मुंह में आया बक दिया..

उच्च वर्णीयों को दस फीसदी आरक्षण, तीन तलाक विधेयक जैसे अहम सियासी घटनाक्रमों के बीच ‘कॉफी विद करण’ में क्रिकेटर हार्दिक पंड्या और केएल राहुल की महिलाओं संबंधी अशोभनीय टिप्पणियों ने अखबारों के पन्ने तथा खबरिया चैनलों को गर्म रखा.  पंड्या ने यह कबुलीनामा देकर हद ही कर दी कि जब भी बाहर ‘मर्दानगी’ दिखाकर लौटा अपने माता-पिता से उसने खुलकर इस विषय में चर्चा की. इसे परिवार में विचारों का खुलापन कहें या फिर उच्छृंखलता?  शो में और भी कई तरह की बातें हुईं जिनका जिक्र यहां मुमकिन नहीं है.
मुङो तो लगता है कि विशुद्ध पश्चिमी परिवेश में बढ़े-पले भी अपनी ‘मर्दानगी’ का महिमामंडन जन्मदाताओं के समक्ष करने का साहस नहीं दिखाते होंगे. भारत में सेक्स विषय ही ऐसा है जिसपर चार लोगों के बीच खुलकर चर्चा करना अभी भी अस्वीकार्य है. यौन संबंधों को भारतीय परिवेश में स्त्री और पुरुष का नितांत निजी मामला माना जाता है. लिहाजा ऐसे अत्यंत ‘गोपनीय मसले’ पर जब कोई खुलकर बोलने की चेष्टा करता है तो बवाल उठना लाजमी है. पंड्या ने ‘कॉफी विद करण’ में जो कहा उसे संयत शब्दों में भी कहा जा सकता था, किसी तरह इशारे में समझा सकता था लेकिन बंदा जैसे बहका हुआ था और बकने का लाइसेंस ले आया था. बोलता चला गया, जिससे महिलाओं के प्रति उसकी सोच का ‘साक्षात्कार’ संसार को हो गया और यह भी ज्ञात हुआ कि पंड्या भी उसी घटिया मानसिकता से ग्रसित है जो स्त्री को केवल उपभोगेय मानती है. 
आप व्यक्तिगत जीवन में जैसे भी हों, संत हों या खालिस ‘ठरकी’ हों क्यों अपनी अंतरंगता को जाहिर करके मुसीबत मोल ले रहे हो. यौन संबंधों को लेकर आप भले ही स्वच्छंद हों लेकिन टीवी शो जैसे सार्वजनिक मंच पर इसका बखान नहीं कर सकते. ओशो ने अपनी किताब ‘संभोग से समाधि की ओर’ में यौन संबंधों में खुलेपन की वकालत की है लेकिन उनका उद्येश्य है मानवीय जीवन की इस सबसे खूबसूरत भावना को विकृति से उबारना, यौन की ओर देखने के नकारात्मक नजरिये में बदलाव लाना. ओशो ने अपनी किताब में कहीं नहीं लिखा कि आप रंगरेलियां मनाओ और अपनी मर्दानगी के किस्से दुनिया को बेखौफी से सुनाओ. पंड्या और केएल राहुल अगर थोड़ा भी विवेक से काम लेते तो माफी मांगने बच सकते थे.

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