जो नहीं मानते धर्म को  

तमिलनाडु के वेल्लूर की स्नेहा सूर्खियों में हैं. 35 वर्षीया यह महिला विशाल भारतवर्ष में उन 29 लाख लोगों में से एक है जो धर्मावलंबी नहीं हैं. स्नेहा के पास अब किसी भी धर्म को नहीं मानने का वैध दस्तावेज है और वह बाकायदा ‘नो कास्ट, नो रिलिजन’ का प्रमाणपत्र भी प्राप्त कर चुकी हैं. इस मुल्क में जब संविधान प्रदत्त ‘धर्मनिरपेक्षता’ की धज्जियां उड़ाने की होड़ मची हुई है, धर्मनिरपेक्षता पर विश्वास किसी जघन्य अपराध की तरह है स्नेहा जैसी एक महिला किसी भी मजहब की फालोअर नहीं है. वाकई यह अनूठा है. मगर आपको यह जानकर हैरत होगी कि धर्माध शक्तियों के तेजी से विस्तार के बीच    भारत में 130 करोड़ की आबादी का करीब 0.24 फीसद हिस्सा (29 लाख लोग)  किसी भी धर्म को नहीं मानता. 2011 के जनगणना को यदि आधार माने तो आश्चर्य यह है कि धर्मनिरपेक्ष आबादी गांव-कस्बों में ज्यादा और शहरों में कम है. गूगल पर सर्च करने से पता चलता है कि ग्रामीण अंचलों में 16.50 लाख के करीब लोग किसी भी धर्म पर विश्वास नहीं करते हैं, वहीं शहरों में यह आंकड़ा सवा 12 लाख के करीब है. धर्म की अवधारणा मनुष्य को अनुशासन के दायरे में , उच्छृंखलता-व्यभिचार से सुरक्षित जीवन के लिए बाध्य करने की है. लेकिन धर्म के लिए जब जान लेने और देने की बात चलती है, अपने धर्म की महफुजियत के लिए दीगर धर्मीयों के खून की नदी बहा दी जाती है, धर्म की आड़ में पाखंड-दंभ का जोर हो जाता है, अतिवाद हावी हो जाता है, धर्म अधर्म महसूस होने लगता है तो इसके (धर्म) मूल उद्येश्य को ही पलिता लग जाता है लेकिन ऐसे कट्टरपंथियों के बीच 29 लाख ‘निधर्मी’ लोगों का समूह अपना वजूद बनाए रखे हैं. यह संख्या ऊंट के मूंह में जीरा अवश्य है लेकिन मुङो लगता है कि यही सही ‘मानव’ हैं.  सभी के लहू का रंग एक जरूर है लेकिन जब धर्म बचाने के खातिर हथियार उठा लिए जाते हैं तो लाल लहू में नफरत घुलकर वह काला पड़ जाता है. 

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