अमेरिका और युद्ध का कारोबार
दुनिया में शांति के लिए जंग की अवधारणा प्रस्तुत करता पब्लियस फ्लेवियस वेजीटियस रेनाट्स का सदियों पुराना फलसफा प्रभावित नहीं कर सकता। अमन और युद्ध परस्पर विरोधी हैं। अमन जहां लोगों को जीने का हक देता है, हम सबकी जीवनधारा में प्रेम की मिशरी घोलता है, वहीं युद्ध का तात्पर्य विनाश है। चौथी-पांचवीं शताब्दी के रोमन लेखक और सैन्य विशेषज्ञ पब्लियस फ्लेवियस वेजीटियस रेनाट्स ने पता नहीं किस संदर्भ में अपनी किताब ‘डी रे मिलीटारी’ में युद्ध और शांति को एक दूसरे की पूरक बता दिया लेकिन आगे चलकर यह वाक्यांश अमेरीकी फलसफा बना और अब जो हो रहा है वह सब अमानवीय है। धन-दौलत, गजब की तकनीकी सुविधाएं और अत्याधुनिक हथियारों के बूते सर्वशक्तिमान अमेरिका कई देशों पर युद्ध लादकर विश्व को अस्थिर रखने का काम करता रहा है। रेनाट्स ने तो शांति के लिए युद्ध की अवधारणाभर दी लेकिन अवसरवादी अमेरिकी शासकों ने इसमें बाजार की भी अवधारणा घुसाकर इसे परिष्कृत कर दिया। अमेरिका के लिए युद्ध अब उसके आयुध बेचने का विशाल ‘मॉल’ है। युद्ध का इतना शानदार व्यावसायिकरण और आयुधों का विपणन दुनिया में किसी ने भी नहीं किया है। हालांकि रूस ने प्रयास किए थे लेकिन (यूएसएसआर) विघटन के बाद वह कमजोर पड़ा और अमेरिका काफी आगे निकल गया।
जब दुनिया में सब कुछ ठीक-ठाक चलते रहता है तब अमेरिका को अचानक किसी राष्ट्र के पास परमाणु हथियार होने का साक्षात्कार हो जाता है। फिर वह उस राष्ट्र से संपूर्ण विश्व को खतरा बताने लग जाता है और अचानक किसी दिन हमला बोल देता है। इजराइल के सहयोग के ईरान पर हमला इसी का द्योतक है। अमेरिका ने इराक पर भी इसी कारण से हमला करके सद्दाम हुसैन को मारा और अब ईरान के सर्वोच्चे नेता आयतुल्ला खामेइनी की जान ली। किसी राष्ट्र के पास परमाणु आयुधों की मौजूदगी दुनिया के लिए खतरा बताने का अमेरिकी तर्क पूर्णतः खोंखला लगता है। परमाणु आयुधों से लैस अन्य राष्ट्रों पर आंखें तरेररनेवाला अमेरिका दुनिया में सर्वाधिक परमाणु आयुधधारी राष्ट्रों में दूसरे स्थान पर माना जाता है। पहला स्थान रूस का है। मतलब अमेरिका से दुनिया के लिए खतरा नहीं और ईरान-इराक जैसे उसके सामने मुट्ठीभर देशों से खतरा है? इतिहास के पृष्ठों में और गहरा जाने की जरूरत नहीं। विश्व में केवल एक बार परमाणु बम का प्रयोग अब तक हुआ है वह अमेरिका ने ही किया है। द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर तबाही का जो मंजर खड़ा किया वह न तो जापानी भूले सके हैं और न हम। इससे क्या निष्कर्ष आप निकाल सकते हो?
सबसे बड़ा शैतान
खैर, खामेइनी ही थे जिन्होंने अमेरिका को अबसे कुछ 45 साल पहले दुनिया का सबसे बड़ा शैतान कहा था। लेकिन एक हकीकत और है कि अमेरिका खुद दुनिया में शैतानी प्रवृत्तियों को जन्म देता है, उनकी परवरिश करता है, पुष्ट बनाता है लेकिन जब यहीं प्रवृत्तियां उसीपर फन उठाने लगती हैं तो फिर उन्हें बड़ी बेरहमी से मार दिया जाता है। ओसामा-बिन -लादेन इसी कथन का नायाब उदाहरण है।
…तो हो सकती हैं 9/11 जैसी वारदातें
बहरहाल, ईरान के साथ अमेरिकी हरकत भारत समेत कई देशों को भविष्य के लिए सचेत रहने का संकेत है। इससे आनेवाले समय में आतंकवाद फिर भड़केगा। पिछले कुछ वर्षों में आतंकवाद ठंडा होने लगा था लेकिन उसका जिन्न अमेरिका ने ईरान पर हमला कर जागृत कर दिया है। अमेरिका को खुद सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा जैसे कई संगठन एकजुट होकर अमेरिका में 9/11 जैसी वारदातों को अंजाम दे सकते हैं जिसमें कई बेगुनाहों की जान जा सकती है। अमेरिका न किसी का हुआ है और न किसी का होगा। मौजूदा भारत सरकार का रुझान अमेरिका की तरफ जरूर है लेकिन मुश्किल दौर में साथ देनेवाला मित्र वह नहीं बन सकता। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमने उसकी सच्चाई देख ली।




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