अधूरा सुसाइड नोट
‘‘देख कलुआ, दुबारा ऐसी हिमाकत मत करना, वरना कुत्ते इतना मारूंगी न तुझे कि...’’
‘‘ हरामजादी, पता है तू कैसी है। मुझे डांटती है और सबको...’’
‘‘ये...क्या कहा रे तूने हरामी के पिल्ले...तेरी मां-बहन को जाकर बोल ये सब...हरामखोर ...लफंगे...अपनी सूरत तो देख ले...कमीने जी चाहता है कि तेरी चमड़ी उधेड़ दूं ...खून पी जाऊंगी तेरा... ’’
अब मीना आपे से बाहर हो चुकी थी। क्रोध से उसकी सांसें फूल रही थीं और छतिया बहुत तेज ऊपर-नीचे हो रही थी। मीना ने कपड़ों से भरी बाल्टी वहीं पटक दी और बड़ा सा पत्थर उठा लिया और कलुआ की ओर उछाल दिया। तीव्र गति से आ रहे पाषाण की मार से बचने के लिए कलुआ बाएं तरफ झुका। पत्थर नहीं उसके करीब से मौत गुजर चुकी थी। मीना की आंखें अंगारें बरसा रही थीं। कलुआ ने खिसकने में ही भला समझा।
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मीना को नींद नहीं आ रही थी। रात गुजरे लंबा समय हो चुका था। अब तो भोर होने चली थी। मीना करवटें बदल-बदलकर सूरज के ऊगने का इंतजार कर रही थी मगर उसका मन अतीत की गहराई में प्रवेश कर रहा था। आंखें नम थीं। मीना सातवीं में पढ़ रही थी कि एक दिन बापू ने फरमान जारी कर दिया, ‘‘आज से तू स्कूल नहीं पढ़ेगी।”
बापू बोला,‘‘ बहुत पढ़-लिख ली अब तक। कौनसी डॉक्टर बनना है तुझे। मां के साथ खेती में काम करेगी तो चार पैसे घर में आएंगे।’’ मीना की मां विमला ने रामदीन को समझाने की कोशिश की तो वह नामूराद उसे ही घर की चाहरदीवारी से बाहर पीट कर तमाशा करने लगा। मीना ने मां को बचाने के लिए बापू की बात मान ली और स्कूल जाना बंद कर दिया। विमला के साथ मीना खेत में काम करने लगी। तीन साल पहले कोरोना का कहर विमला को लील गया। विमला की असमय मौत से परिवार की आय घट गई। अब मीना ही कमाई करनेवाली मुख्य सदस्य थी। हालांकि रामदीन जो काम मिले वह कर लेता मगर आलस्य और शराब की लत ने उसे बर्बाद कर रखा था। रामदीन के आलसी और शराबी होने का ही नतीजा यह था कि परिवार से दरिद्रता का नाता टूट नहीं रहा था। मीना को उससे पांच साल बड़ा भाई रब्बा भी था। रब्बा बिल्कुल बाप पर गया था। आलस्य की बीमारी उसे भी थी। कभी-कभी उसे भी सुरा की तलब आ जाती थी। कोई काम-धंधा करके घर की आमदनी बढ़ाने के बजाय वह आवारगी पसंद हो चुका था। दोस्तों ने उसे बहका दिया था। रब्बा का एक पांव घर के बाहर ही रहता था। मां की मौत के बाद तीन साल यूंही बीत गए। मीना अब 21वां बसंत देख रही थी। यौवन उसपर न्यौछावर था। उसके अंग-प्रत्यांग पुष्ट हो चुके थे जिन्हें देख कलुआ जैसे आवारा, मनचले मचल उठते थे।कलुआ के मन में मीना की छवि गहराई तक अंकित थी। मुश्किल से दूसरी कक्षा तक पढ़ा कलुआ हर हाल में मीना को पाने के लिए दीवाना हो चुका था। मीना के प्रति उसके सीने में प्यार की लौ नहीं बल्कि हवस की अग्नि धधकती थी। मीना को अपने बदन के नीचे रगड़ने के लिए वह वहशीपन के किसी भी हद तक जा सकता था। मीना के परिवार को लगा गरीबी का अभिषाप कलुआ के हौसले बढ़ा रहा था। मीना जहां कहीं भी दिख जाती कलुआ उससे बदतमीजी पर उतर आता था। उसने मीना से कई दफा छेड़छाड़ की थी। गरीबी, स्कूल का छूट जाना, मां की असमय मौत जैसे घटनाक्रमों ने बेचारी मीना टूट चुकी थी।
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जैसे-तैसे रात गुजर गई। पौ फटते-फटते उसे हल्की सी नींद लग गई थी।
‘‘ मीना...मीना...आज काम पर नहीं जाना क्या। कब तक सुसरा की तरह पसरी रहेगी।’’ कमबख्त बापू का यह बेसूरा ताना मीना के लिए नया नहीं था। मां के चले जाने के बाद से ही वह इसे नित सुनती आ रही थी। आठ बजे का वक्त था। मीना, परसराम के खेत की तरफ अपने काम के लिए एक सुनसान गलियारानुमा रास्ते पर बढ़ रही थी। रास्ते पर बिछे शुष्क पर्ण से अपने ही पदचापों का रव सुनते हुए वह चली जा रही थी। अकेली ही थी। कलुआ संकरे रास्ते पर अचानक उसके सामने कूद पड़ा। मीना समझ चुकी थी कि मजबूत कद-काठी के इस बदमाश से शायद वह बच नहीं सकेगी। कलुआ ने मीना का पल्लू खिंचकर हवा में उड़ा दिया और फिर अपने शिकार पर कूद पड़ा। मीना जमीन पर गिर गई। ऊपर कलुआ था, जिसकी जुबान गंदी गालियां और मुंह शराब की बदबू उगल रहा था। पूरी शक्ति के साथ वह कमीना मीना के कपड़े उधेड़ने की कोशिश करने लगा। इस बीच कलुआ का कान मीना के दातों में फंस गया। मीना ने पूरी ताकत के साथ कान चबा डाला। पीड़ा असह्य होते ही कलुआ चीखने लगा और उसकी पकड़ ढीली हो गई। खेतों में हड्डी तोड़ मेहनत के कारण मीना की हथेलियां काफी सख्त हो चुकी थीं। उसी हथेली से उसने एक करारा तमाचा कलुआ के गाल पर रख दिया। कलुआ को दिन में तारे नजर आ गए। कलुआ के हवसी शिकंजे से मीना बच निकली और वहीं से भाग गई। कलुआ ने वाकई हद कर दी थी। उसका कान अगर मीना के दांतों में नहीं फंसता को शायद वह किसी को भी मुंह दिखाने के लायक नहीं रह जाती।
मीना आज काम पर नहीं गई। वह घर लौटी। बेटी को देख रामदीन भड़क उठा और वह बदजुबानी पर उतर आया।
‘‘अरी, नालायक आज काम पर क्यों नहीं गई। आज तो परसराम चुकारा करनेवाला था न। पैसा नहीं लाई कमीनी...रात को खाएंगे क्या। ’’
‘‘ बापू इतना समझ ले कि आज तेरी बेटी बेआबरू होने से बाल-बाल बची। उस कलुआ ने मेरा जीना हराम करके रखा है बापू। अगर उसको तूने नहीं रोका तो मैं खुदकुशी कर लूंगी।’’
मीना का धमकीभरा लहजा असर कर गया। रामदीन होश में आकर मीना से सवाल करने लगा, ‘‘क्या कह रही है तू मीना? क्या उस हरामखोर ने तेरे साथ आज फिर कोई बदसलूकी की? ’’
‘‘हां, वह खेत जाने के रास्ते में मुझपर लपक पड़ा था। मैंने उस कमीने का कान चबा लिया और बच गई। वरना आज तुझे या तो मेरी लाश दिख जाती या बेइज्जत हुई जिंदा लाश की तरह मैं जीती रहती।’’
रामदीन को अब काटों तो खून नहीं। कलुआ को कैसे समझाएं यह वह खुद नहीं समझ रहा था। उसने पड़ोस के किशन चाचा को बुला लिया जो बुजुर्ग और जानकार भी थे। धीमी आवाज में रामदीन अपनी बात उन्हें समझा चुका था। किशन चाचा बोले...‘‘ रामदीन बात तो तुम ठीक कह रहे हो। पुलिस में मामले की शिकायत कर देनी चाहिए लेकिन इससे एक बड़ा मसला खड़ा हो सकता है। ’’
‘‘क्या चाचा’’
‘‘रामदीन एक तो तुम्हारे पास पैसा नहीं है। तुम हो बहुत गरीब। पुलिस में अगर मामला चला गया और बात खुल गई तो बेइज्जत होकर रह जाओंगे...और एक बार बदनामी अगर हो गई तो छोरी को रिश्ता कहां से आएगा? और फिर रब्बा के भी तो हाथ पीले करने हैं।’’
‘‘बात तो ठीक कह रहे हो चाचा। मगर कलुआ का इलाज कैसे करें।’’
‘‘मेरी बात गौर से सुनो रामदीन। तुम अपनी छोरी का खेत में काम करना बंद कर दो। उसे घर पर ही रखे रहो। एक बार उसके हाथ पीले हो गए कि समझ लो बला गई।’’
चाचा की व्यावहारिक बातों ने मीना को निराश ही कर दिया था। उससे रहा नहीं गया। वह एकदम बोल गई... ‘‘कैसी बातें कर रहे हो चाचा? मेरी जगह आपकी बेटी नीलम होती तो क्या आप ऐसा ही सोचते? पुलिस में रपट नहीं लिखाते? और वैसे भी कौनसी इज्जत के साथ जी रहे हैं हम लोग जो मामला पुलिस तक पहुंचने से बेइज्जती हो जाएगी। पहले भी तो वह मुझे सताता रहा है। वह मुआ कभी भी मेरी इज्जत लूट लेगा। इसलिए पांव पकड़कर कहती हूं कि पुलिस में कलुआ की शिकायत कर दो। दो-चार डंडे पिछवाड़े पर पड़ेंगे न तो होश ठिकाने आ जाएंगे कमीने के। ’’
‘‘मीना होश में आ। अपने बाप का भी तो खयाल कर। और खुद का भी खयाल कर। बेटी...दुनिया बड़ी जालीम है रे। लोग उस हरामजादे को तो कुछ नहीं बोलेंगे। मगर लांछन तुझ पर लग जाएगा। सारी उम्र कुंवारी पड़ी रह जाएगी। गांव अपना है ही कितना बड़ा। मिनटों में गांववालों को खबर हो जाएगी। फिर क्या करेगी तू? ’’
रामदीन ने किशन चाचा के हां में हां मिला दी। ‘‘उचित बोला है चाचा ने। मीना अब तू घर पर ही रहना। अच्छा सा लड़का ढूंढकर हाथ पीले करवा देता हूं तेरे। मेरे पास पैसा नहीं है तो क्या हुआ। मेरी भुजाओं में ताकत तो है। शहर चला जाऊंगा काम करने के लिए। वहां से पैसा लेकर आऊंगा और अपनी प्यारी बिटिया का ब्याह कर दूंगा।’’
बापू की इस तरह की हवा-हवाई बातें मीना अरसे से सुनती आ रही थी। भुजाओं की ताकत पर रामदीन अगर इतरा रहा था, तो पहले ही क्यों नहीं शहर जाकर उसने पैसा कमाया। मीना हताश थी। उसे अपनी जिंदगी का आखिरी दिन करीब आने की आहट सुनाई दे रही थी। वैसे भी मीना बेख्वाब जिंदगी बसर कर रही थी। उसने कभी कोई सपना देखा ही नहीं था।
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‘‘ले बेटी।’’ परसराम ने मीना को नोट थमाते हुए कहा, ‘‘पिछले हफ्ते तू एक दिन काम पर नहीं आई थी लेकिन मैंने तेरी आधे ही दिन की रोजी काटी है।’’
मीना ने रास्ते में दुकान से एक किलो चावल खरीदे। शाम ढल चुकी थी। जैसे ही घर की दहलीज के भीतर वह आई रब्बा और रामदीन की बातों में अपने नाम का जिक्र सुनते ही ठिठक गई। दोनों पर मय का सुरुर हावी था। रामदीन अपने बेटे से रहा था, ‘‘रब्बा मुझे लगता है तेरा आयडिया सही है। तुने बात की कलुआ से मीना के बारे में? ’’
‘‘बापू पगला गया है तू? तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या? कलुआ से मेरी जान-पहचान नहीं है। मैं अपने दोस्त सिकंदर को बिचौलिया बनाकर कलुआ से बात करुंगा।’’
‘‘कितना दे सकता है कलुआ मीना के? ’’
‘‘पच्चीस-तीस हजार से कम नहीं होने चाहिए बापू।’’
‘‘क्या बात कर रहा। पच्चीस-तीस हजार। जिंदगी में इतनी रकम नहीं देखी’’
‘‘बिल्कुल। ’’
‘‘मीना को कलुआ खरीदना चाहता है यह बात तुझे किसी ने बोली है क्या? ’’
‘‘बोली तो नहीं किसी ने मगर सिकंदर बता रहा था। मीना पर कलुआ का दिल आ चुका है और उसे हासिल करने के लिए कुछ भी कर सकता है। तो मैंने इशारों-इशारों में उसे अपनी बात समझाने की कोशिश की थी। सोचा कि अगर मीना के लिए कलुआ इतना दीवाना है तो हम ही क्यों नहीं उसे मीना को सौंप दे और कुछ रकम ले लें।’’
‘‘तो तू मीना को बेचना चाहता है। फिर नेक काम में देर क्यों लगा रहा है। कर डाला सौदा...जो होगा देखा जाएगा।’’
‘‘एक बार यह लड़की घर से चली जाए । फिर तो ऐश ही ऐश। वह कुत्ता साला मीना को फिर जिस हाल में भी रखे। हमें क्या ?’’
‘‘अबे हरामी के पिल्ले तेरा भी तो ब्याह करना है। लड़कीवालों से अच्छा खासा दहेज मांगेंगे हम तो।’’
‘‘पर बापू मेरे जैसे आवारा को लड़की कौन देगा और दे भी दें तो दहेज किस हैसियत से मांगेगे।’’
‘‘अबे नालायक, बददिमाग मीना को एक बार जाने दे बस, तेरी शादी की बात चलाता हूं कहीं न कहीं।’’
मीना के पांव तले की जमीन खिसके जा रही थी। भाई और बाप की बातचीत में उसे आनेवाले कल की आहट हो चुकी थी। आंसुओं से भरीं आंखों से उसे धुंधला नजर आने लगा था लेकिन अपने मुस्तकबिल को वह स्पष्ट देख रही थी। तो उसका जीना मरना क्या कलुआ तय करेगा? उस रात को मीना फिर नहीं सो सकी। वह भाई जिसकी कलाई पर वह हर साल राखी बांधकर अपनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो जाया करती थी वहीं उसका सौदागर बनने चला था। वह तो चाहती थी कि एक बार रब्बा को भेजकर कलुआ की अच्छे से धुलाई कर उसे जिंदगीभर का सबक सिखाने के लिए कह दे। लेकिन शाम को उसके और बापू के वार्तालाप ने तो उसे रिश्ते की नई शक्ल दिखा दी थी। जिस बाप ने पैदा किया वही उसका सौदा करने निकला था। बस अब और नहीं। अब जीना नहीं है मुझे। जीकर भी क्या करुंगी ? अगर आज कलुआ से बच गई तो कल भाई और बाप उसे मुझे बेच देंगे और वो कमीना मेरी जिंदगी को नरक बना देगा। क्या पता, दिल भर जाने के बाद वह कल को मेरा सौदा और किसी से कर ले। ऐसी जिंदगी से जीने से तो बेहतर है मर जाना। अब मौत मुझे जिंदगी से अच्छी लग रही है। मीना चटाई पर उठ बैठी। रात के ढाई बजे थे। उसने चूल्हे के करीब पड़ा कागज उठाया जिसमें वह चावल लेकर आई थी। कागज पीछे से कोरा था। मीना मोमबत्ती जलाकर सुसाइड नोट लिखने लगी... ‘‘तूम सभी को मेरा नमस्ते। मूझे अब नहीं जीना है। एक तो वह कलुआ कई दिनों से मेरि ईज्जत पर उठा है। वह इज्जत लुटकर शायद मेरा कत्ल कर दे। उसकी हवस की बली चढ़ने से पहले क्यों नहीं मैं खुद को ही खत्म कर लूं। और बापु और रब्बा तुम लोग भी तो कलुआ से मेरी बी... ’’
मीना से कलम नहीं चल पा रही थी। उसकी आंखों के सामने अंधियारा छाने लगा था। जज्बातों का समुंदर उसके सीने में इस कदर ज्वार भरने लगा था कि वह लिख ही नहीं पा रही थी। दोपहर से लेकर उसके पेट में अन्न का दाना तक नहीं था। मीना गश खाकर गिर गई। सुसाइड नोट अधुरा रह गया। वह बेहोश थी।
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नदी किनारे मीना के अचेत शरीर का पंचनामा चल रहा था। इंस्पेक्टर खान की तीखी नजरें हर गांववाले को घेर रही थीं। लाश इसके बाद पोस्ट मार्टम के लिए शहर रवाना कर दी गई। इंस्पेक्टर खान ने गांववालों को पूछा, ‘‘कलुआ कौन है। लौंडिया ने मरने से पहले लिखी चिट्ठी में उसका नाम है। लड़की इज्जत पर उठनेवाला वह हरामी कौन है?’’
मजाल कि गांववालों की जुबान कलुआ का नाम उगल दे लेकिन इस बीच वहां पहुंचे रामदीन ने जोर से कहा, ‘‘जी साहब जी। वह कमीना मेरी बिटिया की इज्जत पर डाका डालनेवाला था। एक बार कोशिश भी की थी उसने। मेरी मीना की खुदकुशी के लिए वो कलुआ ही जिम्मेदार है साहब।’’
‘‘ठीक है। बाकी बातें थाने में करते हैं। चलो।’’
इंस्पेक्टर खान ने कलुआ का पता लगाने का आदेश दे दिया। रामदीन से पूछताछ करने के बाद इंस्पेक्टर खान भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि हो न हो मीना को खुदकुशी करने के लिए उकसानेवाला कलुआ ही है। उन्होंने अपने अधिनस्त कर्मियों को फौरन कलुआ का पता लगाने का फरमान जारी कर दिया। पता चला कि कलुआ गांव से फरार हो चुका है। उसका लोकेशन मोबाइल नंबर से ट्रेस करने के लिए कहा गया। एक दिन बीत गया।
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मीना की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट इंस्पेक्टर खान गौर से पढ़ रहे थे। अंतिम निष्कर्ष देखने के बाद इंस्पेक्टर खान एकदम उछल पड़े, ‘‘लड़की से रेप हुआ है यार।’’ उनके अधिनस्त कर्मचारी भी देखने लगे। इंस्पेक्टर खान बताने लगे, ‘‘लड़की से रेप तो हुआ ही है लेकिन मामला खुदकुशी का नहीं है और लिखा है कि लड़की का गला दबाया गया था मगर उसकी मौत पानी फेफड़ों में जमा होने से सांस नहीं ले पाने के कारण हुई है।’’
पोस्ट मार्टम रिपोर्ट आने के बाद मामले ने नया मोड़ अख्तियार कर लिया था। जो खुदकुशी लग रही थी वह रेप और मर्डर केस था। यानी पुलिस को जांच की दिशा बदलनी जरूरी हो गई थी। हो न हो यह काम काम कलुआ का ही होगा।
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कलुआ का पता चला चुका था। उसे पुलिस शहर जाकर एक दोस्त के घर से गिरफ्तार कर लिया गया था। कलुआ हाथ जोड़े इंस्पेक्टर के सामने बैठा हुआ था। उसकी शक्ल पर खौफ था। अब तक की गुंडई में पहली बार उसका साबका पुलिस से था। पुलिस से दो-चार लाफों में ही उसकी हेकड़ी उतर गई थी और पुलिसवालों के चरण धोकर उनका पानी पीने की मुद्रा में आ गया था। ‘‘नहीं साहब मैंने ऐसा नहीं किया।’’
कलुआ गिड़गिड़ाने लगा। ‘‘मेरी नीयत मीना को देख जरूर डोल जाती थी लेकिन मैंने उसकी इज्जत पर हाथ नहीं डाला और न ही उसकी जान ली। ’’
‘‘कुत्ते सच-सच बता वरना बर्फ की चट्टान पर सुलाकर ऐसा धोएंगे न कि तू सो भी नहीं सकेगा और बैठ भी नहीं पाएगा।’’
इंस्पेक्टर खान का उग्र रूप देख कलुआ के पसीने छूटे थे।वह रो-रोकर बताने लगा, ‘‘सच ही तो कह रहा हूं साहब। मैंने मीना का रेप नहीं किया और न ही उसका कत्ल किया।’’ फिर वह अपने एक कान पुलिस को दिखाता हुआ बताने लगा, ‘‘हां एक बार मैंने कोशिश मैंने जरूर कर ली थी लेकिन वह मेरा कान चबाकर भाग गई। यही है साहब।’’
पुलिस ने इसके बाद कलुआ को फिर धोया लेकिन वह इससे ज्यादा कुछ नहीं बता रहा था। केवल इतना ही कह रहा था कि उसने न तो मीना से रेप किया और न उसका कत्ल किया।इंस्पेक्टर खान परेशान थे। उन्होंने उपनिरीक्षक अवस्थी को बुलाया और पूछा कि अब कलुआ का क्या करें। अवस्थी का जवाब था, ‘‘सर मुझे लगता है कि कलुआ सच कह रहा है। उसने लड़की से रेप नहीं किया और न उसकी हत्या की।’’
‘‘आप सही फरमा रहे हो अवस्थी। मैं भी इसी नतीजे पर पहुंचा हूं कि लड़की से रेप और कत्ल कलुआ ने नहीं किया। हमने जिस कदर उसकी धुलाई की है, उससे तो जुर्म की दुनिया के कई बादशाहों की चड्डी पहले गीली-पीली हो चुकी है। ये साला सच ही बोल रहा है। मगर कौन हो सकता है वह दरिंदा? ’’
‘‘सर, फोरेंसिक रिपोर्ट आ रही है। हम असली आरोपी के बारे में जल्द ही पता कर लेंगे। हमने कलुआ के वीर्य और बालों के भी नमूने ले लिए हैं सर। मृतका के प्राइवेट पार्ट पर वीर्य के कुछ छींटे और बाल मिले थे। ’’
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फोरेंसिक रिपोर्ट भी मीना के साथ रेप और हत्या की तस्दीक कर रही थी लेकिन कलुआ जिसे रेपिस्ट मान लिया गया था उसके किसी भी नमूने का मीना के प्राइवेट पार्ट पर मिले वीर्य के छींटे अथवा बालों से मिलान नहीं हो रहा था। इसका मतलब यह था कि कलुआ निर्दोष था। फोरेंसिक रिपोर्ट में एक और बात स्पष्ट की गई थी कि मीना की मौत पानी में डूबने से हुई है। इंस्पेक्टर खान के लिए मीना के रेप और मर्डर का पता लगाना चुनौती था। सवाल था असली अभियुक्त तक कैसे पहुंचा जाए, कैसे कोई सुराग पता करें। इस बीच अखबारों में फोरेंसिक रिपोर्ट के हवाले से खबरें छपनी शुरू हो गई थीं, जिनमें पुलिस पर भी सवाल उठाए जाने लगे थे। कुछ खबरिया चैनलों ने भी मीना की इस मर्डर मिस्ट्री में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी थी। पुलिस पर असली आरोपी तक पहुंचने के लिए दबाव बढ़ने लगा था।
रामदीन और रब्बा को बार-बार थाने बुलाकर पूछताछ चल रही थी। पुलिस अचानक ही दबिश देकर लोगों से पूछताछ करने लग जाती थी। पर कहीं से भी सुराग हाथ नहीं आ रहा था। मामला संगीन हो चुका था। मंत्रालय स्तर से भी पुलिस पर हत्यारे तक पहुंचने के लिए दबाव बढ़ रहा था। इंस्पेक्टर खान और उनकी पूरी टीम तहकीकात में पूरी शिद्दत से लगी हुई थी। इंस्पेक्टर खान थाने में ही मीना का लिखा सुसाइड नोट फिर से पढ़ने लगे... ‘‘तूम सभी को मेरा नमस्ते। मूझे अब नहीं जीना है। एक तो वह कलुआ कई दिनों से मेरि ईज्जत पर उठा है। वह इज्जत लुटकर शायद मेरा कत्ल कर दे। उसकी हवस की बली चढ़ने से पहले क्यों नहीं मैं खुद को ही खत्म कर लूं। और बापु और रब्बा तुम लोग भी तो कलुआ से मेरी बी... ’’
इसके बाद कागज पर हल्की लकीरें खिंची हुई लग रही थीं। इंस्पेक्टर खान ने कई तर्क लगा लिए मगर समझ नहीं आ रहा था कि मीना क्या लिखने चली थी और सुसाइड नोट उसने अधूरा क्यों छोड़ दिया। मीना ‘बी...’ के बाद क्या लिख सकती थी? ‘बी...’ से क्या मतलब हो सकता है? ‘बी...’ से पहले मीना अपने बापू और भाई का जिक्र कर रही थी। क्या बताना चाहती थी वो? मामले में प्रचंड घालमेल शुरू हो चुकी थी।
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इंस्पेक्टर खान ने गांव के हर जवान छोरे और उसके मां-बाप से पूछताछ, तफ्तीश शुरू कर दी थी। पुलिस को इतिल्ला किए बगैर गांव से बाहर जाने की मनाही थी। गांव के चारों तरफ पहरा लगा दिया गया था। अब सिकंदर की बारी थी। कलुआ के दो-चार चमचों में से एक सिकंदर था। उसके हर बुरे काम में सिकंदर की मदद होती थी। इंस्पेक्टर खान की तीखी निगाहों से बचता हुआ सिकंदर नजरें झुकाए और नाखूनों से फर्श खरोंचता हुआ बैठा था। इंस्पेक्टर खान के एक सवाल से उसकी तंद्रा भंग हुई। वह गिड़गिड़ता हुआ बताने लगा, ‘‘साहबजी, मुझे नहीं मालूम कलुआ ने क्या किया लेकिन वह मीना के पीछे पड़ा जरूर था।’’
‘‘अबे तू कलुआ का सबसे करीबी यार है। तूझे मालूम है वो कैसा है। जल्दी बता वह क्या-क्या करता था। वरना साले तुझे भी कलुआ के साथ ठूंस देंगे।’’
‘‘मैं बहुत नहीं जानता साहबजी। हां, एक बार उसने मीना की इज्जत पर हाथ डालने की कोशिश जरूरी कर ली थी साहब जी।’’
‘‘अबे, ये बात तो साला कलुआ भी बता चुका है। तू ये क्या नया बता रहा है। मीना से गलत काम किसने किया और किसने उसकी जान ली तू ये बता।’’
‘‘नहीं साहब जी...मैं उसके कातिल के बारे में नहीं जानता।’’
‘‘मीना के बारे में और क्या जानता है तू?’’
‘‘ज्यादा नहीं साहब जी। बस वह गरीब की लड़की थी और उसका भाई रब्बा से मेरी जान पहचान है।’’
‘‘जान पहचान है मतलब।’’
‘‘मतलब यही कि दोनों कभी-कबार पी लेते हैं लेकिन एक बार... ’’ सिकंदर ने अपनी जुबान को दांतों से दबा दिया। शायद बड़ी बात उसके मुंह से निकलनेवाली थी। उसका बर्ताव इंस्पेक्टर खान की निगाह से कैसे बच सकता था? अपने डंडे से उसकी ठोड़ी को ऊपर उठाते हुए इंस्पेक्टर खान धीमी आवाज में पूछने लगे... ‘‘लेकिन एक बार...क्या ? हरामजादे रुक क्यों गया। जल्दी बता। साले बहुत कुछ जानता है तू।’’
इनकार करना अब सिकंदर के बस में नहीं था। वह बकने लगा। ‘‘साहब जी...एक बार रब्बा ने मुझसे कहा था कि वो मीना को कलुआ को बेच देना चाहता है और तू उससे बात करके देख ले।’’
इंस्पेक्टर खान का दिमाग घूम गया। मामले में यह एक नया ट्विस्ट था। लड़की का अगर सौदा हुआ था तो वह इसके विरोध में जान दे सकती थी लेकिन उसकी मौत तो पानी में डूबने से हुई है और मरने से पहले उससे रेप हुआ है। मगर कौन कर सकता है यह दरिंदगी? इंस्पेक्टर खान के दिमाग की बत्तियां अब कुछ टिमटिमाने लगी थीं। वह अपने कक्ष में फिर से सुसाइड नोट पढ़ने लगे और चौंक गए...अरे बापरे...मीना ने जो अंतिम अक्षर बी...लिखा है कहीं वह ‘बिक्री’ तो नहीं लिखना चाहती थी। अधूरे सुसाइड नोट की अंतिम पंक्ति, ‘‘और बापु और रब्बा तूम लोग भी तो कलुआ से मेरी बी... ’’ मतलब मीना को कहीं ऐसा तो नहीं लिखना था कि बापू और रब्बा तुम लोग भी तो कलुआ से मेरी बिक्री करना चाहते हो...तो अब मैं जी कर क्या करुंगी। हां यहीं हो सकता है। वो बेचारा लड़की ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी इसलिए हिंदी का व्याकरण नहीं जानती थी। उसकी लिखी लाइनों में हिंदी की अशुद्धियां हैं। हाय अल्लाह...कैसा यह मामला है। इंस्पेक्टर खान ने कक्ष से बाहर आकर अन्य कर्मचारियों को आवाज लगाई और सिकंदर को लेकर वह पहुंच गए रामदीन के घर। चीलम पी रहा रामदीन पुलिस को देख हिल गया। उसके कुछ कहने से पहले ही इंस्पेक्टर खान ने उसकी गर्दन अपने पंजे में जकड़ी और पूछा-रामदीन बताओ तुम्हारा लड़का कहा है। रब्बा सो रहा था। रामदीन ने उसे जगाया। इंस्पेक्टर खान ने रब्बा का गिरेबान पकड़ा और अपनी तरफ खिंचा।
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रामदीन और रब्बा अब दोनों थाने में थे। जुबान बंद रखने की रब्बा की ताकत पुलिस के दो हाथ पड़ते ही जवाब दे चुकी थी। वह तोते जैसा बताने लगा...‘‘हां साहब। मीना मेरी बहन थी और मां के जाने के बाद घर वहीं तो चला रही थी। कलुआ की उसपर बुरी नजर थी। किसी न किसी रोज वह कलुआ की हवस का शिकार होनी ही थी। हम बहुत गरीब हैं साहब...मैंने और बापू ने सोचा कि क्यों नहीं खुद ही मीना को कलुआ को सौंप दें। उसके बदले हम लोगों को कुछ... ’’
‘‘साले कुत्तों...।’’ इंस्पेक्टर खान गरज पड़े। ‘‘अबे दोजख में भी जगह नहीं मिलेगी तुम्हें। सड़ोंगें तुम सालों। अपनी गरीबी मिटाने के लिए तुम अपनी सगी लड़की को बेचने चले थे।... ’’
इंस्पेक्टर खान ने कई मामले सुलझाए थे लेकिन रिश्तों में बेरहमी, क्रूरता का इतना संगीन मामला पहली बार वो देख रहे थे। पल भर के लिए उनकी भी आंखें नम हो गईं लेकिन मीना से रेप और कत्ल का मामला तो अभी सुलझा ही नहीं था। मीना ने सुसाइड नोट लिखा था लेकिन फिर उसने सुसाइड क्यों नहीं किया। इंस्पेक्टर खान का मस्तिष्क कई तरह के विचारों से थर्रा रहा था। वह टकटकी लगाए रब्बा को देखने लगे और फिर एक सवाल उन्होंने दाग दिया। ‘‘तेरी बहन का कत्ल किसने किया और कत्ल से पहले उसका रेप भी हुआ है।’’
रब्बा ने सोचा नहीं था कि ऐसा सवाल भी आएगा। उसने घबराई निगाहों से इंस्पेक्टर खान को देखा। उसके माथे पर पसीने की बूंदे चमकने लगी थीं। सूरत पर जो थे भाव थे वो अचानक बदल चुके थे। खौफ छाने लगा था। रब्बा की हर हरकत को इंस्पेक्टर खान की निगाहें बारिकी से जज कर रही थीं। फिर एक सवाल हुआ, ‘‘मीना के साथ तेरी आखिरी बात कब हुई थी और क्या हुई थी।’’
‘‘वो साहब...वो...वो... ’’ रब्बा जवाब नहीं दे पा रहा था। इंस्पेक्टर खान के दिमाग में बिजली कौंधी और उन्होंने जोरदार मुक्का रब्बा के माथे पर मारा। मुक्के की ताकत से रब्बा कुर्सी समेत जमीन पर गिरा लेकिन वह उठा भी बड़ी फुर्ताई से। उसने मेज पर से पेपरवेट उठाकर इंस्पेक्टर खान को फेंक मारा। इंस्पेक्टर खान ने खुद को बचा लिया। तब तक अन्य पुलिस कर्मी आ चुके थे मगर रब्बा मौका देख थाने के बाहर आ गया लेकिन तैराकी में चैंपियन इंस्पेटर खान ने गोताखोरी की शैली में जोर से उसपर अचूक झपट्टा मारा। रब्बा गिर गया। बगल में ही इंस्पेक्टर खान भी गिरे थे। पुलिस कर्मियों ने रब्बा को दबोचा और वहीं पर उसकी कुटाई शुरू कर दी। देर तक तबीयत से उसकी धुलाई चलती रही।
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चौबीस घंटे गुजरे थे लेकिन रब्बा के मुंह की सूजन कम नहीं हो रही थी, पर अब वह पुलिस के हर सवाल का जवाब दे रहा था। इंस्पेक्टर खान को देख वह बताने लगा, ‘‘साहब...मैं ही हूं मीना का कातिल और उसकी इज्जत का लूटेरा भी।’’
इंस्पेक्टर खान ही नहीं पुलिस का सारा कुनबा रब्बा के इक्बाल-ए-जुर्म से सन्न था। खून का रिश्ता इतना गंदा हो सकता है। बहन का कत्ल शायद भाई कर भी दे लेकिन बलात्कार...‘‘क्यों किया तुमने सगी बहन का रेप और कत्ल?’’‘
‘साहब ...दरअसल मीना ने मेरी और बापू की बात सुन ली थी’’
‘‘कौनसी बात?’’
‘‘वहीं उसे जो हम कलुआ को बेचने की सोच रहे थे। ’’
इसके बाद का सारा घटनाक्रम रब्बा पुलिस के सामने उगलने लग गया।
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बापू और रब्बा की बातें मीना ने दीवार के पीछे खड़ी रहकर सुन ली थीं। दोनों मिलकर उसे कलुआ को बेचने की योजना बना रहे थे। मीना के लिए सारी जिंदगी ही दोजख से कम नहीं थी। जिंदगी खत्म करने का दृढ़ फैसला कर रात को वह सुसाइड नोट लिख रही थी। जज्बातों के उमड़े ज्वार में उसे पैनिक अटैक हो गया और वह बेहोश हो गई। चावल लाए कागज पर लिखा उसका सुसाइड नोट अधूरा रह गया था। इधर थोड़ी देर बाद रब्बा की नींद खुल गई। वह डरने लगा कि अगर मीना ने उसे बेचनेवाली बात सुन ली और किसी को बता दी तो अपनी खैर नहीं। वह चटाई पर उठ बैठा और रसोई में झांकने लगा, जहां मीना सोती थी। वह बेसुध पड़ी थी। उसकी कोई कोई हलचल न देख रब्बा उसे देखने गया तो बस देखते ही रह गया। मीना के सीने पर पल्लू नहीं था और उसका गाउन घुटने तक ऊपर चला गया था। मीना के जिस्म ने रब्बा के भीतर का शैतान जाग गया था। तभी उसका ध्यान चिट्ठी पर गया। रब्बा ने उसे पढ़ने की कोशिश की और वह समझ गया कि उसकी बहन खुदकुशी करनेवाली थी। उसे आयडिया आ गया कि अगर इस वक्त मीना मर भी जाए तो नाम तो कलुआ का ही होगा। क्योंकि वही बदमाश सभी की निगाहों में था और एक बार मीना को बेआबरू करने की कोशिश भी कर चुका था। रब्बा ने फिर शराब पी। हवस की अग में वह अब बेकाबू हो चुका था। हवस में अंधा हुआ शैतान रिश्तों को नहीं जानता। उसने बेहोश पड़ी मीना से सेक्स कर लिया। तूफान चला गया तब रब्बा होश में आया। वह पसीना-पसीना था लेकिन जो होना था वह हो चुका था। उसने सगी बहन की अस्मत को मसल कर रख दिया था।
उसने मीना को टटोला। अरे बापरे ...यह तो मर गई। सेक्स में ही मर गई। रब्बा के लिए कुछ तय करना मुश्किल था। बस एक ही रास्ता उसके बस में था-मीना की लाश को ठिकाने लगाना। उस वक्त रात के ढाई बजे थे। क्या घर में ही गड्ढा करके गाड़ दे...नहीं इतनी जल्दी गड्ढा नहीं बनाया जा सकता...या फिर जला दे...लेकिन वह तो और भी मुश्किल होगा...जलाएंगे तो धुएं का गुबार उठेगा...हां क्यों न लाश को नदी में फेंक दे...हां यही सबसे बढ़िया होगा...लेकिन इस चिट्ठी का का क्या करें....फिर उसके दिमाग में शैतानी विचार कौंधा कि यह चिट्ठी तो ढाल का काम कर सकती है। रब्बा इतना भी मूर्ख नहीं था। उसे पता था कि चिट्ठी पर उसकी उंगलियों के निशान हैं। रब्बा ने चिट्ठी पर कपड़ा घुमा दिया। फिर उसने दोनों हथिलियों को अलग-अलग कपड़े से लपेटा। चिट्ठी उसने कमीज की जेब में रखी। अचेत पड़ी मीना को उसने ठीक से कपड़े पहना दिए और उसे अपने कंधों पर उठाया। दौड़कर नदी किनारे पहुंचा। मीना का अधूरा सुसाइड नोट नदी के पास एक बड़े से पत्थर के नीचे इस तरह से रखा कि किसी को भी दिख जाए। इसके बाद रब्बा ने अपनी मृतवत बहन को नदी में धकेल दिया। घर लौटकर वह चटाई पर ऐसे पड़ा जैसे कुछ हुआ ही नहीं। सुबह चटाई पर रामदीन उसकी बेटी नहीं दिखी तो लगा कि खेती में काम करने के लिए चली गई है। रब्बा ने मान लिया था कि मीना की लाश नदी के प्रवाह के साथ बह गई होगी और दूर तक चली गई होगी मगर नदी के अंदर डूबते ही वह किसी पत्थर में फंसी रही और फिर ऊपर आ गई।
शाम चार बजे के लगभग गांव के दो लड़कों ने आकर रामदीन को बताया कि मीना की लाश नदी में है। लड़कों ने जैसे ही मीना के बारे में बताया, रामदीन चीखने लगा, ‘‘अरे कमबख्त, निर्दयी कलुआ मार डाला रे तूने मेरी बेटी। हरामजादे खून कर दिया तूने मेरी बेटी का।’’
रामदीन बदहवास होकर नदी की और दौड़ पड़ा। तब तक पुलिस घटनास्थल पर दस्तक दे चुकी थी और गांववालों का जमघट लगा हुआ था। गांववाले धीमी आवाज में बतिया रहे थे कि रामदीन की बेटी खुदकुशी कर चुकी है और चिट्ठी में वह कलुआ का नाम लिख गई है। बलात्कारी कातिल रब्बा मन ही मन खुश होने लगा था कि पुलिस को उसपर संदेह नहीं है। इधर लाश का पंचनामा चल रहा था और उधर एक अलग तरह का घटनाक्रम हो रहा था। ‘‘कलुआ...कलुआ...कलुआ ’’
‘‘अबे हाफ क्यों रहा है। साले-चूतिए बताएगा कि नहीं। अबे मर जाएगा क्या। मरने से पहले बक तो सही क्या हुआ’’
‘‘कलुआ...नदी किनारे लड़की की लाश मिली है। सारे गांववाले इकट्ठा हैं।’’
‘‘अबे कौन है साली मर गई। ’’
‘‘मुझे नहीं पता। चल देखते हैं।’’
कलुआ, उसका साथी सुरेंद्र, फकिरा और दो-तीन और लोग मिलकर नदी की तरफ निकल पड़े। दूर से कलुआ को सिकंदर दौड़ते आते हुए दिखाई दिया। कलुआ की बाह थामे सिकंदर हांफते हुए बताने लगा, ‘‘अबे कहां मरने जा रहा नदी किनारे। रामदीन की बेटी मीना की लाश है वो... मरने से पहले नदी किनारे वह चिट्ठी छोड़ गई है... और तेरा नाम लिख गई है... उस दिन जानवर बनकर जो करने चला था न उसके साथ, भुगत साले अब उसकी सजा। उसी वजह से जान दे दी उसने...मार डाला साले तूने रामदीन की बच्ची को... चूपचाप दफा हो ले यहां से, वरना पुलिस इतना धोएगी न कि... ’’
‘‘सच कह रहा तू सिकंदर? बड़ी मुसीबत आन पड़ी बे। अब बता क्या करू मैं’’
सीना ठोंके मवाली बने घूमते कलुआ के पांव तले की जमीन खिसकने लगी थी। सिकंदर ने कहा, ‘‘घबरा मत। पहले तो तू गांव छोड़ कहीं भाग जा। फिर देखेंगे।’’
कलुआ वहीं से पलट गया। पुलिस के हाथ आने तक कलुआ को भी इसी बात का इल्म था कि उसने की बदसलूकी ही मीना की खुदकुशी का सबब था।
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रब्बा की सुनाई दास्तां के बाद इंस्पेक्टर खान और उनका स्टाफ पांच मिनट तक खामोश था। सभी का विचारचक्र तेजी से घुम रहा था। क्या इंसान इतना खुदगर्जी हो सकता है, क्या वह इतना गिर सकता है, क्या हवस उसे इतनी शैतान बना सकती है कि सगी बहन तक उसे न दिखे। खामोशी को तोड़ते हुए इंस्पेक्टर खान ने रब्बा के कहा, ‘‘रब्बा तू जानता है कि तूने क्या किया? अबे कुत्ते तूने मीना को उससे रेप के दौरान ही मर गई समझा था। वह तब जिंदी थी। साले मौत तो उसकी पानी में फेंक देने से हुई। अबे मीना को तूने जीते जी मार डाला। पानी उसके फेफड़ों में जमा हो गया था और बेहोशी के कारण वह बेचारी बचने की कोशिश भी नहीं कर सकी और मर गई। नदी की गहराई में तड़प-तड़प कर मरी होगी रे वह कुत्ते।’’
इंस्पेक्टर खान ने इसके बाद सबइंस्पेक्टर अवस्थी बुलाया और कहा, ‘‘अवस्थी जी आप तत्काल हेडकॉर्डर को और एसपी साहब को मीना रेप एंड मर्डर केस सुलझाए जाने का इतल्ला करें। और एसपी साहब से दरख्वास्त करें कि उनके दफ्तर में सुबह 10 बजे एक प्रेस कांफ्रेंस लेने की अनुमति दे ताकि मीडिया को सच्चाई का पता चले। और हां उस कलुआ के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई तय करें।’’
रविंद्र चोपड़े (ravindrachopde@gmail.com)
नागपुर, 982294744
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