adruhya
अदृश्य प्रोफेसर भास्कर ने लैपटॉप के की बोर्ड पर पिछले ढाई घंटे से अविरत चल रहीं अपनी उंगलियों को विराम दिया और आदतन सामने वाली घड़ी पर नजर दौड़ाई. घड़ी की सुइयां नब्बे अंश का कोन दिखा रही थीं. ‘माई गॉड...रात तो लगभग गुजर ही चुकी है. तीन बज रहे हैं. कमबख्त समय भी ऐसे दौड़ता है कि चैन नहीं लेने देता. खैर...’ प्रोफेसर भास्कर बुदबुदा रहे थे. लैपटॉप स्वीच ऑफ करके वह ऊपरी माले वाले बेडरूम से नीचे करीने से सजाए गए हॉल में आए. फिर उनके कदम अपने आप किचन की ओर मुड़ गए. उन्होंने फ्रिज खोला, बोतल निकाली. पानी पीकर वह बरामदे में आ गए और भारी भरकम प्रवेशद्वार के पास खड़े हो गए. दस मिनट तक प्रोफेसर ऐसे ही खड़े रहकर सामनेवाली सड़क पर हवा की रफ्तार से गुजरते वाहनों को देखने के बाद बेडरूम में लौटकर निद्रा को आलिंगन देने वाले थे. ----- पिछले 32-33 सालों से प्रोफेसर की रातें इसी तरह बीत रही थीं. सेवानिवृत्ति से पूर्व नागपुर के एक नामचीन महाविद्यालय से उनका वास्ता था. सुहासिनी की रहस्यमयी गुमशुदगी के बाद प्रोफेसर टूट से गए थे लेकिन फिर वे संभले. जीवनसंगीनी के वियोग के गम ...