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 शादी लड़के के घर लड़की की कोविड काल में इससे आदर्श विवाह शायद ही कोई हो, जिसका जिक्र मैं करने जा रहा हूं. बल्कि, सामान्य काल में भी इसे अनुकरणीय मानकर एक आदर्श विवाह संस्था के तौर पर स्थापित करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. गत वर्ष विवाह सुनिश्चित हुआ था लेकिन फिर कोविड के संक्रमण से दुनिया के चक्के जैसे थम गए. विवाह की तिथि टलती रही..टलती रही. अब जब स्थितियां सामान्य होने लगीं तो फिर नवीनतम तिथि निश्चित हुई लेकिन समस्या थी विवाह स्थल को लेकर. लड़की वाले नागपुर से बाहर के थे. विवाह तय करने के दौरान ही फैसला हुआ था कि शादी नागपुर में संपन्न कराई जाएगी. इस फैसले को बदलना मुमकिन नहीं हो रहा था. वधू पक्ष भी पसोपेश में था कि नागपुर में विवाह कहां कराए. कोविड का खौफ और साथ ही चुनिंदा निमंत्रितों की मेहमान नवाजगी पर लाखों लुटाना भी लड़कीवालों को नागवार गुजर रहा था इसलिए मंगल कार्यालय का विकल्प नापसंद था. अंतत: विवाह को लड़के के घर पर ही संपन्न कराने का विकल्प सामने आया. लड़कीवाले राजी हो गए. लड़की को लड़के के घर लाकर चुनिंदा लोगों के बीच सादगीपूर्ण विवाह रचाया गया. विवाह से पूर्व लड़...

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अदृश्य  प्रोफेसर भास्कर ने लैपटॉप के की बोर्ड पर पिछले ढाई घंटे से अविरत चल रहीं अपनी उंगलियों को विराम दिया और आदतन सामने वाली घड़ी पर नजर दौड़ाई. घड़ी की सुइयां नब्बे अंश का कोन दिखा रही थीं. ‘माई गॉड...रात तो लगभग गुजर ही चुकी है. तीन बज रहे हैं. कमबख्त समय भी ऐसे दौड़ता है कि चैन नहीं लेने देता. खैर...’ प्रोफेसर भास्कर बुदबुदा रहे थे. लैपटॉप स्वीच ऑफ करके वह ऊपरी माले वाले बेडरूम से नीचे करीने से सजाए गए हॉल में आए. फिर उनके कदम अपने आप किचन की ओर मुड़ गए. उन्होंने फ्रिज खोला, बोतल निकाली. पानी पीकर वह बरामदे में आ गए और भारी भरकम प्रवेशद्वार के पास खड़े हो गए. दस मिनट तक प्रोफेसर ऐसे ही खड़े रहकर सामनेवाली सड़क पर हवा की रफ्तार से गुजरते वाहनों को देखने के बाद बेडरूम में लौटकर निद्रा को आलिंगन देने वाले थे.    -----  पिछले 32-33 सालों से प्रोफेसर की रातें इसी तरह बीत रही थीं.  सेवानिवृत्ति से पूर्व नागपुर के एक नामचीन महाविद्यालय से उनका वास्ता था. सुहासिनी की रहस्यमयी गुमशुदगी के बाद प्रोफेसर टूट से गए थे लेकिन फिर वे संभले. जीवनसंगीनी के वियोग के गम ...
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‘दमन’ की चाशनी में लपेटे चैनल ऑस्ट्रेलिया में तमाम अखबारों ने सरकारी सेंसरशिप की खिलाफत करते हुए सोमवार को फ्रंट पेज काले कर दिए. भारत में भी ऐसा हुआ था जब  26 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने आपातकाल का ऐलान कर दिया था. आपातकाल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक का प्रतीकात्मक विरोध करते हुए कुछ अखबारों ने फ्रंट पेज काले कर दिए थे. मुङो लगता है कि मीडिया पर सरकारी अंकुश का मुद्दा विश्वव्यापी  है. अमेरिका में  ट्रम्प साहब के खिलाफ बोलना और लिखना यानी मुसीबत ओढ़ लेने के समान है. फिर भी कुछ अखबार और चैनल हैं जो राष्ट्रपति ट्रम्प को हकीकत से रू-ब-रू कराकर उन्हें आईना दिखाते रहते हैं. दरअसल दुनिया में मीडिया का दमन दो तरह से हो रहा है. एक-जैसा ऑस्ट्रेलिया में हुआ. अखबारों पर सेंसरशिप लगाकर उसकी जुबान काट दो. लठ लेकर या हथियार चलाकर मीडिया का मुंह बंद कर दो और दूसरा तरीका है मीडिया को खरीद लो. इतना पैसा फेंको कि खासकर खबरिया चैनल दौलत की चमचमाहट के आगे अपने फर्ज को भुलाकर हुकूमत के आगे पालतू कुत्ते की तरह दुम हिलाते बैठे रहे. भारत में मीडिया के दमन का दूसरा तरीका आजमाया जा रह...
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काल बनता  धुआं  काला कब खुलेगा अक्ल का ताला भारत सरकार ने यातायात नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने की राशि में बेतहाशा वृद्धि कर दी. सरकार मान कर चल रही है कि जुर्माने की रकम कई गुणा बढ़ा देने से यातायात नियमों का जनता कड़ाई से पालन करेगी और दुर्घटनाओं में कमी आएगी या दुर्घटनाएं घटित ही नहीं होगी. सीट बेल्ट के बिना कार चलाने पर जुर्माना 100 रुपए से बढ़ाकर हजार रुपए कर दिया गया है,  ड्रंक एंड ड्राइव में पक ड़े जाने पर अब दो हजार की जगह दस हजार रुपए देने होंगे, कार चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोग करने पर एक हजार रुपए से पांच हजार रुपए का दंड जैसे कई प्रावधान हैं जो वाहन चालकों की नींद उड़ा रहे हैं. अच्छी बात है कि लोगों की जान बचान के लिए नियमों को कड़ा बनाया गया लेकिन एक सवाल यहां मौजू है कि इन नियमों का क्रियान्वयन करनेवाली सरकारी मशीनरी को भी चुस्त-दुरुस्त बनाया जाएगा या फिर वैसा ही काम चलेगा जैसे आज तक चलता आ रहा है. वैसे जुर्माने की पहले जो राशि थी वह जरूर कम थी लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि नियमों पर  ही कड़ाई से अमल नहीं किया जा रहा था तो क्या खाक दुर्घटनाएं र...

मोटे हैं तो क्या हुआ..

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रखिम कॉर्नवॉल कोई ऐसा-वैसा क्रिकेटर नहीं है बल्कि ‘असाधारण’ है. भारत के खिलाफ शुक्रवार से जमैका में आरंभ दूसरे टेस्ट मैच में इस कैरिबियाई क्रिकेटर ने अपने टेस्ट जीवन का शुभारंभ किया. यही समझ में नहीं आ रहा कि रखिम क्रिकेटर कैसे बन गया. उसका कद है साढ़े छह फिट का और वजन है 315 पाउंड मतलब 143 किलो. इंसानी स्वास्थ्य के संबंध में कद और वजन (बॉडी मास इंडेक्स) के जो मानदंड निर्धारित है उसमें यह बंदा कहीं फिट नहीं है. रखिम का कद यदि 6.5 फिट का है तो उसका वजन मानदंडों के तहत 156 से 204 पौंड ( 70 से 93 किलो) के बीच चाहिए पर यह भीमकाय इंसान है 245 पाउंड का जो ओवरवेट की रेखा से भी करीब 70 पौंड (31 किलो) अधिक.  रखिम की पर्सनालिटी को देखते हुए उसे तो डब्ल्यूडब्ल्यूएफ का पहलवान होना चाहिए था लेकिन बन गया क्रिकेटर. रखिम को तो सलाम करने को जी चाहता.  यह बंदा उन तमाम भारतीयों के लिए एक नजीर है जो स्लिम बॉडी के क्रेजी है. दुबला-पतला बने रहने के लिए दिन-रात हाड़तोड़ मेहनत करते हैं. सपाट पेट, सिक्स पैक के लिए खाने से तौबा करते हैं. जब खूब पसीना बहाने के बाद भी बदन दुबला नहीं होता, पेट सपाट नही...
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तलाक की व्यवस्था तो हिंदुओं में भी सुधारो सरकार ने आखिर मुस्लिमों के लिए ‘तीन तलाक’ रोधक कानून बना ही लिया. लंबे अरसे से इस संवेदनशील मुद्दे पर बहस चली आ रही थी.  मुस्लिम इसे मजहबी मामले में हुकूमत की दखलंदाजी मानकर उद्वेलित थे और रहेंगे भी.  मोदी सरकार ‘तीन तलाक’ की पारंपारिक व्यवस्था को मुस्लिम समाज की महिलाओं के अधिकारों का हनन मानकर इसे खत्म करने के लिए जोर लगाती रही. कई मुस्लिम मुल्कों में ‘तीन तलाक’ व्यवस्था इतिहास बनने का हवाला भी देती रही लेकिन तलाक की ही बात है तो पीएम मोदी को हिंदुओं में प्रचलित ‘तलाक की विधि व्यवस्था’ पर भी गौर करना होगा. तलाक का सिस्टम ‘तीन तलाक’ जितना आसान भी ना हो और हिंदुओं में मौजूदा व्यवस्था जितना कठिन, जिटल भी ना हो. हिंदुओं में इसे सरल बनाने की जरूरत है. इसकी पेचिदिगयां खत्म करना वक्त का तकाजा है. हिंदुओं में तलाक के कानून में गहन संशोधन की आज आवश्यक्ता है.  हिंदुओं में पति और पत्नी  दोनों अगर रजामंद हैं तो भी तलाक की औपचारिकता पूरी होने में छह माह से अधिक का समय बीत ही जाता है.  स्थिति तब विकराल हो जाती है जब दोनों में स...
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‘यम’ बन गया नियम शर्तियां..न्यूजीलैंड के लिए नियम ही ‘यम’ बन गया. एक सुचारू व्यवस्था कायम करने के लिए, मूल्यों का पालन करने के लिए किसी शीर्ष संस्था या  समाज द्वारा नियमावली बनाई जाती है.किंतु नियमावली भी गले की जंजीर बन सकती है. जिन नियमों को प्रचलित व्यवस्था में सुचारूपन लाने के लिए गढ़ा जाता है, वही गाड़ने का काम कर देते हैं, जैसा न्यूजीलैंड के साथ हुआ. बेचारे कीवी 2015 में भी फाइनल में पहुंचे थे. तब कंगारुओं ने उन्हें पीट दिया. 2019 में भी फाइनल में पहुंचे और कप के करीब बढ़ ही रहे थे कि क्रिकेट का एक नियम रास्ते में ‘यम’ बनकर खड़ा हो गया..और नियम क्या कहता है कि  फाइनल मुकाबला यदि सुपर ओवर में भी टाई हो जाता है तो दोनों टीमों के चौकौं-छक्कों को गिनकर चैंपियन का फैसला किया जाए. सुपर ओवर से पहले कीवी जीत रहे थे तो मार्टिन गुप्टिल का थ्रो स्टोक्स के बल्ले से छटकर  गेंद सीमा पर चली गई. इसलिए सुपर ओवर की नौबत आन पड़ी. सुपर ओवर में भी टाई करा बैठे तो चौके-छक्कों की तादाद गिनने के नियम ने फटे में टांग डाल दी. जिन महानुभावों ने इस नियम को बनाया है लगता है उन्होंने दूर तक सो...