तलाक की व्यवस्था तो हिंदुओं में भी सुधारो

सरकार ने आखिर मुस्लिमों के लिए ‘तीन तलाक’ रोधक कानून बना ही लिया. लंबे अरसे से इस संवेदनशील मुद्दे पर बहस चली आ रही थी.  मुस्लिम इसे मजहबी मामले में हुकूमत की दखलंदाजी मानकर उद्वेलित थे और रहेंगे भी.  मोदी सरकार ‘तीन तलाक’ की पारंपारिक व्यवस्था को मुस्लिम समाज की महिलाओं के अधिकारों का हनन मानकर इसे खत्म करने के लिए जोर लगाती रही. कई मुस्लिम मुल्कों में ‘तीन तलाक’ व्यवस्था इतिहास बनने का हवाला भी देती रही लेकिन तलाक की ही बात है तो पीएम मोदी को हिंदुओं में प्रचलित ‘तलाक की विधि व्यवस्था’ पर भी गौर करना होगा. तलाक का सिस्टम ‘तीन तलाक’ जितना आसान भी ना हो और हिंदुओं में मौजूदा व्यवस्था जितना कठिन, जिटल भी ना हो. हिंदुओं में इसे सरल बनाने की जरूरत है. इसकी पेचिदिगयां खत्म करना वक्त का तकाजा है. हिंदुओं में तलाक के कानून में गहन संशोधन की आज आवश्यक्ता है.  हिंदुओं में पति और पत्नी  दोनों अगर रजामंद हैं तो भी तलाक की औपचारिकता पूरी होने में छह माह से अधिक का समय बीत ही जाता है.  स्थिति तब विकराल हो जाती है जब दोनों में से कोई एक तलाक के लिए रजामंद नहीं होता.  ऐसे में साल बीत जाते हैं. अदालत में  ‘तारीख पर तारीख’ चलती रहती है. पति-पत्नी दोनों की उम्र गुजरती चली जाती है. बच्चे अगर हैं तो उनपर भी माता-पिता के बीच बिगड़े रिश्ते का विपरीत असर पड़ता है. उनका व्यक्तित्व नकारात्मक बनता है. इसी हालत को सुधारना जरूरी है. तलाक में विलंब का परिणाम ‘व्यभिचार’ भी हो सकता है.  कई और दुष्परिणाम इसके हो सकते हैं. पत्नी अगर मामले में धारा 498 (ए) का प्रयोग कर चुकी है तो पति के लिए (और उसके घरवालों के लिए भी) बचना मुश्किल है. कई महिलाएं पति और उसके परजिनों से प्रतिशोध की भावनावश धारा 498 (ए) के ‘खतरनाक शस्त्न’ का प्रयोग करती हैं. स्थितियां बदल चुकी हैं, तलाक के कारण भी नए आ चुके हैं. अत: तलाक संबंधी मौजूदा कानून  में बदलाव करना ही होगा. तलाक की समस्या मुस्लिमों की ही नहीं है,  हिंदू भी इससे प्रभावित हैं. पीएम मोदी को जरूर इस ओर ध्यान देना होगा. सिर्फ वोटों के खातिर ‘तीन तलाक’ का गेम नहीं खेला जा सकता.

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