पार किया आग का दरिया
शायद वह कसक कपिल देव को अभी भी है. 1985-86 के ऑस्ट्रेलिया दौरे में बॉक्सिंग डे टेस्ट ‘इंद्र कृपा’ की वजह से भारत जीतने से महरूम रह गया था. 126 रन के साधारण लक्ष्य का पीछा करते हुए कपिल देव की टीम को दो सत्रों में 67 रन बनाने थे और बारिश आ गई. भारत ऐतिहासिक उपलब्धि से वंचित रह गया. अबकी बार मेलबोर्न में जब बारिश की आशंका जताई गई तो 32 साल पुरानी याद का ताजा होना लाजमी था. शुक्र है कि बरखा रानी ने अपने तेवर नहीं दिखाए और अप्रिय इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं हुई. बॉक्सिंग डे टेस्ट में विजयी पताका फहराकर टीम इंडिया ने क्या खूबसूरत अंदाज में वर्ष 2018 को विदा किया पर यह जीत उतनी सरल नहीं है. मेजबान ऑस्ट्रेलियाई टीम में दिग्गज स्टीव स्मिथ और डेविड वार्नर नहीं थे लेकिन ऑसी जब अपनी सरजमीं पर खेलते हैं तो उनका रवैया भूखे भेड़िए जैसा होता है. दरअसल कुछ चीजें ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं. इसमें प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों से बदजुबानी, बदसलूकी, छींटाकशी शामिल हैं. ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट संस्कृति घटिया से घटिया विकल्प चुनकर कामयाबी का मुकाम हासिल करने की शिक्षा देती है और दुनिया इस प्रवृत्ति को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ केपटाउन टेस्ट में देख भी चुकी है. ऑस्ट्रेलियाई अपनी हरकतों पर चाहे जितने शर्मसार दिखाई दें, चाहे जितना अफसोस जताएं पर उनके खाने के दांत अलग और दिखाने के अलग हैं. उनके अपने उसूल हैं. अपने तौर-तरीके हैं. दर्शक भी बेहूदगी में अपने खिलाड़ियों का साथ देते हैं. बॉक्सिंग डे टेस्ट में भारतीय क्रिकेटरों को दर्शकों से नस्ली टिप्पणियों का सामना करना पड़ा. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया को ऐसे दर्शकों के खिलाफ कार्रवाई करने की चेतावनी देनी पड़ी.इसी वजह ऑस्ट्रेलिया को उसी की सरजमीं पर शिकस्त देने का मतलब है आग के दरिया को पार पाना. फिर ऑसी ताकतवर हैं या कमजोर यह मायने नहीं रखता. इस लिहाज में टीम इंडिया की बॉक्सिंग डे टेस्ट में सफलता सचमुच प्रशंसनीय है.
बहरहाल, बॉक्सिंग डे टेस्ट में जीत के साथ भारत ने सीरीज में 2-1 से बढ़त तो बना ली है पर इससे सिडनी टेस्ट की रोचकता भी बढ़ चुकी है जो तीन जनवरी से शुरू होगा. कंगारू सिडनी टेस्ट जीतकर सीरीज में बराबरी हासिल करने के लिए जी-जान लगा देंगे. ऐसे में भारतीयों को विचलित करने की रणनीति के तहत उनकी जुबान और तीखी हो सकती है लेकिन विराट कोहली उन खिलाड़ियों में से हैं जिन्हें ‘जुबानी जंग’ लड़ने का, बदतमीजी पर उतरे ऑस्ट्रेलियाइयों को उन्हीं की भाषा में जवाब देने का हुनर बेहतरी से आता है. कोहली की विशेषता यह है कि उनका बल्ला तो बोलता ही है लेकिन मुंह भी खामोश नहीं रहता. अब तो ऑस्ट्रेलियाई भी उनका लोहा मानने लगे हैं और अपने बल्लेबाजों को भारतीय कप्तान की तरह खेलने की सलाह देने लगे हैं. ऑस्ट्रेलिया में किसी प्रतिद्वंद्वी कप्तान की सराहना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है.
पुरानी याद ताजा कर दी आपने। क्या खूब लिखा है।
ReplyDeleteThsnks
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