‘सरकशी’ का परचम लहराने का ‘सौतेला इनाम’?




‘सरकशी’ का तात्पर्य विद्रोह है, लेकिन यह भी न भूलें कि दुनिया में सामंतों की नींव हिला कर नई समतावादी व्यवस्था स्थापित करने की शक्ति भी ‘सरकशी’ में ही निहित है। भारतीय महिलाएं आज जिस कामयाबी के मुकाम पर हैं, वह इस विद्रोही चेतना की ही फलश्रुति है। भारतीय महिलाओं के संघर्ष की दास्तान काफी लंबी, मगर उतनी ही प्रेरक भी है। सावित्रीबाई फुले, सरोजिनी नायडू, फातिमा शेख, अहिल्याबाई होल्कर, एनी बेजेंट और इंदिरा गांधी ने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देकर भारतीय नारियों में आत्मसम्मान की अलख जगाई। पितृसत्ता के खिलाफ विद्रोह का परचम थामने की ताकत नारी हाथों में उत्पन्न की और इतना ही नहीं, 21वीं सदी में उन्हें व्योम तक पहुंचा दिया। आज भारतीय महिलाओं की उपलब्धियों को उंगलियों पर नहीं गिना जा सकता। इसी कड़ी में एक और गौरवशाली अध्याय जुड़ा जब रविवार, दो नवंबर की रात भारत की महिला टीम आईसीसी वनडे विश्व कप स्पर्धा की विजेता बनी। यह उपलब्धि न तो रातों-रात मिली और न ही किसी परालौकिक शक्ति ने इसे थाली में सजाकर दे दिया।

प्रदीर्घ संघर्ष गाथा
इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे भारतीय महिला टीम की लंबी संघर्ष यात्रा छिपी है। सन 1973 में ‘विमेंस क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ (डब्ल्यूसीए) के गठन के बाद भारतीय टीम उसके अधीन खेलने लगी। वह दौर ऐसा था जब टीम के पास न धन था, न प्रायोजक। हरमनप्रीत कौर की टीम को आज पांच सितारा सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन तीन दशक पहले भारतीय खिलाड़ी ट्रेन के अनारक्षित कोच में सफर करती थीं। वे डॉर्मिटरी में फर्श पर सोतीं और अपना बिस्तर खुद लेकर चलती थीं। एक बार धनाभाव के कारण न्यूजीलैंड दौरे पर टीम होटल में रुक तक नहीं सकी और प्रवासी भारतीय परिवारों के घरों में ठहरकर टूर्नामेंट खेलना पड़ा।

 



वक्त तो लगता है
उस दौर की तुलना में आज भारतीय महिला क्रिकेट की स्थिति निश्चित ही बेहतर है। 2006 में डब्ल्यूसीए का बीसीसीआई में विलय होने के बाद हालात सुधरने लगे। किसी भी टीम को विश्व श्रेष्ठता का दर्जा मिलने में समय लगता है। पुरुष टीम भी एक झटके में तीनों प्रारूपों की सरताज नहीं बनी। बीसीसीआई ने खिलाड़ियों को तराशने और अवसर देने में समय और धन दोनों लगाए। महिला क्रिकेटरों को ढूंढने, तैयार करने और संवारने में भी वक्त लगा और अब उसका परिणाम देश के सामने है।

 

24 घंटे में गैर-बराबरी
खैर, भारतीय महिलाएं चैंपियन बन गईं। लेकिन जीत के महज 24 घंटों के भीतर ही वे गैर-बराबरी का शिकार भी हो गईं। बीसीसीआई, जिसने कभी उन्हें अपनी शरण में लेकर आगे बढ़ाया था, वही अब ‘सौतेला’ बनकर खड़ा दिखा। बीसीसीआई के सर्वेसर्वा और वर्तमान आईसीसी चेयरमैन जय शाह ने इस जीत को वह सम्मान नहीं दिया, जिसकी वह हकदार थी। अगर चैंपियनों को आप धन के तराजू में तौल ही रहे हैं, तो महिला टीम को भी वही 125 करोड़ रुपए दे सकते थे, जो पुरुष टीम को टी-20 चैंपियन बनने पर दिए गए थे। बल्कि सच तो यह है कि महिलाओं की यह पहली इतनी बड़ी उपलब्धि है, उन्हें इससे अधिक दिया जा सकता था। परंतु 51 करोड़ रुपए देकर कर्तव्य पूरा मान लेना। यही तो दुर्भाव और संवेदनहीनता है।

ऐलान का क्या हुआ?
फाइनल से एक दिन पहले बीसीसीआई ने कहा था कि महिला टीम पर भी उतनी ही धनराशि की बौछार की जा सकती है जितनी पुरुष टीम पर की गई थी। लेकिन वास्तविकता यह निकली कि महिलाओं को पुरुष टीम की तुलना में आधे से भी कम राशि दी गई। शर्मनाक है यह उस बीसीसीआई के लिए जिसके प्रमुख जय शाह ‘लैंगिक समानता’ की बात करते हैं। यदि वे सचमुच समानता के पक्षधर हैं, तो अमल करने का सबसे उचित अवसर तो यहीं था। लेकिन मानसिकता यदि स्त्री के प्रति रूढ़ीवादी है, तो क्या कहा जाए।


 

पुरुष टीम के ‘ए प्लस’ अनुबंधित खिलाड़ियों को बीसीसीआई सात करोड़ रुपए वार्षिक देता है, जबकि महिला टीम में यही राशि सिर्फ 50 लाख रुपए है। घरेलू क्रिकेट में भी महिला खिलाड़ियों को पुरुषों की तुलना में कम पारिश्रमिक मिलता है। क्रिकेट आज पूर्णत: पेशेवर खेल है। जर्सी तक प्रायोजित होने लगी है। प्रसारण और डिजिटल अधिकारों से बीसीसीआई की कमाई कुछ छोटे देशों की जीडीपी के बराबर है। वह दुनिया की सबसे रईस क्रिकेट संस्था है। लेकिन जब खिलाड़ियों की उपलब्धि पर सम्मान देने की बारी आई — तो महिलाओं को फिर दूसरा दर्जा !



 



Comments

  1. जबरदस्त लेखनी है आपकी

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