शादियों में खाना, लुटता खजाना

दिवाली के बाद करीब सात-आठ विवाह समारोहों में मैं अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका हूं. कुछ विवाह समारोह नागपुर में थे और कुछ बाहर. इन सभी विवाह समारोहों का ताल्लुक मध्यमवर्गीय परिवार से ही था. कोई भी इसमें धनाढय़ नहीं था. कुछ उच्च मध्यमवर्गीय और कुछ निम्न मध्यमवर्गीय परिवार थे.  एक  बात पर मैंने गौर किया कि हर शादी का बजट 10 से 15 लाख रुपए के बीच था. जितनी राशि में एक सामान्य मकान खड़ा हो सकता है उतना खर्च विवाह समारोहों में हो रहा था और वह भी ऐसे समय जब महंगाई की डायन मध्यमवर्गीयों का जीना दुष्वार कर चुकी है. अबसे कोई तीस साल पहले घर के बुजुर्ग कहते थे, ‘देखते रहना, सुरसा की तरह मुंह फाड़ती महंगाई से लोग खुद ही आजीज आ जाएंगे और 15-20 साल बाद शादियों में खर्च एकदम घट जाएगा. ’ ठीक इसके विपरीत हुआ है. महंगाई बढ़ी लेकिन लोगों की आय भी बढ़ी तो शादियों में दिलखोलकर खर्च करने की प्रवृत्ति भी बढ़ी. बहरहाल, मेरी तो स्पष्ट राय है कि शादियों में बेशुमार खर्च धन की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं है. मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि ‘शादी जिंदगी में एक ही बार तो होती है ’ जैसी अवधारणा मध्यमवर्गीयों को विवाह समारोहों पर खजाना लुटाने के लिए विवश करती है. तिस पर अरबपतियों-खरबपतियों की शादियों (जैसे अंबानी पुत्र-पुत्री की शादी) में धन का दरिया उंडेला जाता है उससे भी आम मध्यमवर्गीय मानस प्रभावित होता है. ‘जिसकी जितनी पहुंच उतना तो खर्च करेंगे ही’ या फिर ‘इंसान पैसा कमाता किसलिए है, शादी-ब्याह पर खर्च नहीं करेगा तो कब करेगा’ जैसी विवेकहीनता या अव्यावहारिक पारंपारिक सोच भी आदमी की जेब खाली करवाती है.  शादी में खर्च नहीं किया तो बिरादरी में बदनामी होने का भी डर होता है.  खैर अपनी-अपनी सोच है लेकिन कुछ तथ्यों को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते. शादियों में मुङो लगता है सर्वाधिक बर्बादी अन्न की होती है. देश भूखमरी के दानव से अब तक मुक्त नहीं हो सका है वहीं दूसरी हो शादी या तत्सम समारोहों में खाद्यान्न फेंक दिया जाता है. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए. दो माह पूर्व अक्तूबर-2018 में अखबारों में प्रकाशित एक समाचार ने मुङो बड़ा विचलित कर दिया था. खबर यह थी कि वैश्विक भूख सूचकांक अर्थात ग्लोबल हंगर इंडेक्स  (जीएचआई) मैं भारत बेहद नीचे यानी 103वें नंबर पर है. आजादी के सत्तर साल का जश्न हम मना चुके हैं लेकिन भूख ने इस मुल्क का पीछा नहीं छोड़ा है जो निहायत ही शर्मनाक है. यह इसलिए भी ज्यादा लज्जित करता है क्योंकि वैश्विक भूख सूचकांक  मामले में श्रीलंका (67वें), म्यांमार (68वें), बंगलादेश (86वें) और नेपाल (72वें)  जैसे छोटे राष्ट्र तक  हम पर हंसने का हक रख रखते हैं. 
अक्तूबर में वैश्विक भूख सूचकांक में 119 देश ही थे और उसमें भी 103वें  नंबर पर हमारी मौजूदगी विश्व के विशालतम लोकतंत्न के लिए बैचैन करनेवाला कटु सत्य है.   भुखमरी या भूख से निजात पाने  के लिए विगत सत्तर वर्षों में जितनी भी योजनाएं बनाई गईं वे या तो लालफीताशाई  का शिकार होकर रह गईं या फिर शिद्दत से क्रि यान्वयन के अभाव में बीच रास्ते में ही दम तोड़ गईं. भूख और मौत इंसानी जिंदगी के दो शाश्वत सत्य हैं और दोनों का ‘तांडव’ नंगी आंखों से देखने के लिए भारतवर्ष बेबस है.   ओडीशा में भूखमरी के लिए अभिशप्त कालाहांडी जिले से लोगों की दयनीय स्थिति की खबरें आती ही रहती थीं. वहां के लोगों द्वारा आम की गुठलियों के बनाए गए चूर्ण से या फिर कुछ घासफूस की लुगदी से रोटियां बनाकर पेट भरने की सूचनाएं आती रही हैं लेकिन विगत चार वर्षो में  हम बद से बदतर स्थिति में पहुंचे हैं. चार वर्ष पूर्व वैश्विक भूख सूचकांक 55 था. इसके बाद लगातार इसमें गिरावट आती रही और अब 103 है. सो..यह भयानक स्थिति है और इसपर हर किसी को गौर करने की जरूरत है. 

Comments

  1. बढ़िया विषय चुना है रवींद्र जी. ज़ाहिर है, हम अब भी सामाजिक तौर पर बहुत विकसित नहीं हो पाए हैं.

    ReplyDelete

Post a Comment