बासु चटर्जी की फिल्म ‘मंजिल’ को प्रदर्शित हुए 42 साल बीत चुके हैं लेकिन ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’ की ताजगी यथावत है। फिल्म की रईस प्रेमिका अरुणा (मौसमी चटर्जी) को अपना बनाने के लिए गरीब, बेरोजगार नायक अजय (अमिताभ बच्चन) का जी तोड़ प्रयास फिल्म की केंद्रीय कल्पना है। सन 1965 में प्रदर्शित बंगाली फिल्म ‘आकाश कुसुम’ की रिमेक ‘मंजिल’ की कहानी में अमिताभ के चिर परिचित ‘एंग्री यंग मैन’ के किरदार को स्थान नहीं है। अमिताभ और मौसमी के बीच रास्ते में गलतफहमी के रोचक प्रसंग से फिल्म की शुरुआत होती है और तुरंत बाद ही एक विवाह समारोह में अमिताभ गाते हैं ‘रीम झीम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन...’। यहीं पर मौसमी के दिल में अमिताभ के लिए जगह बन जाती है। ...

इश्तहार फंडा

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  टीवी पर दिखाए जा रहे इश्तेहारों की गोलमोल भाषा और उनका प्रस्तुतिकरण अक्सर ललचाने वाला होता है। चूहा मारने की दवा भी इश्तेहार में ऐसी दिखाई जाती है जैसे बहुत आला दर्जे का उत्पाद बेच रहे हो।  दवा आपके घर खाकर चूहे बाहर जाकर मरेंगे...क्या चूहों को पता है कि बाहर जाकर मरना है? या दवा उन्हें बाहर जाकर मरने के लिए प्रेरित कर रही है...ऐसे दावों पर भरोसा हम कर भी लेते हैं ...और कालों को गोरा बनानेवाली दर्जनों फेयरनेस क्रीम की तो बात ही मत कीजिये। हर क्रीम को इस तरह से पेश किया जाता है गोया इसे चहरे पर मलने से 'सफेदी की चमकार' निकलेगी। बहुत पुराना मामला है। एक बहुचर्चित और सर्वाधिक बिकने का दावा करनेवाली फेयरनेस क्रीम के खिलाफ मुकदमा हो गया था। क्रीम के इश्तेहार में दिखाया गया था कि एक लड़की को एयर होस्टेस की नौकरी इसलिए नकार दी जाती है क्योंकि वह सांवली है। फिर यह लड़की बहुचर्चित फेयरनेस क्रीम का प्रयोग करके गोरी हो जाती है और उसे एयर होस्टेस का जॉब मिल जाता है। इस इश्तेहार से यह संदेश जा रहा था कि गोरे लोग ही सफलता के सोपान चढ़ने में सक्षम हैं और काले तो एकदम निकम्मे। सत्य इसके विपरीत...

संवेदनहीन वर्दी

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  पुलिसिया अत्याचार और बर्बरता पर इंदौर की घटना के कारण फिर बहस छिड़ी है। सरकारी वर्दी पहनकर एक आदमी क्यों इतना क्रूर, वहशी बन जाता है? क्या वर्दी उसे उन्मत्त-अंधा बना देती है जो वह चोर-बदमाशों और सामान्य आदमी के बीच फर्क नहीं कर सकता? इंदौर में 35 वर्षीय ऑटो  रिक्शा चालक कृष्णा केयर को पुलिस वालों ने जिस निर्दयता से पीटा वह देख सीना फट जाता है...और उस समय क्रोध बेकाबू होने लगता है जब पीड़ित के दस-बारह बरस के मासूम असहाय बेटे को  बदहवास होकर ‘मेरे पापा को मत मारो...मेरे पापा को मत मारो’ चीखते हुए इधर-उधर दौड़ते देखा जाता है। तमाशबीन भीड़ इस घटना को सिर्फ देख रही है और कुछ लोग वीडियो बनाने में लगे हैं। हालांकि एक वीडियो की वजह से ही इस पुलिसिया जुल्म का दुनिया को पता चला।  कृष्णा अपने बेटे को लेकर बीमार पिता से मिलने अस्पताल जा रहा था। उसका कसूर केवल इतना था कि कोविड-19 से बचाव के लिए लगाया गया मास्क नाक के नीचे खिसक गया था। पुलिसवालों ने उसे रोका। मास्क को लेकर कृष्णा के साथ पुलिस की बहस हो गई। अचानक वर्दी के अंदर का शैतान जागृत हो गया। दो पुलिस कर्मी इस कदर पील पड़े जैसे...

स्त्री शक्ति की पहचान है ‘तलाक ’

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  स्त्री शक्ति की पहचान है ‘तलाक ’ कई लोग मेरी इस राय से शायद ही इत्तेफाक रखें कि तलाक स्त्री शक्ति का दर्पण भी है। बेशक, तलाक मानवीय जीवन की एक त्रासदी है, दाम्पत्य जीवन का दुखद पहलू है और इस पीड़ा से गुजरे व्यक्ति (महिला हो या पुरुष) के लिए नवजीवन की शुरुआत आसान नहीं रह जाती लेकिन फिर भी यह नकारात्मकता भारतीय समाज में नारी के बढ़ते रुतबे, उसका शैक्षणिक स्तर और आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर्ता को दर्शाती है। महिलाएं शिक्षित हुईं , नौकरियां करने लगीं, कई अपने पेशे में ऊंचे ओहदे पर पहुंच गईं, आर्थिक तौर पर वे आत्मनिर्भर हो गईं । ऐसे में जब कोई पति उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता है, पुरुषी अहंकार में स्त्री भावनाओं का दमन करता है, अपनी रूढ़ीवादी सोच की जंजिरों में उसे जकड़ने की कोशिश करता है तो जाहिर है पत्नी का स्वत्व जागृत होकर वह पति को चुनौती देती है। स्वत्व का ताप्तर्य अहंकार से नहीं है। स्वत्व का अर्थ है स्वयं की पहचान। महिलाएं क्यों पति के पांव की जूती बनकर जीएं? पति को ‘ईश्वर’ मान भी ले लेकिन क्या उसका आचरण उस स्तर का है? इन जैसे प्रश्नों के उत्तर महिलाएं शिक्षित होकर पाने लगी हैं और उ...
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  एक और जंग की तैयारी, अब अंग्रेजों की बारी जो खैरात में मिलती कामयाबी तो हर शख्स कामयाब होता फिर कदर न होती हुनर की और न कोई शख्स लाजवाब होता इन पंक्तियों के साथ ऑस्ट्रेलिया  में भारतीय क्रिकेट टीम की असाधारण सफलता को सलाम और अब सामना है अंग्रेजों से. जो रूट की कमान में ‘साहब लोग’ भारत पहुंच गए हैं. एक और अत्यधिक रोमांचक शृंखला का इंतजार हम सभी को है. तुलना तुलनात्मत: दोनों टीमें शक्तिशाली हैं. भारत को लाभ घरेलू माहौल में खेलने का मिलेगा. हाल की बात करें तो भारत ने कंगारुओं को उन्हीं की सरजमी पर पटका, वहीं अंग्रेज भी श्रीलंकाई चितों को उन्हीं की मांद में रौंद कर आए हैं. यानी भारत और इंग्लैंड विदेशी सरजमी पर शृंखला जीते हैं. भारत ने ऑस्ट्रेलिया में वहां की तेज गेंदबाजों की मुफीद पिच पर शानदार प्रदर्शन किया तो इंग्लैंड ने भी श्रीलंका में स्पिनरों के लिए माकुल पिचों पर दमदार प्रदर्शन किया. ऑस्ट्रेलिया में भारतीय तेज गेंदबाजों का जलवा रहा तो श्रीलंका में अंग्रेज स्पिनर रंग में थे. कुल मिलाकर दोनों टीमें ताकत में समान हैं. विदेशी सरजमी पर फतह का सेहरा बांधने से दोनों के हौसले सातव...
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 शादी लड़के के घर लड़की की कोविड काल में इससे आदर्श विवाह शायद ही कोई हो, जिसका जिक्र मैं करने जा रहा हूं. बल्कि, सामान्य काल में भी इसे अनुकरणीय मानकर एक आदर्श विवाह संस्था के तौर पर स्थापित करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. गत वर्ष विवाह सुनिश्चित हुआ था लेकिन फिर कोविड के संक्रमण से दुनिया के चक्के जैसे थम गए. विवाह की तिथि टलती रही..टलती रही. अब जब स्थितियां सामान्य होने लगीं तो फिर नवीनतम तिथि निश्चित हुई लेकिन समस्या थी विवाह स्थल को लेकर. लड़की वाले नागपुर से बाहर के थे. विवाह तय करने के दौरान ही फैसला हुआ था कि शादी नागपुर में संपन्न कराई जाएगी. इस फैसले को बदलना मुमकिन नहीं हो रहा था. वधू पक्ष भी पसोपेश में था कि नागपुर में विवाह कहां कराए. कोविड का खौफ और साथ ही चुनिंदा निमंत्रितों की मेहमान नवाजगी पर लाखों लुटाना भी लड़कीवालों को नागवार गुजर रहा था इसलिए मंगल कार्यालय का विकल्प नापसंद था. अंतत: विवाह को लड़के के घर पर ही संपन्न कराने का विकल्प सामने आया. लड़कीवाले राजी हो गए. लड़की को लड़के के घर लाकर चुनिंदा लोगों के बीच सादगीपूर्ण विवाह रचाया गया. विवाह से पूर्व लड़...

adruhya

अदृश्य  प्रोफेसर भास्कर ने लैपटॉप के की बोर्ड पर पिछले ढाई घंटे से अविरत चल रहीं अपनी उंगलियों को विराम दिया और आदतन सामने वाली घड़ी पर नजर दौड़ाई. घड़ी की सुइयां नब्बे अंश का कोन दिखा रही थीं. ‘माई गॉड...रात तो लगभग गुजर ही चुकी है. तीन बज रहे हैं. कमबख्त समय भी ऐसे दौड़ता है कि चैन नहीं लेने देता. खैर...’ प्रोफेसर भास्कर बुदबुदा रहे थे. लैपटॉप स्वीच ऑफ करके वह ऊपरी माले वाले बेडरूम से नीचे करीने से सजाए गए हॉल में आए. फिर उनके कदम अपने आप किचन की ओर मुड़ गए. उन्होंने फ्रिज खोला, बोतल निकाली. पानी पीकर वह बरामदे में आ गए और भारी भरकम प्रवेशद्वार के पास खड़े हो गए. दस मिनट तक प्रोफेसर ऐसे ही खड़े रहकर सामनेवाली सड़क पर हवा की रफ्तार से गुजरते वाहनों को देखने के बाद बेडरूम में लौटकर निद्रा को आलिंगन देने वाले थे.    -----  पिछले 32-33 सालों से प्रोफेसर की रातें इसी तरह बीत रही थीं.  सेवानिवृत्ति से पूर्व नागपुर के एक नामचीन महाविद्यालय से उनका वास्ता था. सुहासिनी की रहस्यमयी गुमशुदगी के बाद प्रोफेसर टूट से गए थे लेकिन फिर वे संभले. जीवनसंगीनी के वियोग के गम ...