भाजपाई आंधी से टकरा गया गांधी खानदान का चिराग

राहुल गांधी को भविष्य का तेजस्वी, प्रतापी या युग प्रवर्तक नेता कहने का साहस तो मैं नहीं कर सकता लेकिन उनकी सीखने की ललक, उनका जुझारूपन, संघर्ष क्षमता ने मुङो प्रभावित किया है.  2014 के आमचुनावों में मोदी की आंधी में नौसिखिये राहुल गांधी और उनकी पार्टी किसी कागज के जजर्र टुकड़े  की तरह उड़ गई. मोदी-शाह का ‘कांग्रेेस मुक्त भारत’ का नारा तो इतना जोशपूर्ण और डरावना रहा कि महसूस होता था जैसे राहुल भाजपाई आंधी से टकराना तो दूर थोड़ी देर के लिए खड़े भी रह गए तो बड़ी उपलब्धि होगी. उन्हें ‘पप्पू’ कहा जाने लगा, सियासत का ‘बालक’ कहा जाने लगा. उनके भाषणों की खिल्ली उड़ाई जाने लगी. गांधी खानदान के इस चिराग को मौजूदा भारतीय राजनीति के सबसे दयनीय, नालायक, बुद्धिहीन पात्र के तौर पर प्रचारित किया जाता रहा. जहां तक मेरी जानकारी है बीजेपी ने अपने (कु)प्रचार तंत्र का तानाबाना बुना ही इस तरह से था कि राहुल गांधी की छवि निरंतर मैली होती रहे. इसके लिए खबरिया चैनलों को बाकायदा पैसा दिया गया. मोदी का नमक खा चुके  इन ‘गोदी’ चैनलों ने राहुल गांधी का जितना मजाक उड़ाना था उड़ा लिया. राहुल ही क्यों मायावती, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव और हर उस नेता को इन चैनलों ने नहीं बख्शा जो मोदी सरकार को घेरने की काबलियत रखते हैं.  लोगों का नजरिया राहुल के प्रति नकारात्मक होता रहा और यह 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले से ही चल रहा था. 2013 का वह नवंबर महीना था. मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम पर सचिन तेंदुलकर अपना अंतिम टेस्ट मैच खेल रहे थे. राहुल गांधी स्टेडियम पहुंचे. दर्शकों ने उनकी खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी. उनकी हूटिंग करने लगे. राहुल मुश्किल से आधा घंटा स्टेडियम में बिता पाए.
सो, राहुल गांधी काफी कुछ बर्दाश्त करते रहे लेकिन विचलित कभी नहीं हुए. हार को हमेशा जीत की पहली सीढ़ी मानकर बढ़ते रहे. चार साल से उनकी मेहनत चल रही थी. पिछले दिनों कर्नाटक विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी परिपक्वता दिखाई और मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए हाय-हाय करने के बजाय साथी दल को मौका दिया लेकिन राहुल की संपूर्ण परिपक्वता का सही परिचय मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव नतीजों ने दिया. जीत की खुशी में वे मोदी की तरह उन्मादी नहीं बने, बल्कि प्रेस कांफ्रेंस में यह कहकर उन्होंने विरोधकों का भी दिल जीता कि मैं किसी दल से भारत को मुक्त करने जैसी बात नहीं करुंगा. उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों का भी आभार माना. अब तो मैं इस निष्कर्ष पर रहुंच रहा हूं कि सीखने की जरूरत तो राहुल से भी ज्यादा मोदी को है. पहला सबक तो उन्हें यह लेना होगा कि सियासत में किसी को अंडरइस्टीमेट ना समङों क्योंकि वक्त जब करवट बदलता है तो कोई भी तीसमारखां बन सकता है. दूसरा सबक यह है कि लोकतंत्र के मूल्यों को सहेजें, उनका सम्मान करें. किसी विपक्षी दल से देश की मुक्ति की ललकार आपका छप्पन इंच का सीना नहीं दिखाती बल्कि आपकी बुझदिली को प्रमाणित करती है.  आज राहुल की मेहनत रंग लाई है. उम्मीद है कि कांग्रेस में वे 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी-शाह के सामने चुनौती बनकर डटेंगे. 

Comments

  1. बढ़िया लिखा रवींद्र जी. राहुल गाँधी लम्बे अरसे से संघी कुप्रचार तंत्र का शिकार बनते रहे हैं. ये कुप्रचार पहले भी चलता रहा है और इसने गाँधी-नेहरू-इंदिरा-आम्बेडकर, किसी को नहीं बख्शा.

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    1. सर हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया। आप ही कि प्रेरणा से ब्लॉक शुरू किया हैं। धन्यवाद।

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