…जेब में है माल…तो ही बनेगा खिलाड़ी कमाल

प्रथम श्रेणी क्रिकेट के पांच मुकाबलों की दस पारियों में वैभव सूर्यवंशी के नाम पर केवल 100 रन हैं. 158 गेंदें उसने खेली हैं, 18 चौके और एक छक्का मारा है. सउदी अरब के जेद्दा में इंडियन प्रीमियर लीग की महानीलामी से पहले वैभव का यह रिकॉर्ड है. वैभव इस समय सुर्खियां अपने रिकॉर्ड की वजह से नहीं, उम्र की वजह से बटोर रहा है. मात्र 13 वसंत देख चुके इस किशोर को राजस्थान रॉयल्स ने उसके आधार मूल्य 30 लाख से साढ़े तीन गुना अधिक यानी एक करोड़ 10 लाख रुपए में खरीदा. बिहार के समस्तीपुर जिले में एक निम्न मध्यवर्ग परिवार से वास्ता रखने वाले वैभव ने अगर क्रिकेट के ग्लैमरस वर्ल्ड में खुद को संभाले रखा तो भारत के खेल क्षितिज पर अपने तेज का पुंज बिखरता सितारा हम जल्द ही देख पाएंगे, वरना विनोद कांबली या पृथ्वी शॉ की कटु मिसालें सामने हैं. क्रिकेट की दुनिया की दौलत, शौहरत और ग्लैमर कांबली और शॉ हजम नहीं कर सके और वह बहते गए, भटकते गए. ऐसा कुछ वैभव के साथ न हो बस.


उम्र एक ‘आइकन’

13 साल की उम्र में कोई बच्चा अगर किसी भी खेल में हेडलाइन बन रहा है तो इसका मतलब है उसमें कुछ तो है. और हो सकता है भविष्य में वह कोई ट्रेंड भी बना दे. सचिन तेंदुलकर ने केवल 16 साल की आयु में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया था. सचिन की आयु ने देश में क्रिकेट की फिजा ही बदल डाली. सचिन तेंदुलकर से ज्यादा उनकी छोटी सी  उम्र  ‘आइकन’ बन गई. क्या वाकई 16 साल का बच्चा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर बन सकता है?  भारत के मध्यमवर्ग में एक अवधारणा पनपने लगी कि शिक्षक पिता और एलआईसी कर्मचारी मां की संतान सचिन अगर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर बन सकता है तो हमारा बच्चा क्यों नहीं. सचिन की ‘सोलह साला’ उम्र ने भारत में एक ट्रेंड सेट कर दिया और मां-बाप अपने बेटे को क्रिकेटर बनाने के ख्वाहिशमंद हो गए.  हालांकि सचिन से पहले अलीमुद्दीन (12 साल और 73 दिन),  एस.के. बोस (12 साल और 76 दिन) और मोहम्मद रमजान (12 साल और 247 दिन) ने छोटी आयु में प्रथम श्रेणी क्रिकेट में पदार्पण किया था लेकिन इनमें से कोई भी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंचा. सचिन ने अपना अलग मुकाम तैयार किया. वह एक आदर्श बन गए. वैभव सूर्यवंशी उसी फसल का फल है जिसे सचिन तेंदुलकर ने 35 साल पहले बोई थी. अब देखते हैं यह फल भारतीय क्रिकेट में कितना मिठास घोलेगा.



खेल में करियर का जोखिम

वैसे आज के जमाने में किसी भी खेल में बच्चे का करियर बनाना बड़ा जोखिमभरा है. मैं बच्चों को खिलाड़ी बनाने का विरोधी नहीं हूं. खेल भी तो देश का नाम रोशन करने का एक शक्तिशाली माध्यम है. ओलंपिक में हम ताकत तभी दिखाएंगे जब खिलाड़ी प्रतिभाशाली होंगे लेकिन भारत जैसे प्रति व्यक्ति कम आयवाले देश में बच्चे का करियर किसी खेल में बनाना दोधारी तलवार साबित हो सकता है. खिलाड़ी बनने की कोशिश में बच्चा अपनी आयु के महत्वपूर्ण साल मेहनत करने में लगाएगा. इस दौरान शिक्षा पर वह अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर सकेगा और लाख कोशिश के बावजूद कामयाब खिलाड़ी नहीं बन पाया तो?...तो भविष्य में क्या कर लेगा? पढ़ाई के मामले में भी पिछड़ा और खेल के मोर्चे पर भी फिसड्डी. क्या होगा उसका मुस्तकबिल. खेल के जुनून में लगातार मेहनत करके वह जिस्मानी तौर पर कमजोर हो चुका होगा और पढ़ाई में पिछड़ा रह जाएगा. 


सात पुश्तें खा सके तो खिलाड़ी बनाओ

सो, माता-पिता भी बच्चों को खिलाड़ी बनाने की अंधी दौड़ में पसीने की कमाई खर्च कर चुके होंगे। किसी भी खेल की सामग्री आज सस्ती नहीं है। हजारों-लाखों का खर्च इसमें लगा रहता है.  तिस पर बच्चे का शरीर एक एथलीट का बनाने के लिए पोषक आहार की जरूरत होती है सो अलग. तीस-चालीस हजार की तनख्वाह पानेवाले के लिए यह तो पहाड़ तोड़ने जैसा है.  इतना सबकुछ करके बच्चा यदि कामयाब नहीं होगा तो माता-पिता डिप्रेशन (अवसाद) में चले जाएंगे. बच्चे का हाल भी यही होगा. माता-पिता की निराशा देख वह भी अवसाद का शिकार होकर रहेगा.  30 साल की मेरी पत्रकारिता का काफी बड़ा हिस्सा खेल की बीट पर काम करते हुए गुजरा है. फिर भी मैं बच्चों को खेल में करियर बनाने का पक्षधर नहीं हूं. अलबत्ता मुझ पर नकारात्मक सोच का व्यक्ति होने की तोहमतें क्यों न लगे. मेरा तो स्पष्ट मत है कि बच्चे को खिलाड़ी बनाने के लिए वही अभिभावक पहल करें कि जिनकी पुश्तें घर बैठकर आराम से खा सकती हैं या जिनकी तनख्वाह लाखों में है. सुबह 11 से रात आठ या फिर मेरी तरह शाम 4 से रात 12.30 बजे तक एक सामान्य-सी तनख्वाह पर काम करनेवालों के लिए अच्छा विकल्प यही है कि बच्चों को ऊंची शिक्षा दो, सांस्कृतिक-सामाजिक-संवैधानिक मूल्यों की समझ दो और बुढ़ापे में हमारी लाठी बनने के काबिल बनाओ. यह विचार स्वार्थ से भरा अवश्य है लेकिन बच्चे या बच्ची को खिलाड़ी के तौर पर पहचान दिलाने की कोशिश में बर्बादी से बचाने से माता-पिता का स्वार्थ अच्छा. अपवाद हालांकि हर जगह होते हैं। क्रिकेटर रिंकू सिंह, यशस्वी जायसवाल या बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल, हॉकी खिलाड़ी रानी रामपाल जैसे खिलाड़ी मध्यवर्ग या निम्न मध्यवर्ग से उभरे हैं लेकिन यह खिलाड़ी 'एक्स्ट्राऑर्डिनरी' है। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से अपना लक्ष्य हासिल कर लिया। हर बच्चे के लिए यह मुमकिन कैसे हो सकता है। 


क्रिकेट तो फिर भी ठीक है

अखबारों, पत्रिकाओं, सोशल मीडिया के पन्ने ऐसे बच्चे और अभिभावकों के अनगिनत उदाहरणों से भरे हैं जो खिलाड़ी के संघर्ष से शिखर तक की कहानी बयां करते हैं. लेकिन हर बच्चा संघर्ष के बावजूद शिखर तक पहुंचेगा ही, ऐसा नहीं. संघर्ष के बावजूद वह गर्त में भी जा सकता है. जरा व्यावहारिक पक्ष को समझिए. क्रिकेट में फिर भी ठीक है. भरपूर पैसा है. आईपीएल के एक-दो ही सीजन खेल ले या फिर घरेलू सर्किट में कुछ मुकाबले खेल ले और आगे खेलने का मौका भी न मिले तो भी वह अपने अल्पकालिक करियर में इतना तो कमा ही चुका होता है कि बैठे-बैठे आराम से जिंदगी गुजर जाए. अब तो बीसीसीआई से अच्छी-खासी पेंशन भी दी जाती है. सवाल है क्रिकेट से इतर अन्य खेलों में क्या मिलता है. दीगर खेलों में पैसा बहुत कम है. बैडमिंटन, हॉकी, फुटबॉल, बास्केटबॉल में अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनकर भी गारंटी नहीं कि वह ताउम्र बेहतर जिंदगी गुजारे. हां, अब इन खेलों के राष्ट्रीय संगठन भी आईपीएल के नक्शेकदमों पर चलकर लीग शुरू कर चुके हैं लेकिन खिलाड़ी पहले वहां तक पहुंचे तो सही.


22 साल का बूढ़ा!

यहां चीन का उदारहण प्रासंगिक है. चीन में अल्पायु में ही बच्चों को ओलंपिक खेलों के लिए ट्रेन किया जाता है. ट्रेनिंग के नाम पर अनगिनत यातनाएं, क्रूरता बच्चे बर्दाश्त करते हैं. उनकी पढ़ाई-लिखाई उतनी नहीं हो पाती. फर्ज कीजिए किसी चीनी बच्चे ने 14 साल की उम्र में ओलंपिक में हिस्सा लिया और पदक जीता. फिर चार साल बाद वह ओलंपिक के लिए तैयार रहेगा. हो सकता है एक बार फिर उसने ओलंपिक में पदक जीता. अब उसकी उम्र है 18 साल लेकिन इसके चार साल बाद उसका हश्र क्या होगा जब वह 22 साल का हो चुका होगा. ओलंपिक के लिए खिलाड़ियों की नई पौध आ चुकी होती है. चीन अब नए खून पर भरोसा करेगा या 22 साल के इस ‘बूढ़े’ पर. 22 साल के इस ‘बूढ़े’ को जब ओलंपिक में तीसरी बार खेलने का मौका नहीं मिलेगा तो वह क्या करेगा? कहीं नौकरी ढूंढेगा लेकिन नौकरी भी कहां से मिलेगी क्योंकि उसकी शिक्षा स्तरीय नहीं है. चीन कोई भारत नहीं है जहां पूर्व ओलंपियन या पदक जीतने पर खूब उधो-उधो होती है और नौकरी दे दी जाती है. हालांकि यह अच्छी बात है लेकिन चीन में हजारों ओलंपियन निकल आते हैं उन्हें नौकरी कहां से मिल सकती है.  

एक बड़ा अच्छा उदाहरण याद आया. सुनील गावस्कर अपने बेटे रोहन से अक्सर कहते थे कि तुम क्रिकेटर जरूर बनो लेकिन पढ़ाई-लिखाई की कीमत पर नहीं. पढ़ाई इसलिए जारी रखो कि अगर क्रिकेटर न बन सके तो कम से कम कहीं अच्छी सी नौकरी तो कर लोगे. भूखे मरने की नौबत तो नहीं आएगी. सुनील गावस्कर खुद महान क्रिकेटर हैं लेकिन खेल के प्रति उनका दृष्टिकोण व्यावहारिक था और आज भी इसे नहीं बदलना चाहिए.

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Comments

  1. एकदम सही विश्लेषणात्मक लेख

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  2. रविन्द्रजी आपका लेख मुझे बहुत अच्छा लगा मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं।

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