‘बैन इट लाइक बैकहम’
पिछले साल नवंबर में मध्य लंदन के ग्रेट पोर्टलैंड स्ट्रीट पर किसी ने इंग्लैंड के पूर्व स्टाइलिश फुटबॉलर डेविड बैकहम को कार में मोबाइल का प्रयोग करते हुए देखा. फिर उसने पुलिस को सूचित किया. पुलिस ने सीसी टीवी फुटेज देखकर ‘जुर्म’ की पुष्टि की. इसके बाद कार्रवाई के तौर पर ब्रिटेन में गाड़ी चलाने के लिए बैकहम पर छह महीने का बैन लगा दिया गया. बैकहम जैसी सेलेब्रेटी भारत में यदि कार में मोबाइल का इस्तेमाल करते दिख जाती तो पुलिस को सूचित तो किया ही नहीं जाता, बल्कि देखनेवाला खुद ही ऑटोग्राफ लेने के लिए डट जाता. यह तो इंग्लैंड है जहां छह महीने बाद भी बैकहम को बख्शा नहीं गया. स्टार हुआ तो क्या, कार में मोबाइल का प्रयोग नहीं करने का कानून तो भंग किया है. भारत में भी ड्राइविंग के दौरान मोबाइल का प्रयोग नहीं करने का कानून है लेकिन कितने लोग इसे मानते हैं? ‘कानून तो बने ही तोड़ने के लिए हैं’ की घटिया मानसिकता लोगों को ‘मरने’ के लिए विवश कर रही है. आंकड़े बताते हैं कि 2016 में 2138 लोग ड्राइविंग के दौरान मोबाइल का इस्तेमाल करने से मौत के मुंह में समाए. ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ के एक
सव्रे में पता चला है कि भारत में 47 प्रतिशत लोग ड्राइविंग के दौरान मोबाइल पर कॉल स्वीकार करते हैं. 60 फीसदी लोग मोबाइल पर बात करने के लिए अपनी कार रोकना पसंद नहीं करते. 20 फीसदी लोग ड्राइविंग के दौरान दुर्घटना में हर साल बाल-बाल बच जाते हैं और 34 फीसदी लोग मोबाइल पर बात करते समय अचानक अपनी कार रोकने पर मजबूर हो जाते हैं. यह तमाम चीजें ड्राइवर को मौत की ओर ले जाती हैं. 130 करोड़ की आबादी जिस मुल्क की हो, सड़कें संकरी हों, यातायात नियमों की पूरी जानकारी न हो वहां ड्राइविंग के दौरान मोबाइल पर बातें करने का मतलब ही यह हुआ कि उसे काल ने कॉल लगाई है.
बहरहाल बैकहम पर बैन से अनायास ही 2002 में प्रदर्शित गुरिंदर चड्ढा की फिल्म ‘बेंड इट लाइक बैकहम’ की याद आई जिसमें फुटबॉल के लिए बगावत पर उतारु एक जिद्दी लड़की की दास्तां बड़ी ही खूबसूरती से पेश की गई थी. भारतीय परिवेश में ‘बेंड इट लाइक बैकहम’ शीर्षक में थोड़ा परिवर्तन करके इसे ‘बैन इट लाइक बैकहम’ करना चाहूंगा. मतलब बैकहम की तरह प्रतिबंधित करें. बैकहम पर जिस तरह की कार्रवाई की गई है, उसी तरह की दरकार भारत में है. बैकहम को कसूरवार पाए जाने के बाद छह महीने तक ड्राइविंग के लिए बैन्ड कर दिया गया. भारत में तो इससे भी सख्त कानूनी कदम उठाए जाने की जरूरत है. ड्रइविंग के दौरान मोबाइल पर बतियाना अपने अलावा दूसरों की जान को भी खतरा हो सकता है.
पिछले साल नवंबर में मध्य लंदन के ग्रेट पोर्टलैंड स्ट्रीट पर किसी ने इंग्लैंड के पूर्व स्टाइलिश फुटबॉलर डेविड बैकहम को कार में मोबाइल का प्रयोग करते हुए देखा. फिर उसने पुलिस को सूचित किया. पुलिस ने सीसी टीवी फुटेज देखकर ‘जुर्म’ की पुष्टि की. इसके बाद कार्रवाई के तौर पर ब्रिटेन में गाड़ी चलाने के लिए बैकहम पर छह महीने का बैन लगा दिया गया. बैकहम जैसी सेलेब्रेटी भारत में यदि कार में मोबाइल का इस्तेमाल करते दिख जाती तो पुलिस को सूचित तो किया ही नहीं जाता, बल्कि देखनेवाला खुद ही ऑटोग्राफ लेने के लिए डट जाता. यह तो इंग्लैंड है जहां छह महीने बाद भी बैकहम को बख्शा नहीं गया. स्टार हुआ तो क्या, कार में मोबाइल का प्रयोग नहीं करने का कानून तो भंग किया है. भारत में भी ड्राइविंग के दौरान मोबाइल का प्रयोग नहीं करने का कानून है लेकिन कितने लोग इसे मानते हैं? ‘कानून तो बने ही तोड़ने के लिए हैं’ की घटिया मानसिकता लोगों को ‘मरने’ के लिए विवश कर रही है. आंकड़े बताते हैं कि 2016 में 2138 लोग ड्राइविंग के दौरान मोबाइल का इस्तेमाल करने से मौत के मुंह में समाए. ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ के एक
सव्रे में पता चला है कि भारत में 47 प्रतिशत लोग ड्राइविंग के दौरान मोबाइल पर कॉल स्वीकार करते हैं. 60 फीसदी लोग मोबाइल पर बात करने के लिए अपनी कार रोकना पसंद नहीं करते. 20 फीसदी लोग ड्राइविंग के दौरान दुर्घटना में हर साल बाल-बाल बच जाते हैं और 34 फीसदी लोग मोबाइल पर बात करते समय अचानक अपनी कार रोकने पर मजबूर हो जाते हैं. यह तमाम चीजें ड्राइवर को मौत की ओर ले जाती हैं. 130 करोड़ की आबादी जिस मुल्क की हो, सड़कें संकरी हों, यातायात नियमों की पूरी जानकारी न हो वहां ड्राइविंग के दौरान मोबाइल पर बातें करने का मतलब ही यह हुआ कि उसे काल ने कॉल लगाई है.
बहरहाल बैकहम पर बैन से अनायास ही 2002 में प्रदर्शित गुरिंदर चड्ढा की फिल्म ‘बेंड इट लाइक बैकहम’ की याद आई जिसमें फुटबॉल के लिए बगावत पर उतारु एक जिद्दी लड़की की दास्तां बड़ी ही खूबसूरती से पेश की गई थी. भारतीय परिवेश में ‘बेंड इट लाइक बैकहम’ शीर्षक में थोड़ा परिवर्तन करके इसे ‘बैन इट लाइक बैकहम’ करना चाहूंगा. मतलब बैकहम की तरह प्रतिबंधित करें. बैकहम पर जिस तरह की कार्रवाई की गई है, उसी तरह की दरकार भारत में है. बैकहम को कसूरवार पाए जाने के बाद छह महीने तक ड्राइविंग के लिए बैन्ड कर दिया गया. भारत में तो इससे भी सख्त कानूनी कदम उठाए जाने की जरूरत है. ड्रइविंग के दौरान मोबाइल पर बतियाना अपने अलावा दूसरों की जान को भी खतरा हो सकता है.

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