युद्ध नहीं बुद्ध चाहिए

चाणक्य कहते हैं, ‘ऐसा युद्ध जिसमें राजा की जिंदगी खतरे में नहीं होती, युद्ध नहीं, बल्कि सियासत है.’ मौजूदा हालात चाणक्य की इसी कथन की तस्दिक कर रहे हैं. हमारे ‘प्रधानसेवक’ और उनके अधिनस्त कोई भी मंत्री खतरा महसूस नहीं कर रहा है. पुलवामा में चालीस से अधिक जवानों की शहादत के प्रतिशोध स्वरूप भारतीय फौज के हमले में कथित रूप से तीन सौ के करीब दहशतगर्दो की मौत के बाद पाकिस्तान के प्रतिहमले के खतरे को देखते हुए न तो हमारे ‘प्रधानसेवक’ की सुरक्षा में इजाफा किया गया है और ना ही अन्य मंत्रियों के. न ही सरकारी तौर पर कभी यह कहने की जहमत उठाई गई कि देशवासियों को पाकिस्तान से युद्ध की आशंका के मद्देनजर सतर्क रहने की जरूरत है, पर सरकार के प्रवक्ता बने 95 फीसदी खबरिया चैनलों ने भारत में युद्ध सदृश्य स्थिति पैदा जरूर कर दी. पत्रकारिता के मूल्यों को चैनलों और उनके एंकरों ने रौंदकर मुल्क में युद्धोन्माद खड़ा कर दिया. प्रत्यक्ष नियंत्रण रेखा का उल्लंघन करके भारतीय वायुसेना द्वारा हजार किलो का बम गिराने के बाद मोदी सरकार के पक्ष में माहौल बनाने का जो कर्म 95 फीसदी खबरिया चैनल करते रहे वह निष्पक्ष पत्रकारिता पर कूठराघात है. इसमें कोई पत्रकारिता नहीं थी. केवल डमरू बजाना था. सारे के सारे एक आवाज में कहने लगे थे अब पाकिस्तान को युद्ध की जुबान में ही जवाब देना होगा. इन चैनलों ने पूरे देश को अपनी ऐसी गिरफ्त में ले लिया कि सारा वतन एक ही जुबान में पाकिस्तान से जंग की बात करने लगा. जो प्रधानसेवक पहले कभी ‘आर या पार’ की बातें करता था वह तो एक बार हमला करवाके खामोश हो गया लेकिन चैनल के एंकर पाकिस्तान का नाम बार-बार लेकर, उसे सबसे बड़ा खतरा बताकर, पिछली लड़ाइयों का जिक्र कर और भारतीय फौजियों की वीरता की दुहाई देकर  आम हिंदुस्तानियों के लहू में उबाल भरने का काम बदस्तूर सप्ताह भर करते रहे. क्या इन चैनलों में से किसी ने भी युद्ध की विभिषिका को करीब से देखा है? क्या ये जानते हैं कि युद्ध क्या होता है? क्या युद्ध की दहक कभी इन्होंने महसूस की है? मैं तो यह कहने का साहस करुंगा कि वर्तमान में भारत का कोई भी नागरिक युद्ध की विभिषिका को नहीं जानता. चीन के साथ साठ के दशक में भारत का युद्ध जरूर हुआ लेकिन इसकी भीषणता विएतनाम युद्ध से कम ही थी. विएतनाम का युद्ध जिसे अमेरिका ने छेड़ा था और इतिहास में इसे ‘सेकंड इंडोचायना वॉर’ भी कहा जाता है 19 साल, पांच महीने, चार सप्ताह और एक दिन चला था. सात ठिकानों से यह युद्ध लड़ा गया था. विएतनाम युद्ध की दहक को दर्शाती वह तस्वीर है जिसमें 13 बरस की एक किशोरी बेलिबास भाग रही है, जिसका नाम किम फुक है. 8 जून 1972 को दक्षिणी विएतनाम की वायुसेना द्वारा हमले के बाद किम के सारे वस्त्र फट गए थे. उसका एक भाई भी हमले में मारा गया था. किम फुक को बदहवास दौड़ते हुए अपने कैमरे में कैद किया था एसोसिएटेड प्रेस के फोटोग्राफर निक उट ने. पुलित्जर पुरस्कार विजेता यह तस्वीर दुनिया की कालजयी तस्वीरों में से एक है. तस्वीर में कई और लोग भाग रहे हैं और पीछे उठता धुएं का गुबार हमले की भयावहता का प्रमाण है. फिलहाल किम कनाडा में हैं.
हमारा अतीत भी तो कई खौफनाक युद्धों से भरा पड़ा है. महाभारत का युद्ध 18 दिन ही चला था जिसकी परिणति कौन नहीं जानता. पितामह भीष्म जैसे वयोवृद्ध योद्धा से लेकर तो अभिमन्यु जैसे नौजवान वीर महाभारत युद्ध की बलिवेदी पर चढ़ गए. और फिर ईसा पूर्व 261 में हुआ कलिंगा युद्ध तो भारतीय इतिहास की सबसे दर्दनाक, क्रूर दास्तानों में से एक है. कलिंगा के युद्ध में खून की नदियां बहीं और लाशों के ढेर लग गए. इस युद्ध की भीषणता ने सम्राट अशोक जो मौर्य सेना के अधिपति थे को इतना निराश कर डाला कि उन्होंने बुद्ध धर्म अपना लिया और शांति की खोज में निकल पड़े. वैश्विक स्तर की यदि बात करें तो प्रथम और द्वितीय महायुद्ध ने दुनिया को बर्बाद करके रख दिया. लाखों लोग (हो सकता है करोड़ों भी) विश्व युद्ध में मारे गए. दूसरे विश्व युद्ध में हिरोशिमा पर अमेरिका ने परमाणु बम गिरा दिया जिसका असर आज की पुश्तें भी भुगतने पर मजबूर है. दूसरे विश्व युद्ध में ही हिटलर जो दुनिया का भूगोल बदलने चला था आज खुद ऐसा इतिहास बना है कि लोग दुश्चरित्रों को  उसका नाम देने लगे हैं..और हमारे खबरिया चैनल युद्ध..युद्ध की माला जपने में मशगुल हैं. माना कि हमारी फौज वीरों से भरी है, हर हमले का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तत्पर है लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि युद्ध समस्या का समाधान है. शांति की बातें करो तो कुछ ‘महानुभावों’ को लगता है कि कब तक शांति के कबूतर उड़ाते रहेंगे लेकिन युद्ध के बाद होनेवाले विपरीत असर को भी देख लो. युद्ध छिड़ने के बाद हमारी अर्थव्यवस्था पच्चीस साल पीछे आ सकती है. सो युद्ध ना तो विकल्प है और ना ही पाकिस्तान को ठिकाने लाने का उचित रास्ता. कूटनीतिक स्तर पर ही पाकिस्तान को रोकना होगा. इस देश का वर्तमान युद्ध नहीं मांग रहा है, बल्कि दो वक्त की रोटी मांग रहा है, रोजगार मांग रहा है, सिर पर छत-शिक्षा मांग रहा है, शांति की सीख देनेवाला तथागत बुद्ध मांग रहा है.

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