धुरंधरः कितना मनोरंजन, कितना जहर !
बॉलीवुड की फिल्म ‘धुरंधर’ इन दिनों खासा चर्चा में है। चर्चा का मुख्य कारण फिल्म के नायक से अधिक अक्षय खन्ना का अभिनय है। अक्षय खन्ना ने इस फिल्म में पाकिस्तान के कराची के कुख्यात इलाके ल्यारी से जुड़े एक खूंखार बदमाश रहमान डकैत का किरदार निभाया है। अभिनय के स्तर पर उन्होंने अपने चरित्र को पूरी शिद्दत से जिया है। यही कारण है कि फिल्म में नायक कोई भी हो, लेकिन विलेन के रूप में अक्षय खन्ना दर्शकों की स्मृति में ठहर जाते हैं। यह स्थिति कुछ वैसी ही है जैसी हाल में फिल्म ‘एनिमल’ में बॉबी देओल के साथ देखने को मिली थी।
हालांकि ‘धुरंधर’ बॉक्स ऑफिस पर सफल रही हो, लेकिन उसकी कामयाबी अपने साथ कई
सवाल भी लेकर आती है। सबसे अहम प्रश्न यही है कि आखिर ऐसी फिल्मों का निर्माण
क्यों किया जा रहा है, जिनमें हिंसा और सेक्स का अत्यधिक प्रदर्शन कथानक का
मुख्य आधार बन चुका है। यह निर्विवाद सत्य है कि हिंदी सिनेमा समाज का दर्पण माना
जाता है और समाज भी सिनेमा से प्रभावित होता है। समाज में जो प्रवृत्तियाँ जन्म
लेती हैं, वे फिल्मों में प्रतिबिंबित होती हैं और फिल्मों में
दिखाई जाने वाली प्रवृत्तियाँ समाज की मानसिकता को प्रभावित करती हैं। इस
पारस्परिक संबंध को समझना और उसकी जिम्मेदारी स्वीकार करना फिल्म निर्माताओं का
दायित्व है। व्यावसायिक सफलता का लक्ष्य अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन उसकी
कीमत सामाजिक चेतना और नैतिक संतुलन से चुकाई जाए, यह स्वीकार्य नहीं है।
हिंसा और सेक्स का बाजार
‘धुरंधर’ और ‘एनिमल’ जैसी फिल्मों का आनंद लेने के लिए
दर्शक तीन से साढ़े तीन घंटे सिनेमाघर में बिताता है। इस दौरान वह मुख्यतः हिंसा, अपराध और
कामुक दृश्यों का उपभोग करता है। प्रश्न यह है कि सिनेमा हॉल से बाहर निकलते समय
उसकी मानसिक अवस्था क्या होती है। ऐसी फिल्में निर्माताओं को त्वरित और विशाल
आर्थिक लाभ अवश्य दिला देती हैं, अभिनेता लोकप्रियता अर्जित करते हैं और कई बार
अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँच भी बना लेते हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष कहीं अधिक
चिंताजनक है—समाज पर पड़ने वाला उसका दीर्घकालिक प्रभाव। जब हिंसा और यौन
आक्रामकता को बार-बार रोमांच और शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उसका
सामान्यीकरण होने लगता है।
सेंसर बोर्ड की भूमिका
फिल्मों के सामाजिक प्रभाव को संतुलित रखने की जिम्मेदारी केंद्रीय फिल्म
प्रमाणन बोर्ड की भी है। दुर्भाग्यवश, उसकी भूमिका लंबे समय से सवालों
के घेरे में रही है। अक्सर यह धारणा बनती रही है कि गुणवत्ता और सामाजिक
उत्तरदायित्व के बजाय अन्य कारणों से फिल्मों को प्रमाणन मिल जाता है। बीते डेढ़
दशक में यह आशंका और गहराई है कि सेंसर बोर्ड स्वतंत्र संस्था की जगह
सत्ता-प्रभावित तंत्र की तरह काम कर रहा है। कई तथाकथित ‘एजेंडा फिल्मों’ को आसानी
से अनुमति मिल जाना इसी संदेह को बल देता है।
राजनीति और सिनेमा
पाकिस्तान के एक कुख्यात अपराधी के जीवन पर आधारित फिल्म बनाना केवल रचनात्मक
निर्णय भर नहीं लगता। वर्तमान राजनीतिक वातावरण में ‘पाकिस्तान’ एक संवेदनशील और
भावनात्मक रूप से उकसाने वाला विषय बन चुका है। चाहे वह आतंकवादी घटनाओं के संदर्भ
हों या फिर सिनेमा, इस विषय का उपयोग राजनीतिक लाभ और जनभावनाओं को
प्रभावित करने के लिए होता रहा है। ‘धुरंधर’ भी इसी प्रवृत्ति से अछूती नहीं
दिखती। फिल्म में एक समुदाय विशेष के प्रति नकारात्मक छवि गढ़े जाने का आरोप गंभीर
है और इस पर विमर्श आवश्यक है, क्योंकि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि
सामाजिक मानस को आकार देने वाला माध्यम भी है।
विकल्पों की कोई कमी नहीं
यह मानना कठिन है कि भारतीय समाज में सकारात्मक और प्रेरक विषयों की कमी है।
आमिर खान की ‘लगान’ हो या हालिया वर्षों में आई किरण राव की ‘लापता लेडीज़’, ऐसे अनेक
उदाहरण हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि संवेदनशील और सार्थक विषय भी दर्शकों को
आकर्षित कर सकते हैं। ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा’, ‘चक दे इंडिया’ और ‘इकबाल’ जैसी
फिल्में मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक संदेश भी देती हैं। हाल के वर्षों में शाहरुख
खान की फिल्म ‘जवान’ ने भी सामाजिक सरोकारों को व्यावसायिक सिनेमा की भाषा में
प्रस्तुत किया। प्रश्न यह है कि क्या फिल्म उद्योग ऐसे संतुलित प्रयासों को
निरंतरता देने को तैयार है।
‘सैयारा’ की सफलता का संकेत
इसी वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘सैयारा’ एक साधारण और संवेदनशील प्रेम कथा थी। भले
ही उसकी तुलना 80 और 90 के दशक की संगीतप्रधान प्रेम कहानियों से न की जा सके, फिर भी
दर्शकों ने उसे स्वीकार किया। यह इस बात का प्रमाण है कि दर्शक केवल हिंसा और
उत्तेजना का ही उपभोग नहीं करना चाहता। अगर खालिस मनोरंजन की ही बात करें, तो 70 और 80
के दशक में प्रदर्शित अमोल पालेकर की ‘घरौंदा’, ‘रजनीगंधा’, ‘चितचोर’, ‘बातों
बातों में’, ‘छोटी सी बात’ जैसी फिल्में बेहद सादगीपूर्ण, सरल और संवेदनशील होती थीं। क्या वे फिल्में दर्शकों को नहीं भाती थीं?
दर्शक तो इन फिल्मों को सिर पर लेते थे। उस समय सत्यजित रे, यश चोपड़ा, बासु भट्टाचार्य, श्याम
बेनेगल, मणिरत्नम, मृणाल सेन जैसे कई
निर्माता और निर्देशक थे, जो भारतीय समाज का यथार्थ चित्रण
अपनी फिल्मों के माध्यम से करते थे। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी आज कई
उत्कृष्ट और गंभीर रचनाएँ उपलब्ध हैं, हालांकि वहां भी हिंसा और सेक्स
की अधिकता को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
संयम और ज़िम्मेदारी की आवश्यकता
यह सच है कि भारतीय समाज धीरे-धीरे रूढ़िवादी सोच से बाहर निकल रहा है और अधिक
खुलापन दिखा रहा है। लेकिन इस बदलाव का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि सिनेमा हिंसा
और सेक्स के अतिरेक को ही प्रगतिशीलता मान ले। कहानी को यथार्थवादी और रोचक बनाने
के नाम पर इन तत्वों का महिमामंडन अंततः समाज को ही नुकसान पहुँचाता है। हत्या और
यौन अपराधों की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या
ऐसी फिल्मों की भूमिका पर गंभीर आत्ममंथन नहीं होना चाहिए। अंततः सवाल यही है कि
‘धुरंधर’ और ‘एनिमल’ जैसी फिल्मों के माध्यम से समाज को किस दिशा में ले जाने की
कोशिश की जा रही है। (प्रस्तुत तस्वीरें गूगल से ली
गई हैं)





बहुत ही शानदार समीक्षा सर जी....कीबोर्ड पर हलचल करनेवाली उंगली को सेल्यूट
ReplyDeleteआपका शुक्रिया, सर क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं
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