क्रिकेट अपना भाई और हॉकी ‘कामवाली बाई’
देश में हॉकी का विश्वकप चल रहा है, मगर मीडिया में हावी है तो क्रि केट.मीडिया में क्रिकेट विश्वकप की जो चकाचौंध दिखाई देती है वैसी हॉकी को लेकर नहीं है. यहां तक कि हॉकी का ‘महाकुंभ’ जैसे शब्द तक इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं.
विश्वकप चार साल बाद होनेवाला आयोजन है लेकिन मीडिया में डंका पीट रहा है भारतीय क्रिकेट टीम का ऑस्ट्रेलिया दौरा. विराट कोहली, रवि शास्त्री के बयान अखबारों में खेल पन्नों की लीड स्टोरी बनती है और हॉकी के कप्तान का बयान..कौन है भई हॉकी का कप्तान..यह स्थिति है. हॉकी राष्ट्रीय खेल है और क्रि केट विशुद्ध रूप से इंग्लिशस्तानी. मगर दोनों में फर्क को समझाएं तो कहना होगा कि क्रि केट यानी अपना ‘भाई-बंधु’ और हॉकी जैसे घर की कामवाली ‘बाई’. ऐसा भी नहीं कि हॉकी में हम एकदम पाताल में धंसे हैं. दुनिया के शीर्ष दस टीमों में शामिल है हमारी भारतीय हॉकी टीम और इसका इतिहास भी बड़ा गौरवशाली और समृद्ध है. हॉकी में आठ बार हमने ओलंपिक स्वर्ण जीता. ध्यानचंद जैसा अनमोल हीरा दुनिया को दिया जिसने तानाशाह हिटलर को तक अपना मुरीद बना दिया. मगर दुर्भाग्य है कि इस लुभावने, अत्याकर्षक खेल की तुलना कमसे कम मुङो ‘घर की कामवाली बाई’ से करनी पड़ रही है. आखिर क्रि केट और हॉकी की लोकप्रियता में क्यों इतनी विसंगती, क्यों इतना विशाल अंतर? मूलभूत अंतर दरअसल दोनों खेलों के परिचालन तंत्र में है. 1983 में कपिल देव के नेतृत्व में विश्वकप पर भारत के अनपेक्षित रूप से कब्जा जमाने के बाद बीसीसीसाई ने जहां पेशेवर रुख अपनाया और क्रिकेट को फर्श से अर्श पर पहुंचाया वहीं हॉकी में एकदम विपरीत परिदृश्य है. हॉकी भारत में अर्श से फर्श पर आई है. वह दौर था जब अस्सी-नब्बे के दशक में क्रिकेट पेशेवराना रुख अपनाकर तरक्की के नित नए पादान कायम करता चला जा रहा था तब धनराज पिल्लै जैसे दिग्गज हॉकी खिलाड़ी बीसीसीआई और क्रिकेट से खार खा रहे थे. क्रिकेट को पेशेवर बनाने पर उन्हें सख्त ऐतराज था. खैर, मैं दोनों खेलों के संचालन तंत्र का विश्लेषण करना नहीं चाहता. हॉकी इंडिया से भी मुङो हॉकी को लोकप्रियता के शीर्ष पर पहुंचाने में नाकामी के लिए शिकायत या ऐतराज भी नहीं है पर अफसोस इस आला दज्रे के खेल की उपेक्षा पर है. काश, हॉकी के आश्रयदाता इस मुल्क में जरा भी ध्यान देते, अपने अहंकार को दूर रखते, आपसी टकरावों को थोड़ी देर के लिए भूल जाते तो इस खेल में भी भारतीयों को दुनिया आज भी सलाम करती नजर आती. हॉकी को भारत में शानदार विरासत मिली पर उसे सहेजने में विफलता की वजह से यह खेल निरंतर रसातल की ओर जाता रहा. हालांकि पिछले कुछ वर्षो के बनीस्बत भारत में आज हॉकी की दशा में व्यापक सुधार देखा जा रहा है लेकिन लोकप्रियता में अपना ग्राफ क्रिकेट के ग्राफ जितना ऊंचा करना फिलहाल हॉकी के कर्ताधर्ताओं के बस में नहीं लगता.
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