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अमेरिका और युद्ध का कारोबार

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दुनिया में शांति के लिए जंग की अवधारणा प्रस्तुत करता  पब्लियस फ्लेवियस वेजीटियस रेनाट्स का सदियों पुराना फलसफा  प्रभावित नहीं कर सकता।  अमन और युद्ध परस्पर विरोधी हैं। अमन जहां लोगों को जीने का हक देता है, हम सबकी जीवनधारा में प्रेम की मिशरी घोलता है, वहीं युद्ध का तात्पर्य विनाश है। चौथी-पांचवीं शताब्दी के रोमन लेखक और सैन्य विशेषज्ञ पब्लियस फ्लेवियस वेजीटियस रेनाट्स ने पता नहीं किस संदर्भ में अपनी किताब ‘डी रे मिलीटारी’ में  युद्ध और शांति को एक दूसरे की पूरक बता दिया लेकिन आगे चलकर यह वाक्यांश अमेरीकी फलसफा बना और अब जो हो रहा है  वह सब अमानवीय है। धन-दौलत, गजब की तकनीकी सुविधाएं और अत्याधुनिक हथियारों के बूते सर्वशक्तिमान अमेरिका कई देशों पर युद्ध लादकर विश्व को अस्थिर रखने का काम करता रहा है।  रेनाट्स ने तो शांति के लिए युद्ध की अवधारणाभर  दी लेकिन अवसरवादी अमेरिकी शासकों ने इसमें बाजार की भी अवधारणा  घुसाकर इसे परिष्कृत कर दिया। अमेरिका के लिए युद्ध अब उसके आयुध बेचने का विशाल ‘मॉल’ है। युद्ध का इतना शानदार व्यावसायिकरण और आयुधों का विपणन दु...

धुरंधरः कितना मनोरंजन, कितना जहर !

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  बॉलीवुड की फिल्म ‘धुरंधर’ इन दिनों खासा चर्चा में है। चर्चा का मुख्य कारण फिल्म के नायक से अधिक अक्षय खन्ना का अभिनय है। अक्षय खन्ना ने इस फिल्म में पाकिस्तान के कराची के कुख्यात इलाके ल्यारी से जुड़े एक खूंखार बदमाश रहमान डकैत का किरदार निभाया है। अभिनय के स्तर पर उन्होंने अपने चरित्र को पूरी शिद्दत से जिया है। यही कारण है कि फिल्म में नायक कोई भी हो , लेकिन विलेन के रूप में अक्षय खन्ना दर्शकों की स्मृति में ठहर जाते हैं। यह स्थिति कुछ वैसी ही है जैसी हाल में फिल्म ‘एनिमल’ में बॉबी देओल के साथ देखने को मिली थी। हालांकि ‘धुरंधर’ बॉक्स ऑफिस पर सफल रही हो , लेकिन उसकी कामयाबी अपने साथ कई सवाल भी लेकर आती है। सबसे अहम प्रश्न यही है कि आखिर ऐसी फिल्मों का निर्माण क्यों किया जा रहा है , जिनमें हिंसा और सेक्स का अत्यधिक प्रदर्शन कथानक का मुख्य आधार बन चुका है। यह निर्विवाद सत्य है कि हिंदी सिनेमा समाज का दर्पण माना जाता है और समाज भी सिनेमा से प्रभावित होता है। समाज में जो प्रवृत्तियाँ जन्म लेती हैं , वे फिल्मों में प्रतिबिंबित होती हैं और फिल्मों में दिखाई जाने वाली प्रवृत्तियाँ समा...

‘सरकशी’ का परचम लहराने का ‘सौतेला इनाम’?

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‘सरकशी’ का तात्पर्य विद्रोह है, लेकिन यह भी न भूलें कि दुनिया में सामंतों की नींव हिला कर नई समतावादी व्यवस्था स्थापित करने की शक्ति भी ‘सरकशी’ में ही निहित है। भारतीय महिलाएं आज जिस कामयाबी के मुकाम पर हैं, वह इस विद्रोही चेतना की ही फलश्रुति है। भारतीय महिलाओं के संघर्ष की दास्तान काफी लंबी, मगर उतनी ही प्रेरक भी है। सावित्रीबाई फुले, सरोजिनी नायडू, फातिमा शेख, अहिल्याबाई होल्कर, एनी बेजेंट और इंदिरा गांधी ने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देकर भारतीय नारियों में आत्मसम्मान की अलख जगाई। पितृसत्ता के खिलाफ विद्रोह का परचम थामने की ताकत नारी हाथों में उत्पन्न की और इतना ही नहीं, 21वीं सदी में उन्हें व्योम तक पहुंचा दिया। आज भारतीय महिलाओं की उपलब्धियों को उंगलियों पर नहीं गिना जा सकता। इसी कड़ी में एक और गौरवशाली अध्याय जुड़ा जब रविवार, दो नवंबर की रात भारत की महिला टीम आईसीसी वनडे विश्व कप स्पर्धा की विजेता बनी। यह उपलब्धि न तो रातों-रात मिली और न ही किसी परालौकिक शक्ति ने इसे थाली में सजाकर दे दिया। प्रदीर्घ संघर्ष गाथा इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे भारतीय महिला टीम की लंबी संघर्ष...

एड गेनः इंसान की खाल में छिपा विकृत शैतान

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एड गेन जो भयानक विकृति से ग्रसित था 17 नवंबर 1957 की बर्फीली रात को अमेरिका के प्लेनफील्ड कस्बे ( विस्कॉन्सिन ) के एक मकान में पुलिस दबीश देती है। मकान के भीतर का नजार देख कुछ पुलिसवाल बेहोश हो जाते हैं, जबकि  कुछ को उल्टियां होने लगती हैं। मांस और खून की बदबू से पुलिसकर्मियों के सर फटे जा रहे हैं।  दोजख और इस मकान में कोई फर्क ही नहीं है।  58 वर्षीय बर्निस वॉर्डन को लापता हुए 24 घंटे हो चुके थे। उसीकी खोजबिन के सिलसिले में पुलिस की यह दबीश थी। बर्निस हार्डवेयर स्टोर की मालकिन थी, पर अपनी जिंदगी में वह बेहद तनहा महसूस करती थी। बेटा फ्रैंक वॉर्डन स्थानीय डिप्टी शेरिफ था लेकिन मां से दूर रहता था।  पुलिसवालों ने मकान के हर कमरे की तलाशी शुरू कर दी और जो देखा वह राक्षसोंवाली किसी तिलस्मी उपन्यास में ही संभव है।  कमरों में पुलिवासवालों को मानव कंकाल और हड्डियों के टुकड़े मिले।  कूड़ादान, कुर्सियों के कवर, मुखौटे, लेगिंग्ज भी वहां दिखाई दिए और यह सभी महिलाओं के खाल से बनाए गए थे।  मानव खोपड़ियों के कटोरे वहां थे और  खंभों पर  महिलाओं की खोपड़ियां ल...

…जेब में है माल…तो ही बनेगा खिलाड़ी कमाल

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प्रथम श्रेणी क्रिकेट के पांच मुकाबलों की दस पारियों में वैभव सूर्यवंशी के नाम पर केवल 100 रन हैं. 158 गेंदें उसने खेली हैं, 18 चौके और एक छक्का मारा है. सउदी अरब के जेद्दा में इंडियन प्रीमियर लीग की महानीलामी से पहले वैभव का यह रिकॉर्ड है. वैभव इस समय सुर्खियां अपने रिकॉर्ड की वजह से नहीं, उम्र की वजह से बटोर रहा है. मात्र 13 वसंत देख चुके इस किशोर को राजस्थान रॉयल्स ने उसके आधार मूल्य 30 लाख से साढ़े तीन गुना अधिक यानी एक करोड़ 10 लाख रुपए में खरीदा. बिहार के समस्तीपुर जिले में एक निम्न मध्यवर्ग परिवार से वास्ता रखने वाले वैभव ने अगर क्रिकेट के ग्लैमरस वर्ल्ड में खुद को संभाले रखा तो भारत के खेल क्षितिज पर अपने तेज का पुंज बिखरता सितारा हम जल्द ही देख पाएंगे, वरना विनोद कांबली या पृथ्वी शॉ की कटु मिसालें सामने हैं. क्रिकेट की दुनिया की दौलत, शौहरत और ग्लैमर कांबली और शॉ हजम नहीं कर सके और वह बहते गए, भटकते गए. ऐसा कुछ वैभव के साथ न हो बस. उम्र एक ‘आइकन’ 13 साल की उम्र में कोई बच्चा अगर किसी भी खेल में हेडलाइन बन रहा है तो इसका मतलब है उसमें कुछ तो है. और हो सकता है भविष्य में वह कोई ट्...

अधूरा सुसाइड नोट

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‘‘देख कलुआ, दुबारा ऐसी हिमाकत मत करना, वरना कुत्ते इतना मारूंगी न तुझे कि...’’  ‘‘ हरामजादी, पता है तू कैसी है। मुझे डांटती है और सबको...’’           ‘‘ये...क्या कहा रे तूने हरामी के पिल्ले...तेरी मां-बहन को जाकर बोल ये सब...हरामखोर ...लफंगे...अपनी सूरत तो देख ले...कमीने जी चाहता है कि तेरी चमड़ी उधेड़ दूं ...खून पी जाऊंगी तेरा... ’’ अब मीना आपे से बाहर हो चुकी थी। क्रोध से उसकी सांसें फूल रही थीं और छतिया बहुत तेज ऊपर-नीचे हो रही थी। मीना ने कपड़ों से भरी बाल्टी वहीं पटक दी और बड़ा सा पत्थर उठा लिया और कलुआ की ओर उछाल दिया। तीव्र गति से आ रहे पाषाण की मार से बचने के लिए कलुआ बाएं तरफ झुका। पत्थर नहीं उसके करीब से मौत गुजर चुकी थी। मीना की आंखें अंगारें बरसा रही थीं। कलुआ ने खिसकने में ही भला समझा।  000000000 मीना को नींद नहीं आ रही थी। रात गुजरे लंबा समय हो चुका था। अब तो भोर होने चली थी। मीना करवटें बदल-बदलकर सूरज के ऊगने का इंतजार कर रही थी मगर उसका मन अतीत की गहराई में प्रवेश कर रहा था। आंखें नम थीं। मीना सातवीं में पढ़ रही थी कि एक दिन बापू ने...