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‘सरकशी’ का परचम लहराने का ‘सौतेला इनाम’?

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‘सरकशी’ का तात्पर्य विद्रोह है, लेकिन यह भी न भूलें कि दुनिया में सामंतों की नींव हिला कर नई समतावादी व्यवस्था स्थापित करने की शक्ति भी ‘सरकशी’ में ही निहित है। भारतीय महिलाएं आज जिस कामयाबी के मुकाम पर हैं, वह इस विद्रोही चेतना की ही फलश्रुति है। भारतीय महिलाओं के संघर्ष की दास्तान काफी लंबी, मगर उतनी ही प्रेरक भी है। सावित्रीबाई फुले, सरोजिनी नायडू, फातिमा शेख, अहिल्याबाई होल्कर, एनी बेजेंट और इंदिरा गांधी ने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देकर भारतीय नारियों में आत्मसम्मान की अलख जगाई। पितृसत्ता के खिलाफ विद्रोह का परचम थामने की ताकत नारी हाथों में उत्पन्न की और इतना ही नहीं, 21वीं सदी में उन्हें व्योम तक पहुंचा दिया। आज भारतीय महिलाओं की उपलब्धियों को उंगलियों पर नहीं गिना जा सकता। इसी कड़ी में एक और गौरवशाली अध्याय जुड़ा जब रविवार, दो नवंबर की रात भारत की महिला टीम आईसीसी वनडे विश्व कप स्पर्धा की विजेता बनी। यह उपलब्धि न तो रातों-रात मिली और न ही किसी परालौकिक शक्ति ने इसे थाली में सजाकर दे दिया। प्रदीर्घ संघर्ष गाथा इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे भारतीय महिला टीम की लंबी संघर्ष...

एड गेनः इंसान की खाल में छिपा विकृत शैतान

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एड गेन जो भयानक विकृति से ग्रसित था 17 नवंबर 1957 की बर्फीली रात को अमेरिका के प्लेनफील्ड कस्बे ( विस्कॉन्सिन ) के एक मकान में पुलिस दबीश देती है। मकान के भीतर का नजार देख कुछ पुलिसवाल बेहोश हो जाते हैं, जबकि  कुछ को उल्टियां होने लगती हैं। मांस और खून की बदबू से पुलिसकर्मियों के सर फटे जा रहे हैं।  दोजख और इस मकान में कोई फर्क ही नहीं है।  58 वर्षीय बर्निस वॉर्डन को लापता हुए 24 घंटे हो चुके थे। उसीकी खोजबिन के सिलसिले में पुलिस की यह दबीश थी। बर्निस हार्डवेयर स्टोर की मालकिन थी, पर अपनी जिंदगी में वह बेहद तनहा महसूस करती थी। बेटा फ्रैंक वॉर्डन स्थानीय डिप्टी शेरिफ था लेकिन मां से दूर रहता था।  पुलिसवालों ने मकान के हर कमरे की तलाशी शुरू कर दी और जो देखा वह राक्षसोंवाली किसी तिलस्मी उपन्यास में ही संभव है।  कमरों में पुलिवासवालों को मानव कंकाल और हड्डियों के टुकड़े मिले।  कूड़ादान, कुर्सियों के कवर, मुखौटे, लेगिंग्ज भी वहां दिखाई दिए और यह सभी महिलाओं के खाल से बनाए गए थे।  मानव खोपड़ियों के कटोरे वहां थे और  खंभों पर  महिलाओं की खोपड़ियां ल...

…जेब में है माल…तो ही बनेगा खिलाड़ी कमाल

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प्रथम श्रेणी क्रिकेट के पांच मुकाबलों की दस पारियों में वैभव सूर्यवंशी के नाम पर केवल 100 रन हैं. 158 गेंदें उसने खेली हैं, 18 चौके और एक छक्का मारा है. सउदी अरब के जेद्दा में इंडियन प्रीमियर लीग की महानीलामी से पहले वैभव का यह रिकॉर्ड है. वैभव इस समय सुर्खियां अपने रिकॉर्ड की वजह से नहीं, उम्र की वजह से बटोर रहा है. मात्र 13 वसंत देख चुके इस किशोर को राजस्थान रॉयल्स ने उसके आधार मूल्य 30 लाख से साढ़े तीन गुना अधिक यानी एक करोड़ 10 लाख रुपए में खरीदा. बिहार के समस्तीपुर जिले में एक निम्न मध्यवर्ग परिवार से वास्ता रखने वाले वैभव ने अगर क्रिकेट के ग्लैमरस वर्ल्ड में खुद को संभाले रखा तो भारत के खेल क्षितिज पर अपने तेज का पुंज बिखरता सितारा हम जल्द ही देख पाएंगे, वरना विनोद कांबली या पृथ्वी शॉ की कटु मिसालें सामने हैं. क्रिकेट की दुनिया की दौलत, शौहरत और ग्लैमर कांबली और शॉ हजम नहीं कर सके और वह बहते गए, भटकते गए. ऐसा कुछ वैभव के साथ न हो बस. उम्र एक ‘आइकन’ 13 साल की उम्र में कोई बच्चा अगर किसी भी खेल में हेडलाइन बन रहा है तो इसका मतलब है उसमें कुछ तो है. और हो सकता है भविष्य में वह कोई ट्...

अधूरा सुसाइड नोट

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‘‘देख कलुआ, दुबारा ऐसी हिमाकत मत करना, वरना कुत्ते इतना मारूंगी न तुझे कि...’’  ‘‘ हरामजादी, पता है तू कैसी है। मुझे डांटती है और सबको...’’           ‘‘ये...क्या कहा रे तूने हरामी के पिल्ले...तेरी मां-बहन को जाकर बोल ये सब...हरामखोर ...लफंगे...अपनी सूरत तो देख ले...कमीने जी चाहता है कि तेरी चमड़ी उधेड़ दूं ...खून पी जाऊंगी तेरा... ’’ अब मीना आपे से बाहर हो चुकी थी। क्रोध से उसकी सांसें फूल रही थीं और छतिया बहुत तेज ऊपर-नीचे हो रही थी। मीना ने कपड़ों से भरी बाल्टी वहीं पटक दी और बड़ा सा पत्थर उठा लिया और कलुआ की ओर उछाल दिया। तीव्र गति से आ रहे पाषाण की मार से बचने के लिए कलुआ बाएं तरफ झुका। पत्थर नहीं उसके करीब से मौत गुजर चुकी थी। मीना की आंखें अंगारें बरसा रही थीं। कलुआ ने खिसकने में ही भला समझा।  000000000 मीना को नींद नहीं आ रही थी। रात गुजरे लंबा समय हो चुका था। अब तो भोर होने चली थी। मीना करवटें बदल-बदलकर सूरज के ऊगने का इंतजार कर रही थी मगर उसका मन अतीत की गहराई में प्रवेश कर रहा था। आंखें नम थीं। मीना सातवीं में पढ़ रही थी कि एक दिन बापू ने...
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  क्या चैंपियन बनने की औकात थी हमारी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ एक कमेंट काफी मजेदार है। किसी भी क्रिकेट विश्व कप में दो ट्रॉफियां रख दी जाएं। एक ट्रॉफी टूर्नामेंट में चैंपियन बननेवाली टीम के लिए और दूसरी भारत-पाकिस्तान मैच के लिए। यह मैच जो जीतेगा उसे ट्रॉफी मिलेगी। इस लिहाज से भारत ने ऑस्ट्रेलिया में टी-20 विश्व कप में अपनी ट्रॉफी तो 23 अक्तूबर को ही पाकिस्तान को हराकर जीत ली थी। खैर, व्यंग्य अपनी जगह है और हकीकत अपनी जगह। सेमी फाइनल में भारतीय टीम ने इंग्लैंड के खिलाफ जो शर्मनाक प्रदर्शन किया वह लंबे समय तक क्रिकेट प्रेमियों के दिल को डंसता रहेगा लेकिन इतनी बड़ी प्रतियोगिता में खेलने उतरी भारतीय टीम के संयोजन पर गौर करें।  क्या वाकई लायक थे  विश्व कप में खेलने के कहीं से भी टीम इंडिया टी-20 विश्व कप  प्रतियोगिता के लायक नहीं लग रही थी। टीम के कप्तान रोहित शर्मा का खराब फॉर्म एशिया कप से ही चला आ रहा था। उनके जोड़ीदार के.एल. राहुल को तो बस केवल आईपीएल में ही खेलना चाहिए। आप केवल विराट कोहली और सूर्यकुमार यादव के दम पर कोई भी आईसीसी ट्रॉफी नहीं जीत सकते। कोहली ने तो खैर...
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‘अलोकतांत्रिक’  तहजीब में सांस घुटती र ह ी   गडकरी  क ी   नितिन गडकरी का शुमार उन चुनिंदा सियासतदांओं में है जिन्होंने मुखौटा चढ़ाकर कभी राजनीति नहीं की. ‌दोहरे चरित्रों से पटी भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में गडकरी तटस्थ रहे. साफगोई उनका स्थाई स्वभाव रहा है. कट्टर विरोधियों पर भी तारीफों के फूल बरसाने में उन्होेंने कभी कंजूसी नहीं की और अपनों को आलोचनाओं के शूल चुभाने में संकोच भी नहीं किया लेकिन बीजेपी के अंदरूनी माहौल में वे शायद दमित थे और कुपित भी. गडकरी के पिछले कुछ वक्तव्य काबिल-ए-गौर हैं. 1)अच्छे दिन आते नहीं हैं, उन्हें केवल महसूस किया जा सकता है, 2)देश में लोकतंत्र के हित में कांग्रेस का वजूद अहम है, 3)अब गांधी के समय की राजनीति नहीं रही, 4)जी चाहता है कि सियासत का परित्याग कर दूं आदि. गडकरी की यह भड़ास थी, जिससे जाहिर होता है कि उन्हें केंद्र की बीजेपी सरकार में चली आ रही ‘एकाधिकारशाही’ गुलाम होने का अहसास करा रही थी. बीजेपी में इस समय जो परिपाटी बनी है उसमें अपनी बात रखने का अधिकार शायद ही किसी के पास हो. ऐसी ‘अलोकतांत्रिक’ तहजीब में गडकरी समान खुले द...
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  जिंदगी की आशा-निराशा का  खेल ‘पार’ अस्सी के दशक में भारतीय निर्देशकों की कुशलता और अदाकारों के जीवंत अभिनय से परिपूर्ण एक से बढ़कर एक कला फिल्मों का प्रसारण दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर होता था. मुख्यधारा की फिल्मों से विलग कला फिल्मों के संसार से भारतीय दर्शकों को रू-ब-रू कराने का शानदार काम उस जमाने में दूरदर्शन ने किया. जनम, आधारशीला, पार, करंट, पार्टी, एक  रुका हुआ फैसला जैसी उच्चकोटि की कला फिल्में दूरदर्शन ने प्रसारित कर भारतीय मनोरंजन क्षेत्र के समृद्ध पक्ष को उजागर किया. इन सभी कला फिल्मों में मेरी पसंदीदी फिल्म थी ‘पार’. एक मजदूर की संघर्षपूर्ण जीवन गाथा का विवरण यानी ‘पार’ है. फिल्म के मुख्य किरदार नौरंगिया एवं उसकी पत्नी रमा के चरित्र को परदे पर साकार करने में क्रमश: नसरुद्दीन शाह तथा शबाना आजमी ने जान झोंक दी है. वहीं ओम पुरी ने गांव के प्रधान राम नरेश और उत्पल दत्त ने जमीदार के किरदार से संपूर्ण न्याय किया है.  फिल्म की पटकथा नौरंगिया और रमा के इर्दगिर्द है. बिहार में शोषित और दमित वर्ग का प्रतिनिधि मुसाहरा समाज का नौरंगिया स्वयं प्रगतिशील विचारों का ...