adruhya

अदृश्य 
प्रोफेसर भास्कर ने लैपटॉप के की बोर्ड पर पिछले ढाई घंटे से अविरत चल रहीं अपनी उंगलियों को विराम दिया और आदतन सामने वाली घड़ी पर नजर दौड़ाई. घड़ी की सुइयां नब्बे अंश का कोन दिखा रही थीं. ‘माई गॉड...रात तो लगभग गुजर ही चुकी है. तीन बज रहे हैं. कमबख्त समय भी ऐसे दौड़ता है कि चैन नहीं लेने देता. खैर...’ प्रोफेसर भास्कर बुदबुदा रहे थे. लैपटॉप स्वीच ऑफ करके वह ऊपरी माले वाले बेडरूम से नीचे करीने से सजाए गए हॉल में आए. फिर उनके कदम अपने आप किचन की ओर मुड़ गए. उन्होंने फ्रिज खोला, बोतल निकाली. पानी पीकर वह बरामदे में आ गए और भारी भरकम प्रवेशद्वार के पास खड़े हो गए. दस मिनट तक प्रोफेसर ऐसे ही खड़े रहकर सामनेवाली सड़क पर हवा की रफ्तार से गुजरते वाहनों को देखने के बाद बेडरूम में लौटकर निद्रा को आलिंगन देने वाले थे.   
----- 
पिछले 32-33 सालों से प्रोफेसर की रातें इसी तरह बीत रही थीं.  सेवानिवृत्ति से पूर्व नागपुर के एक नामचीन महाविद्यालय से उनका वास्ता था. सुहासिनी की रहस्यमयी गुमशुदगी के बाद प्रोफेसर टूट से गए थे लेकिन फिर वे संभले. जीवनसंगीनी के वियोग के गम में डूबने के बजाय प्रोफेसर ने पुस्तकों को अपना हमसफर चुना और जिंदगी को रेगिस्तान बनने से बचा लिया.  सुहासिनी की तलाश में उन्होंने आकाश-पाताल एक कर दिया था. पुलिस की मदद ली और यहां तक कि हितैषियों द्वारा दबाव डालने के बाद कई बाबाओं के दरबार में पहुंचकर उन्होंने मत्था भी  टेका, जबकि बाबा या ओझा तो दूर ही रहे आत्मा-परमात्मा, ईश्वर की अवधारणा ही  प्रोफेसर के जीवन में महत्वहीन थी. 
समय अपनी रफ्तार से दौड़ता रहा. सुहासिनी की गुमशुदगी को पांच बरस बीत गए.  सगे-संबंधियों, मित्रों ने प्रोफेसर के पीछे दूसरी शादी करने का तगादा लगाया लेकिन सांसारिक जीवन में पुन:प्रवेश के सुझाव प्रोफेसर को दंश करते थे. उन्होंने पुनर्विवाह से स्पष्ट इनकार कर दिया लेकिन फिर भी भरी जवानी में प्रोफेसर की तन्हाई उनके प्रियजनों से देखी नहीं जा रही थी. उनपर तरस खाकर कुछ साथी तो रिश्ते भी ले आए, पर प्रोफेसर अपने उसूलों के पक्के थे. उनका एक ही फलसफा था, ‘कहीं, सुहासिनी लौट आ गईं तो... वह मुझे क्या कहेगी? उसकी निगाहों में मैं गिर जाऊंगा.’ प्रोफेसर भास्कर जिद नहीं छोड़ रहे थे. उनके साथियों ने अंतत: हार मान ली और प्रोफेसर को उनके हाल पर छोड़ दिया. महाविद्यालय में अध्यापन के अतिरिक्त प्रोफेसर घर पर पुस्तकों का पठन करते थे और उनका लेखन कार्य भी प्रचुर था. विगत 20-22 वर्षों में विभिन्न विषयों पर लिखी गईं प्रोफेसर की 15 पुस्तकें काफी लोकप्रिय तो रहीं हीं कुछ विद्यार्थियों ने उनकी साहित्य कृतियों पर डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त कर ली थी. वे सिद्धहस्त लेखक की तरह थे. यदि किसी विषय पर लिखने का प्रण कर लिया तो फिर घंटों तक और देर रात्रि तक लैपटॉप छोड़ते नहीं थे. उनका अध्ययन के साथ मनन और चिंतन इतना व्यापक था कि शब्दों में बद्ध विचारों का दरिया लैपटॉप या मोबाइल स्क्रीन पर बड़ी तेजी से उतर जाता था.  रात दो-तीन बजे तक लैपटॉप पर काम करते रहना प्रोफेसर भास्कर के लिए आम बात थी. 
--------
प्रोफेसर हर रात की तरह उस रात भी बंगले के प्रवेशद्वार से सड़क को निहार रहे थे. इस जगह को लेकर प्रोफसर के दिल में खास लगाव था. यही वह जगह है जहां प्रोफेसर को कई समस्याओं के समाधान मिल जाते थे. लेखन के विषय उन्हें यहां सूझ जाते थे और यहां दिमाग में चल रही कई तरह की उधेड़बून से उन्हें मुक्ति मिल जाती थी. इसलिए यह स्थान उनके लिए ‘लकी’ था. सड़क पार एक उद्यान था. बीस बरस पहले स्थानीय महानगर प्रशासन ने करीब चार एकड़ में इस उद्यान का निर्माण किया था. पहले यहां विशाल बंजर भूखंड था. महानगर पालिका ने इसे सुंदर उद्यान के तौर पर विकसित कर क्षेत्र को खूबसूरत बना दिया.  बच्चों के खेलने के उपकरण और वॉकिंग जोन ने उद्यान की सुंदरता में चार चांद लगा दिए. यह उद्यान बुजुर्गों और पेंशनरों के लिए समय व्यतीत करने की शानदार जगह बन गया. सड़क से गुजर रहे वाहनों पर से प्रोफेसर भास्कर की नजर उद्यान की ओर गई. उद्यान के द्वार से महज बीस फुट की दूरी पर बेंच पर कोई आकृति नजर आ रही थी. उसकी पीठ किस दिशा में है, मुख किस तरफ है कुछ पता नहीं पड़ रहा था. ‘अरे...इतनी रात को यह कौन आगंतुक है.’ प्रोफेसर सोचने लगे. 
‘...बैठा है या बैठी है. अभी तो वह स्री लग रही है. बाल लंबे हैं और कोई साड़ीनुमा वस्त्र उसके शरीर पर है.’ प्रोफेसर गहरी सोच में डूबे. फिर वह गौर से निहारने लगे...‘अरे अभी तो यह पुरुष दिख रहा है. आखिर यह बंदा है या बंदी है. मगर इस वक्त उद्यान में इसने दस्तक कैसे दी. शाम ढलते ही उद्यान कर्मी ताला लगा देते हैं. एक भी दरवाजा खुला नहीं रहता और यह यहां आराम से बैठा है. जरा देखूं तो माजरा क्या है. सुबह गणेश को इस बारे में जरूर बताऊंगा. कमसे कम उसे अखबार में छापने के लिए एक स्टोरी तो मिल ही जाएगी कि चौ तरफा बंद उद्यान में देर रात को अंजान शख्स कैसे घुस आया.’ प्रोफेसर भास्कर बाहर सड़क की ओर बढ़ने लगे. सड़क पर वाहनों के हेड लाइट की लपलपाती सुनहरी रोशनी से प्रोफेसर की आंखें चुंधिया रही थीं. मगर ध्यान उनका उद्यान में बेंच पर आसन्न रहस्यमी आकृति की ओर था. अचानक बाएं ओर से आ रहे एक ट्रक के कर्णकर्कश हॉर्न ने प्रोफेसर को रुकने के लिए विवश कर दिया. बेहद तेज गति से आ रहे ट्रक को प्रोफेसर ने सामने से गुजरते देखा और उतनी देर में उनकी  निगाहें उद्यान में बैठी आकृति से विलग हो गईं. आकृति और प्रोफेसर के दरमियान ट्रक मुश्किल से पांच सेकेंड से भी कम समय तक रहा होगा. ट्रक के गुजरते ही प्रोफेसर आगे बढ़े...मगर यह क्या बेंच रिक्त था. वहां कोई आकृति नहीं थी. प्रोफेसर भास्कर की हैरत का कोई ठिकाना नहीं रहा. चंद सेकेंड पहले जिसे उन्होंने सामने देखा था वह अचानक अदृश्य ! प्रोफेसर का मस्तिष्क काम नहीं कर रहा था. कुछ पल के लिए वे ठहर गए और सिहर भी गए. पाथर नेत्रों से उद्यान के बेंच को वे निहारते रहे. लंबी सांस ली और लौटने के लिए पीछे मुड़ ही रहे थे तो बंगले के हॉल का दरवाजा हलका सा खोलने का और भीतर किसी के घुस जाने का एहसास उन्हें हुआ. प्रोफेसर के लिए यह विचित्र आभास थे. कुछ मिनट पहले वे उद्यान में किसी रहस्यमयी आकृति को देखते हैं, पता नहीं चल पाता कि वह नर है या नारी, तहकीकात के लिए बढ़ते हैं तो आकृति अदृश्य है और अब बंगले में किसी के घुस आने का एहसास हो रहा है. बाप रे बाप...प्रोफेसर का सिर भन्ना रहा था. वह तेज कदमों से अपने बंगले में लौटे. हॉल में देखा तो कोई नहीं था. कौन हो सकता है या सिर्फ आभास था. कोई पिशाच तो नहीं? पल दो पल के लिए प्रोफेसर सोचते रहे...‘मैं भी कहां बेतुकी बातों पर सोच रहा. जमाना चांद और मंगल पर चला गया और मैं भूत-प्रेतों की बातें सोच रहा हूं...और मेरा तो शुरू से ही भरोसा नहीं रहा ऐसी बकवास पर.’  हॉल की बत्ती बंद करके वे बेडरूम में आए.  3.30 बजे थे. बिस्तर पर पड़े-पड़े  पिछले आधे घंंटे के घटनाक्रम का चक्र एक बार फिर उनके मन-मस्तिष्क में घूमने लगा लेकिन नींद ने उन्हें कब अपनी आगोश में लिया पता नहीं चला.
--------
 सुबह आठ बजे कॉल बेल की ‘टिंग-टॉंग’ की ध्वनि से प्रोफेसर की नींद टूटी. यह गौरी थी जो पिछले कुछ वर्षों से प्रोफेसर के लिए सुबह-शाम की चाय बनाने के अलावा भोजन बनाने और कपड़े धोने का काम करती थी. प्रोफेसर बड़े बेमन से हॉल में आए. उन्होंने दरवाजा खोला तो गौरी भीतर आ गई.
‘देख गौरी, चाय बनाकर थर्मास में रख देना. रात देर तक मैं सो नहीं सका था. इसलिए और सोने जा रहा हूं...और ...कुछ नहीं...जा तू चाय बना.’
‘जी चाचा जी...अच्छा आज खाने में क्या बनाऊं?’
‘तुझे जो पसंद है बना लेना...अभी तू चाय बनाकर चली जा. बादमें आ जाना.’
‘जी’
प्रोफेसर फिर सोने बेडरूम में चले गए. दुबारा जब नींद खुली तो ग्यारह बज चुके थे. प्रात: विधियों को विराम देने के बाद  प्रोफेसर भास्कर हॉल में आए. गौरी कब की जा चुकी थी और अखबारों को मेज पर रख गई थी. प्रोफेसर किचन में गए. गौरी ने उनकी आज्ञा का अनुपालन किया था. चाय थर्मास में रख दी गई थी. प्रोफेसर ने पीछे अलमारी खोली. उन्हें तलाश थी उनके प्रिय कांच के गिलास की, जिसमें वे रोज चाय पीते थे. कोना-कोना देख लिया पर गिलास नहीं था. हताशा में उन्होंने चाय लेने के लिए कप उठाया और मुड़कर थर्मास उठाते कि उनके कदम ठिठक गए. जिस गिलास की तलाश उन्हें थी वह थर्मास के पास चाय भरकर रखा हुआ था. गर्म चाय से बाफ निकल रही थी. प्रोफेसर के कुछ समझ में  नहीं आ रहा था. ‘क्या मैं भूल रहा हूं? कहीं मैंने ही तो गिलास में चाय नहीं रख दी थी? नहीं...नहीं...ऐसा नहीं हो सकता. बूढ़ा जरूर हुआ पर भुलक्कड़ नहीं.’ प्रोफेसर ने थर्मास खोलकर देखा. चाय का निशान बाकी रह गया था. प्रोफेसर के माथे पर पसीने की बूंदें थीं. उन्होंने चाय वहीं छोड़ दी और हॉल में आकर अखबार पढ़ने लगे थे. खबरों को पूरा पढ़ने में उनका मन नहीं लग रहा था. रात को उद्यान में किसी रहस्यमयी आकृति का नजर आना, फिर उसका अदृश्य हो जाना, घर में किसी के प्रवेश का आभास और अब चाय वाला मामला...सारे घटनाक्रमों ने प्रोफेसर को किंकर्तव्यमूढ़ कर दिया.  15-20 मिनट में उन्होंने अखबारों में केवल समाचारों के शीर्षक पढ़े. प्रोफेसर पहले कभी भी इतने बेचैन नहीं थे. उनका विचारचक्र तीव्रता से घूम रहा था. सारा वातारण उदासी भरा लग रहा था.  ‘जो कुछ भी घट रहा है, कहीं भविष्य में किसी अनिष्ट के पदचाप तो नहीं? क्या हो सकता है?’ प्रोफेसर ने स्वयं को संभाला. ‘अरे नहीं...मैं भी किस तरह का विचार कर रहा. मन तो अथाह है. कमबख्त वह भी सोच लेता है जो हमारा शत्रु तक नहीं सोच सकता...मन जितना गहरा है उतना ही उथला भी है. जितना हलका उतना जड़ भी है. चलो पहले नाहकर आता हूं और फिर गणेश को फोन करके सबकुछ बताता हूं...लेकिन नहीं...उसे ही यहां बुला लेना ठीक रहेगा. ऐसा करता हूं पहले फोन करके गणेश को बुलाता हूं और फिर नहाता हूं.’ सचमुच प्रोफेसर भास्कर अत्यंत विचलित थे. मन इतना अस्थिर था कि उनकी निर्णयक्षमता भी जवाब देने लगी थी. मनुष्य चाहे जितना उच्चशिक्षित हो, विचारों से चाहे जितना प्रगतिशील हों लेकिन अनाकलनीय घटनाएं उसके विवेक पर ताला जड़ देती हैं.  प्रोफेसर ने अपने आईफोन से गणेश को कॉल किया और बस केवल इतना कहा कि तुम जल्दी आओ मुझे तुमसे कुछ जरूरी बातें करनी हैं. गणेश ने फोन पर माजरा जानने की कोशिश की लेकिन प्रोफेसर ने कहा-पहले यहां आओ, ऐसे नहीं बता सकता. 
गणेश और प्रोफेसर के बीच उम्र में दस साल का  फासला था और दोनों में याराना तीस साल पुराना. प्रोफेसर अगर किसीसे अपने अंतर्मन की बातें साझा करते तो वह गणेश ही थे. गणेश नागपुर के ही एक प्रतिष्ठित अखबार में वरिष्ठ खबरनवीस थे और विभिन्न विषयों पर उनकी पकड़ थी. 
------- 
प्रोफेसर गुसलखाने में आए. उन्होंने गीजर का बटन दबाया. मौसम चाहे जो हो गर्म पानी से नहाने की प्रोफेसर की आदत थी. तौलिया बाहर ही भूल गए थे. तौलिया लेने के लिए प्रोफेसर बाहर आए और वापस गुसलखाने लौटे. दरवाजा खोला तो एक और हैरतनाक घटना उनका इंतजार कर रही थी. शॉवर अपने आप शुरू हो चुका था और गर्म पानी का फव्वारा तेजी से छूट चुका था. अब तो प्रोफेसर के पांव तले की जमीन धसकने लगी थी. बदहवास होकर वे शॉवर से बरसते पानी को देखते रह गए. अब तो स्नान की तनिक भी इच्छा नहीं थी.  डरते हुए वे गुसलखाने के भीतर गए, गीजर ऑफ कर दिया और शॉवर भी बंद किया. तेज कदमों से बेडरूम में पहुंचे और कपड़े बदलकर हॉल में गणेश की प्रतीक्षा करने लगे. वे टकटकी लगाए बंगले के द्वार की ओर देख रहे थी.  मोबाइल की रिंग ने उनकी तंद्रा टूटी. गणेश कॉल कर रहे थे.
‘हैलो...गणेश कब आ रहे हो. मैं तुम्हारा बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं.’
‘प्रोफेसर मुझे आधा घंटा विलंब होगा. दफ्तर के किसी जरूरी काम से मुझे जाना पड़ रहा है. जल्द ही आता हूं.’ 
प्रोफेसर के लिए समय व्यतीत करना पहाड़ काटने जैसा था. गणेश को बताने के लिए वे अधीर हुए जा रहे थे. तभी गौरी आ गई. प्रोफेसर को थोड़ी राहत मिली. चलो कोई तो साथ आया.  
गौरी का फिर वही सवाल, ‘चाचाजी, खाने में क्या बनाऊं?’ 
प्रोफेसर का वही जवाब, ‘तुझे जो पसंद है वह ही बना ले.’ 
प्रोफेसर की वैसे तो खाने में बिल्कुल ही दिलचस्पी नहीं थी. मगर गौरी को असलीयत बताई भी तो नहीं जा सकती थी. एक आदमी के लिए खाना पकाने में ऐसा कितना समय लगेगा. पंध्रह-बीस मिनट में ही गौरी ने तीन चपातियां, दाल, भात और लौकी की सब्जी बना दी और चली गई. जाते हुए यह बताना नहीं भूली कि चाचाजी शाम को आकर रात का खाना बना दूंगी.  गणेश आए तो प्रोफेसर को अच्छा लगा. गणेश ने आते से ही अपनी सिगरेट सुलगाई. प्रोफेसर की सूरत तेजहीन थी. काफी परेशान थे. 
‘कुछ परेशान लग रहे हो प्रोफेसर?’ गणेश ने पूछा.
‘हां...कुछ परेशान नहीं...काफी परेशान हूं...अच्छा ये बताओ आज के विज्ञानवादी संसार में भूत-पिशाच हो सकते हैं क्या?’ 
प्रोफेसर से इस तरह के सवाल की उम्मीद गणेश को हरगिज नहीं थी. पल-दो पल खामोश रहने के बाद गणेश ने कहा, ‘यह क्या कह रहे हो...तुम यह क्यों पूछ रहे हो?’
‘हां...समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं? इसीलिए तुम्हें बुलाया.’
‘अब अधिक पहेलियां न बुझाओ. बताओ क्या हुआ है.’ 
प्रोफेसर भास्कर ने रात और फिर दिन की घटनाओं की गणेश को सिलसिलेवाल जानकारी दी. गणेश को काटों तो खून नहीं. उनके भी मन-मस्तिष्क में तूफान उठा था. प्रोफेसर भास्कर झूठ नहीं बोल सकते थे. या तो वे सत्य बयां कर रहे थे या फिर कोई मनोवैज्ञानिक बीमारी ने उन्हें अपनी गिरफ्त में कर लिया था. गणेश के लिए प्रोफेसर का यह आचरण अनाकलनीय था लेकिन वे किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले प्रोफेसर से और चर्चा करना चाहते थे. 
‘प्रोफेसर तुम घबराओ नहीं. सचमूच मामला बड़ा गंभीर है. मैं आज छुट्टी लेकर शाम को आता हूं. फिर बात करते हैं.’ गणेश ने विदा ली. दरअसल प्रोफेसर को गणेश मनोचिकित्सक के पास ले जाना चाहते थे और इसके लिए अप्वाइंटमेंट जरूरी थी. प्रोफेसर के सामने मनोचिकित्सक को फोन करना गणेश ने उचित नहीं समझा और वह चले गए.  गणेश के जाते ही प्रोफेसर किचन में आए. देखते तो क्या, खाने की मेज पर थाली सजी हुई थी. गिलास में पानी था और जग भी भरकर रखा गया था. प्रोफेसर स्वयं को मानसिक तौर पर अब पंगु महसूस कर रहे थे. सबकुछ अतार्किक था. प्रोफेसर की सांसें बहुत तेज हो चुकी थीं.  फिर ख्याल आया कि कहीं गौरी तो थाली परोसकर नहीं गई. प्रोफेसर ने तत्काल गौरी को कॉल किया. गौरी ने बताया कि रोजाना की तरह ही वह खाना डिब्बे में रख कर गई थी. उसने थाली को छुआ तक नहीं.  प्रोफेसर पर जैसे बिजली गिरी. उन्होंने गणेश को कॉल किया. 
‘क्या हुआ प्रोफेसर...फिर कुछ घटा क्या?’
‘हां...तुम वापस आ सकते हो? तुम्हें कुछ दिखाना है?’
‘हां, आता हूं पर हुआ क्या...?’
‘पहले तुम आओ. फोन पर कुछ नहीं बता सकता.’
प्रोफेसर काफी खौफजदा थे और उनकी आवाज में भी कंपन था. गणेश बीच रास्ते से लौटकर आए. प्रोफेसर ने उन्हें जूते तक नहीं निकालने दिए और करीब-करीब खींचते हुए उन्हें किचन में ले गए. 
‘देखो...देखो टेबल पर थाली देख रहे हो? यह अपने आप यहां सजी है. इसे गौरी ने नहीं रखा है. मैं गौरी से पूछ चुका हूं. वह तो सिर्फ खाना बनाकर गई थी.’
‘क्या कह रहे हो? ’
‘सच ही कह रहा हूं. कौन रख गया थाली? तुम्हें मेरी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था न, देख लो अब...अपनी आंखों से देख लो.’
गणेश के पास कहने के लिए कुछ नहीं बचा था. फिर भी एक शंका थी कि कहीं प्रोफेसर ने खुद ही थाली में भोजन रख लिया और भूल तो नहीं गए. प्रोफेसर पर उम्र तो नहीं हावी हो रही थी. स्वयं ही करना और भूल भी जाना.
गणेश ने हिम्मत दिलाते हुए कहा, ‘तुम चिंता मत करो. शाम को मिलते हैं.’
गणेश चले गए. दस मिनट बाद ही उन्होंने प्रोफेसर को फोन करके इतल्ला दे दी कि शाम को तैयार रहना हमें कहीं जाना है. करीब पांच बजे गणेश जब आए तो प्रोफेसर आहाते में ही कुर्सी लगाकर बैठे थे और गौरी चाय बना रही थी. गौरी से प्रोफेसर ने थाली में रखा खाना हटा देने को कह दिया था. गौरी हालांकि जिज्ञासावश जानना चाह रही थी कि थाली में किसने खाना रखा था लेकिन प्रोफेसर के कुछ बिगड़े मिजाज देख उसने ज्यादा बोलने की हिम्मत नहीं की. 
 गणेश को देख प्रोफेसर को सुकून हुआ. उन्होंने गौरी से गणेश के लिए भी चाय लाने को कहा. गणेश ने आते ही प्रोफेसर को बता दिया वह नामचीन  मनोचिकित्सक डॉ. मोरानी से अप्वांटमेंट ले चुके हैं और तुम्हें मेरे साथ चलना है. मनोचिकित्सक से अप्वांटमेंट के बारे में सुनते ही प्रोफेसर भास्कर का पारा चढ़ गया. वह भड़क उठे और गणेश से बोले, ‘यह क्या बेवकूफी है गणेश? तुम मुझे पागल समझ रहे हो या पागल बनाने की तैयारी कर ली है? मैं बिल्कुल तंदुरुस्त हूं. तन से भी और मन से भी.’ 
‘प्रोफेसर ऐसा नहीं है...’
‘ऐसा नहीं तो क्या? मुझे किसी मनोचिकित्सक से पास नहीं आना. दरअसल इस घर में किसी अदृश्य शक्ति का वास हो चुका है और वह मुझे छल रही है.  ऐसा करते हैं...देखते हैं और कुछ दिन लेकिन किसी भी सूरत में मुझे डॉक्टर के पास नहीं जाना.’
इसके बाद गणेश की प्रोफेसर के साथ काफी बहस हुई. ताउम्र जो शख्स ईश्वर के वजूद को चुनौती देता रहा वह अब आश्चर्यजनक रूप से भूत-प्रेत के अस्तितव को स्वीकार करने लगा था, मगर मनोचिकित्सक के पास चलने के लिए रजामंद नहीं था. प्रोफेसर के इरादे पत्थर की तरह अटल थे. गणेश को बेबसी में ही सही प्रोफेसर की बात माननी पड़ी. प्रोफेसर के खाने की चिंता गणेश को थी.  गौरी रात का भोजन बनाकर चल दी थी. प्रोफेसर को लेकर गणेश खुद किचन में गए. अबकी बार दोपहर की तरह कुछ भी नहीं था. गणेश ने खुद खाना थाली में परोसा. प्रोफेसर ने भोजन किया. गणेश ने इस दिलासे के साथ विदा ली कि घबराइए नहीं, अगर फिर कुछ ‘चमत्कारिक’ हुआ तो मुझे बुला लेना. 
रात काफी शांति से बीती.  
-------
सुबह प्रोफेसर देर से जागे. आज भी कुछ खास काम नहीं थे. दोपहर बीती. शाम हुई. सुबह से सुकून था. सब कुछ रिलैक्स. इस बीच प्रोफेसर ने गणेश को कॉल कर बताया कि दिन कोई परेशानी नहीं है. आज किसी अदृश्य ने उन्हें छेड़ा नहीं. रात के भोजन के बाद कुछ देर की चहल कदमी कर प्रोफेसर ने लैपटॉप चालू किया और परसो का आधा लेख पूरा कर लिया. करीब एक बजे वे सोने चले गए.  लगभग ढाई बजे प्रोफेसर की नींद टूटी. कुछ अजीब सा उन्हें महसूस हो रहा था. ऐसा लग रहा है किसी स्री की कोमल हथेलियां उनका बदन सहला रही हैं. आपाद मस्तक उन्हें कोई तीव्र आवेश से छू रहा था. फिर महसूस हुआ कि हाथों के पाश में वे जकड़ चुके हैं और जो हथेलियां कुछ क्षण पहले कोमल थीं वे अत्यंत कठोर बनकर गला दबाने लगी हैं. प्रोफेसर बिस्तर से लगभग कूद गए. हांफते हुए वे नीचे आए. बाप रे...अबकी बार तो प्राण ही ले लिए थे. प्रोफसर फिर अपने शयन कक्ष में नहीं लौटे. उन्होंने सुबह-सुबह गणेश को फोन करके रात की घटना का ब्योरा दिया. गणेश ने कहा, ‘देखो प्रोफेसर अब तुम कुछ मत कहो. आज तुम्हें मेरे साथ डॉ. मोरानी के पास चलना है. अब तुम कोई तर्क-वितर्क न दो. मुझे समझ में नहीं आ रहा कि तुम्हारे जैसा नास्तिक भूत-पिशाच की बात कर रहा है.’ 
--------
दोपहर बाद गणेश के साथ प्रोफेसर भास्कर डॉ. मोरानी के क्लीनिक में थे. डॉ. मोरानी ने कई सवाल प्रोफेसर से किए. उनकी जिंदगी का पूरा इतिहास जाना. वर्तमान पर बात की. जिंदगी के कई महत्वपूर्ण पड़ावों, घटनाक्रमों का विवरण लिया. देर तक बातें चलीं और डॉ. मोरानी इस नतीजे पर पहुंचे कि प्रोफेसर भास्कर एकदम स्वस्थ्य हैं लेकिन उन्हें मौजूदा हालातों से निकलने के लिए कुछ समय के लिए घर से बाहर रहना होगा. प्रोफेसर भास्कर ने डॉक्टर से कहा था कि लगातार व्यस्तताओं की वजह से सात-आठ सालों से वे कहीं नहीं गए थे। हालांकि कहीं व्याख्यानों या संगोष्ठियों के संदर्भ में वे राष्ट्र का भ्रमण कर चुके थे लेकिन किसी हिल स्टेशन जैसी जगहों पर जाकर उन्होंने छुट्टियां नहीं बिताई थीं। डॉ. मोरानी ने उन्हें कमसे कम पंध्रह दिनों तक कहीं भ्रमण कर लौटने का परामर्श दिया और इस दौरान सिर्फ एंजॉय कर अपने कार्य से अलिप्तता बनाए रखने की सख्त हिदायत दी. कुछ दवाइयां भी डॉ. मोरानी ने प्रोफेसर को लिख दी थीं. 
गणेश ने प्रोफेसर से पूछा कि कहां जाओगे. प्रोफेसर ने कहा कि राजस्थान में उनके कई मित्र हैं, जिनसे मिलने की उनकी ख्वाहिश है. फोन पर उनसे संवाद चलता रहता है लेकिन अब मौका मिल ही रहा है तो उनसे प्रत्यक्ष मिलना हो जाएगा और छुट्टियां आराम से बीतेगी. गणेश प्रोफेसर से सहमत थे. वह रात प्रोफेसर ने गणेश के घर पर ही बिताई. गणेश ने प्रोफेसर के लिए विमान का टिकट बुक कराया. प्रोफेसर दूसरे ही दिन जयपुर के लिए रवाना हुए. राजस्थान में कई स्थलों पर वे गए और तयशुदा कार्यक्रम के तहत अपने मित्रों से मिले. कई विषयों पर गुफ्तगू किया. गणेश रोजाना प्रोफेसर का हाल जानते थे. प्रोफेसर को खुश देख गणेश को अच्छा लग रहा था. जिस अदृश्य शक्ति से प्रोफेसर खौफ खा रहे थे उसकी याद तक शायद उन्हें नहीं आ रही थी. पखवाड़ा कैसे बीता पता ही नहीं चला. प्रोफेसर हवाई जहाज से ही नागपुर लौटे लेकिन गणेश व्यस्तता के कारण उन्हें लेने के लिए हवाई अड्डे नहीं जा पाए. प्रोफेसर ने ओला कैब बुक की और अपने बंगले पर पहुंचे. बंगले के हॉल का द्वार उन्होंने खोला और...और उन्हें किसी के हाथों फूलों की माला पहनाकर उनकी अगवानी करने का अहसास हुआ. प्रोफेसर के लिए यह बंगले में पखवाड़े बाद भी किसी अदृश्य गैर की उपस्थिति का इशारा काफी था. वे अपने पांवों में कंपन महसूस करने लगे. सिर झन्नाने लगा. फिर वहीं सारी बातें जो राजस्थान प्रयाण से पहले थीं. प्रोफेसर ने तत्काल गणेश से संपर्क किया. गणेश भी क्या कहते? 
बंगले में किसी अज्ञात की हाजिरी का पूर्ण यकीन प्रोफेसर को हो चुका था. अब क्या किया जाए? बंगला बेच दे या किसी स्थान पर किराये से रहने चला जाए. और यदि यह अदृष्य नए स्थान पर भी  आ गया या आ गई तो? प्रोफेसर के लिए अब एकांत अत्यधिक कठिन हो चुका था. शाम ढलने लगी थी. प्रोफेसर ने कपड़े बदले और भूखे-प्यासे ही आहाते में आकर बैठ गए और अपने मोबाइल पर मेल चेक करने लगे. नासिक से एक मेल आया था जो प्रोफेसर के लिए एक संगोष्ठि में व्याख्यान का निमंत्रण था.  विषय था ‘वर्तमान में धर्मनिरपेक्षता पर हावी सांप्रदायिक शक्तियों को कैसे नियंत्रित करें.’ प्रोफेसर का यह पसंदीदा विषय था. उन्हें इसके लिए अधिक तैयारियों की आवश्यक्ता नहीं थीं.  दो दिन बाद ही उन्हें नासिक जाना था लेकिन सवाल यह था कि अब इस भुतहा बंगले में दो दिन बिताए तो कैसे? प्रोफेसर ने हमेशा की तरह इस उलझन को गणेश के सामने रखा. गणेश ने कहा कि वह दो दिन उनके घर रह सकते हैं. गणेश को अब यकीन हो गया था कि प्रोफेसर अंदर से दहल चुके हैं. उन्होंने प्रोफेसर से बहुत कुछ नहीं कहा. दो दिन गणेश के घर बिताकर प्रोफेसर भास्कर नासिक रवाना हो गए. 
--------
संगोष्ठि राष्ट्रीय थी. देश के विभिन्न क्षेत्रों से वक्ताओं का आगमन हो चुका था. दो दिवसीय संगोष्ठि के पहले ही दिन प्रोफेसर भास्कर को अपने मंतव्य को व्यक्त करने का अवसर दिया गया था. प्रोफेसर से पहले तीन वक्ताओं के व्याख्यान हो चुके थे. सदन खचाखच भरा था. प्रोफेसर भास्कर के नाम की घोषणा हुई और वे मंच पर पधारे. 
 ‘भाइयों और बहनों. आदरणीय वक्ताओं ने मुझसे पहले धर्मनिरपेक्षता पर सांप्रदायिक हमलों से लड़ने की गहन विवेचना की है. यह दौर वाकई बड़ा मुश्किल है...’ प्रोफेसर अपने विचारों को संयत शैली में व्यक्त कर रहे थे. इस बीच श्रोताओं को प्रोफेसर के आचरण में कुछ बदलाव नजर आ रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे वे किसी को स्वयं से दूर रखने का प्रयास कर रहे हैं. फिर वह अपनी बात कहते, फिर स्वयं या तो पीछे और दाएं-बाएं हटते. श्रोता अन्यमनस्क थे कि प्रोफेसर इस तरह का विचित्र बर्ताव क्यों कर रहे हैं. प्रोफेसर ने अपने व्याख्यान को रोक देते हैं और लग रहा है कि कोई अदृश्य उन्हें लिपटकर है. वे अपनी संपूर्ण ताकत से उसे स्वयं से दूर करना चाह रहे हैं. प्रोफेसर का गला किसी ने दबा दिया है और वह अपनी दोनों हथेलियों से गले को मुक्त करने के लिए प्रयासों की पराकाष्ठा कर रहे हैं. इस बीच मंच पर उपस्थित लोग प्रोफेसर की सहायतार्थ दौड़ चुके थे लेकिन उन्हें मौका ही नहीं मिला. वे फर्श पर गिर गए. जिव्हा मुंह से बाहर लटक रही थीं और आंखें फटी हुई थीं. प्रोफेसर को तत्काल निकट के अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. अब मामला पुलिस के दरबार में था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का सबब गला दबाना लिखा गया था लेकिन रिपोर्ट में किसी तरह की उंगलियों के निशान प्रोफेसर के गर्दन पर पाए जाने का जिक्र नहीं था.  यह काम किसका था? काम जघन्या तो था ही मगर उतना ही रहस्यमयी. पुलिस अफसरान मामले की तह तक जाने की कोशिश में लगे थे. सदन में उपस्थितों से उन्होंने पूछताछ की. सभी ने कहा कि मृत्यु से पूर्व प्रोफेसर किसी अदृश्य शक्ति से जूझ रहे थे और स्वयं से उसे दूर करने का प्रयास कर रहे थे. 
--------
गणेश को उनके परममित्र की रहस्यमयी मौत की सूचना पुलिस से मिली तो वे भी तर से दहल उठे. गणेश लिए यह हादसा अकल्पनीय था. पुलिस ने गणेश को नासिक बुलाया. गणेश ने पुलिस को जांच में हर संभव मदद की. उन्होंने पुलिस को उन तमाम घटनाक्रमों का तफसील सुनाया जो विगत एक माह में प्रोफेसर की जिंदगी में घटी थीं. प्रोफेसर की शिक्षा, उनकी सेवा, विवाह और पत्नी की गुमशुदगी तथा इसके बाद जिंदगी में आए परिवर्तन, उनका अध्ययन कार्य आदि तमाम किस्म का विवरण गणेश ने पुलिस को दिया. पुलिस को प्रोफेसर की पत्नी सुहासिनी की गुमशुदगी में दिलचस्पी थी. गणेश ने बताया कि करीब तीस बरस पहले भाभीजी और प्रोफेसर में किसी बात पर वितंडा हो गया था. भाभीजी इस कदर खफा हो गईं कि रात को घर से निकल गईं हालांकि प्रोफेसर ने उन्हें कहां-कहां नहीं ढूंढा. पुलिस हैरान थी. क्या इस जमाने में अदृश्य शक्तियां हो सकती हैं जो किसी का गला घोट दें ? क्या वे इतना खौफ पैदा कर सकती हैं कि कोई घर में कदम रख नहीं सके? क्या वह इस कदर ताकतवर हो सकती हैं कि हजारों की भीड़ के आगे सहजता से किसी को मौत के घाट उतार दें? पुलिस और गणेश के लिए सबकुछ सोच से परे था. पुलिस ने कोशिशें काफी कीं लेकिन घटनास्थल से उन्हें प्रोफेसर के कत्ल का कोई सबूत नहीं मिल सका. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बेशक मौत को कत्ल करार दिया गया था लेकिन कातिल कौन था? पुलिस ने आखिर घुटने टेक दिए और जांच फाइल बंद कर दी.  करीब चार माह तक पुलिस प्रोफसर भास्कर की रहस्यमयी मौत की गुत्थी सुलझाने के लिए कई पहलुओं पर जांच कर रही थी लेकिन जब ओर-छोर न मिला तो जांचकर्ताओं ने हार मान ली. 
--------
गणेश ने प्रोफेसर का अंतिम संस्कार नागपुर में कर दिया था, जिसमें बड़ी संख्या में उनके परिचितों ने शिरकत की थी. अन्य विधियां भी उन्होंने ही कराईं . प्रोफेसर की मौत को पांच महीने गुजर गए थे. उनके जाने के बाद गणेश काफी बेचैन थे. बेचैनी का सबब प्रोफेसर की मौत से अधिक उनकी मौत के तरीका  था. उस रात को गणेश दफ्तर से करीब ढाई बजे लौटे. घनघोर बारिश थी. दूध पीकर बिस्तर पर आए और नींद की आराधना करने लगे लेकिन नींद नहीं आ रही थी. फिर एक किताब उठाकर पढ़ने की चेष्टा करने लगे. किताब उन्हें प्रोफेसर ने ही दी थी. किताब उठाते ही प्रोफेसर की शक्ल आंखों के सामने आ गई और दिमाग में फिर वही चक्र घुमने लगा.  प्रोफेसर भास्कर किस अदृश्य शक्ति का शिकार हुए. प्रोफेसर की जीवनगाथा एक पल में गणेश की आंखों के सामने से किसी फिल्म की तरह निकलने लगी और अचानक रुकी भाभीजी पर आकर. क्या भाभीजी ने प्रोफेसर को मारा? हां...सुहासिनी ही हैं प्रोफेसर की कातिल...वो माई गॉड...सुहासिनी...हां...सुहासिनी अपने साथ ले गईं प्रोफेसर को. गणेश की धड़कनें अचानक बढ़ गईं . अब सबकुछ साफ था. प्रोफेसर की रहस्ययमी मौत की पहेली सुलझ चुकी थी. गणेश पसीना-पसीना थे. वह खिड़की के पास आकर खड़े हो गई. बारिश अधिक तेज हो चुकी थी और दामिनियों की तीव्र ध्वनि के साथ आंखों को चुंधियाती रोशनी में सोया हुआ नीरव शहर बूंदों के तीरों के बीच दूर तक दिखाई दे रहा था. 
उस रात भी ऐसी ही घनघोर वर्षा थी, जब प्रोफेसर का लैंडलाइन फोन पर कॉल आया था. गणेश तीस साल पहले अतीत का सफर करने लगे. प्रोफेसर बेहद घबराए थे. आवाज थर्रा रही थी. बता रहे थे...‘गणेश ...गणेश...मैंने उसे मार डाला. हां, सुहासिनी की मैंने जान ले ली. गला दबा दिया मैंने उसका. कमिनी मानती ही नहीं थी. अब क्या करूं? उसकी लाश मेरे सामने है. बताओ क्या करूं?’ 
गणेश डर गए. वह खामोश थे. प्रोफेसर लगातार पूछ रहे थे,‘बताओ गणेश, बताओ...जल्दी बताओ मैं सुहासिनी की लाश का क्या करूं?
गणेश के लिए कुछ बता पाना मुश्किल हो रहा था. प्रोफेसर अपनी बीवी की लाश को ठिकाने लगाने का तरीका गणेश से पूछ रहे थे. गणेश के लिए बहुत कठिन समय था. प्रोफेसर बौखलाए और चीख उठे, ‘बात क्यों नहीं कर रहे हो...जल्दी बोलो...भाड़ में जाओ. मैं ही कुछ करता हूं.’ वह सारी रात गणेश ने आंखों में गुजारी. सुबह गणेश दौड़े-दौड़े प्रोफेसर के घर पहुंचे. वह कॉलेज जाने के लिए तैयार थे. काफी शांत लग रहे थे. चेहरे पर यत्किंचित भी भय नहीं था. 
‘अब आ रहे हो...कोई बात नहीं’
‘लेकिन प्रोफेसर आपने यह क्या कर डाला...’
‘मुझे जो करना था वही किया. इससे उम्दा विकल्प नहीं था मेरे पास. वहां है सुहासिनी’
प्रोफेसर बंगले के सामने विशाल मैदान की ओर उंगली दिखा रहे थे. 
‘गणेश मैंने जब तुम्हें कॉल किया तब सुहासिनी मरी नहीं थी. वह जीवित थी. मैं समझ रहा था कि वह मर चुकी है. मैंने फोन कट करके जैसे ही उसे छुआ मुझे इल्म हुआ कि उसकी सांसें चल रही हैं.  अब उसका जिंदा रहना खतरे से कम नहीं था. क्योंकि पुलिस को वह मेरे बारे में सबकुछ बात सकती थी. मैं अधमरी सुहासिनी को घसीटता हुआ मैदान में ले गया. बारिश की वजह से मिट्टी ढीली हो गई थी. गड्ढा खोदने में तकलीफ नहीं हुई. मैंने सुहासिनी को जिंदा ही दफना दिया.’ प्रोफेसर का कहने का अंदाज बिल्कुल किसी हॉलीवुड के खलनायक की तरह था. माथे पर कोई शिकन नहीं थी. गणेश पत्थर बनकर प्रोफेसर की बातों को सुन रहे थे.
 ‘तो प्रोफेसर तुमने भाभीजी को जिंदा दफना दिया. बहुत क्रूर हो तुम प्रोफेसर.’ गणेश  केवल इतनाही बोल पाए.  प्रोफेसर की सारी भावनाएं मर चुकी थीं. गणेश को लग रहा था कि उनका सारा जिस्म ठंडा पड़ चुका है. वह उल्टे पांव घर लौट गए.
--------
खिड़की के पास खड़े गणेश के लिए तस्वीर साफ हो चुकी थी. वह घबराए हुए बिस्तर पर लौटे और घटना की एक-एक कड़ी फिर जोड़ने लगे. प्रोफेसर ने जिस मैदान में सुहासिनी को जीवित दफ्न कर दिया था आज वहां सुंदर उद्यान था और जहां दफनाया था उसी स्थान पर प्रोफेसर ने रात को बेंच पर रहस्यमयी आकृति को देखा था. सुहासिनी की रूह शायद अपने पति की जान लेकर शांत हो गई थी. 
प्रोफेसर ने पत्नी की गुमशुदगी की रपट थाने में दर्ज कराई थी और वजह बताई थी उनके साथ विवाद. पुलिस ने सुहासिनी की तलाश शिद्दत से की. प्रोफेसर के चरित्र, समाज में उनकी पैठ, उनका ओहदा देख किसी को भी उनपर शक नहीं हुआ. कानून के रखवालों ने मान लिया कि प्रोफेसर से झगड़ा करके सुहासिनी घर से चली गईं. हकीकत सिर्फ और सिर्फ गणेश जानते थे. गणेश फिर पुरानी यादों के समंदर में गोता लगाने लगे. सुहासिनी एक सीधी-सादी युवती थी. वह कम पढ़ी लिखी थी लेकिन उसका अह्लड़पन, मासूमियत सभी को अच्छी लगती थी. सुहासिनी  का मौसेरा भाई नंदन अक्सर आता था.वह प्रोफेसर को जीजाजी संबोधित करता था. नंदन खुले स्स्वभाव का था.  प्रोफेसर की गैरमौजूदगी में वह घंटों तक सुहासिनी से बातें करता रहता. सुहासिनी उसे भोजन भी कराती थीं. वक्त बीतता रहा और प्रोफेसर के दिमाग में नंदन और सुहासिनी को लेकर शक का कीड़ा कुलबुलाने लगा. प्रोफेसर को नंदन और सुहासिनी के बीच नाजायज रिश्ते का संदेह था. सुहासिनी को जब प्रोफेसर के शक के बारे में पता चला तो उन्होंने नंदन को घर आने से मना कर दिया. इसके बावजूद प्रोफेसर बाज नहीं आ रहे थे. अब सुहासिनी के साथ नंदन को लेकर विवाद होने लगे. सुहासिनी गुस्से में मायके चली जाती थीं. लौटने पर फिर वही पुरानी बात.  कभी -कभी प्रोफेसर क्षुब्ध होकर सुहासिनी पर हाथ उठाने लगे. सुहासिनी को जिस रात को दफनाया गया था उससे तीन दिन पहले से दोनों में विवाद चल रहा था.  प्रोफेसर ने संतुलन खो दिया और सुहासिनी का गला दबा दिया लेकिन उन्होंने नहीं सोचा कि एक दिन उनका भी यही हश्र होगा और सुहासिनी ही शायद यह हश्र करेंगी.  
गणेश को प्रोफेसर ने सबकुछ बताया था. मामला रफादफा हो गया था. प्रोफेसर की जिंदगी पटरी पर लौट चुकी थी. गणेश ने प्रोफेसर को यकीन दिलाया था कि सुहासिनी के कत्ल का जिक्र वह कहीं पर भी नहीं करेंगे. कई बरस बीत गए और सुहासिनी मामले की यादें मीट गईं. प्रोफेसर की मौत पर पुलिसिया पूछताछ में सुहासिनी का जिक्र छिड़ा तो गणेश झूठ बोल गए. मगर तब उन्हें अहसास नहीं हुआ कि सुहासिनी ही वह अदृश्य थीं जो अपना बदला चुकाने के लिए प्रोफेसर को डरा रही थीं. अब सबकुछ सामान्य था. गणेश ने झूठ बोलकर कानून के साथ धोखा जरूर किया था मगर अब क्या हो सकता था? 

रविंद्र चोपडे नागपुर 






Comments

Popular posts from this blog

एड गेनः इंसान की खाल में छिपा विकृत शैतान

अमेरिका और युद्ध का कारोबार